सबरीमला पर बीजेपी के 'दांव' में फँसी कांग्रेस और सीपीएम?

  • 9 अक्तूबर 2018
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सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में अपने फ़ैसले में सबरीमला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं को जाने की इजाज़त दी थी.

इस फ़ैसले के बाद केरल के सवर्णों और पिछड़ी जातियों में मतभेद उभर कर सामने आ रहे हैं.

स्थिति यह है कि राजनीतिक पार्टियां, जो पहले सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का स्वागत करती दिख रही थीं, वो अब बँटे जनमानस के साथ अपना स्टैंड बदल रही हैं.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) भी अब अपना स्टैंड बदलता नज़र आ रहा है. पूरे देश में संघ की सबसे ज़्यादा शाखाएं केरल में चलती हैं.

संघ ने एक बैठक में फ़ैसला किया कि वो उन हिंदू संगठनों का साथ देगा जो इस फ़ैसले से नाराज़ हैं.

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सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने 4-1 के बहुमत वाले फ़ैसले में 10 से 50 साल की महिलाओं के केरल के सबरीमला मंदिर में प्रवेश पर रोक को असंवैधानिक क़रार दिया था.

सुप्रीम कोर्ट का पक्ष

सुप्रीम कोर्ट ने इसे धारा 14 का उल्लंघन बताया था और कहा था कि हर किसी को बिना किसी भेदभाव के मंदिर में पूजा करने की अनुमति मिलनी चाहिए.

सैकड़ों साल से सबरीमला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर रोक थी जिसके ख़िलाफ़ कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी.

फ़ैसले के एक सप्ताह बाद ही महिला और राजनीतिक कार्यकर्ता इसके ख़िलाफ़ जुटने लगे और वो सदियों से चली आ रही परंपरा के पक्ष में खड़े होते दिख रहे हैं.

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विरोध करने वालों की मांग है कि राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में फ़ैसले के ख़िलाफ़ पुनर्विचार याचिका दाखिल करे, पर राज्य सरकार ने इससे मना कर दिया.

राज्य सरकार का कहना है कि वो मंदिर में सभी उम्र और लिंग के लोगों के प्रवेश के पक्ष में है.

राज्य के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन ने आरएसएस पर आरोप लगाया है कि वो और भाजपा राज्य में क़ानून व्यवस्था को कमज़ोर करने का प्रयास कर रहे हैं. मुख्यमंत्री ने कांग्रेस को भी इस मामले में घेरा है.

विजयन ने कहा, "आरएसएस राज्य में क़ानून व्यवस्था बिगाड़ने का प्रयास कर रहा है. राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को लागू करने के लिए बाध्य है."

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कोर्ट के फ़ैसले पर सियासत

कोर्ट के फ़ैसले को लागू करने के लिए मुख्यमंत्री ने एक बैठक बुलाई थी, जिसमें मंदिर के संरक्षक और मुख्य पुजारी ने भाग नहीं लिया.

मुख्यमंत्री जब प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर रहे थे तो हिंदूवादी संगठन और मंदिर से जुड़ी संस्था सुप्रीम कोर्ट में फ़ैसले पर पुनर्विचार याचिक दाखिल कर रहे थे.

मंदिर के मुख्य पुजारी ने राजीवारू कंदारारू ने बीबीसी से कहा, "हमलोग चाहते हैं कि हमारी परंपरा कायम रहे और उसी का अनुसरण किया जाए."

दलित कार्यकर्ता और लेखक सनी एम कपिकड़ का कहना है, "परंपरा संविधान के ख़िलाफ़ है. फ़ैसले के ख़िलाफ़ हिंदूवादी संगठनों का ग़ुस्सा महिलाओं के अधिकार के ख़िलाफ़ है. ये विरोध ब्राह्मणवादी व्यवस्था को कायम रखना चाहता है."

आरएसएस के राज्य इकाई के उपाध्यक्ष केके बलराम ने कहा, "सबरीमला मंदिर के बारे में फ़ैसला मंदिर की संरक्षक पीढ़ी ले सकती है. हमलोग चाहते थे कि राज्य सरकार फ़ैसले पर पुनर्विचार याचिका दाखिल करे. हिंदूवादी संगठनों को आरएसएस का समर्थन है."

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प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष वी मुरलीधरण ने कहा, "केरल का मामला महाराष्ट्र के शनि मंदिर जैसा नहीं है. सबरीमला में महिलाओं के प्रवेश पर रोक नहीं है. एक निश्चित उम्र सीमा की महिलाओं के प्रवेश पर रोक है. एनडीए की पार्टियां 10 से 15 अक्टूबर के बीच रैली निकालेंगी."

तिरुवनंतपुरम में द हिंदू के सहायक संपादक सीके गौरीदसन नायर स्थिति को रोचक बताते हैं. वो कहते हैं, "भाजपा और कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व फ़ैसले का स्वागत कर रहा था. अगर कांग्रेस पार्टी अभी स्टैंड नहीं लेती है तो पूरा क्रेडिट भाजपा के पाले में चला जाएगा."

नायर कहते हैं, "कांग्रेस पार्टी एक ख़तरनाक खेल खेल रही है. हमलोग आज नहीं जानते हैं कि सड़क पर जो प्रदर्शन कर रहे हैं वो कांग्रेस के हैं या भाजपा के. मुझे लग रहा है कि कांग्रेस उसे अपने पाले में ले लेगी. भाजपा भी इसी खेल में लगी हुई है."

केरल में हिंदुओं की आबादी अधिक है. यहां मुस्लिम और ईसाई की आबादी लगभग 46 फीसदी है. ऐसे में हिंदू वोटरों पर सभी पार्टियों की नज़र है.

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