एमजे अकबरः विदेश राज्य मंत्री #MeToo के आरोपों के घेरे में

  • 14 अक्तूबर 2018
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भारत में चल रहे #MeToo अभियान में सबसे नया नाम सामने आया है जाने-माने संपादक और मौजूदा सरकार में विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर का.

एमजे अकबर पर 'प्रीडेटरी बिहेवियर' के आरोप हैं, जिसमें युवा महिलाओं को मीटिंग के नाम पर होटल के कमरे में बुलाना शामिल है.

न तो एमजे अकबर और न ही विदेश मंत्रालय ने इन आरोपों पर कोई प्रतिक्रिया दी है. वो विदेश दौरे से लौट आए हैं और उन्होंने कहा है कि इस मसले पर वो बयान जारी करेंगे.

केंद्रीय महिला एवं बाल कल्याण मंत्री मेनका गांधी ने कहा कि राजनेताओं पर लगे आरोपों समेत, सभी इल्ज़ामों की जांच होनी चाहिए.

पिछले कुछ दिनों में जितने अभिनेताओं, पत्रकारों, लेखकों और फिल्मकारों पर आरोप लगे हैं उनमें एमजे अकबर सबसे बड़े रुतबे वाले व्यक्ति हैं.

देश के सबसे प्रभावशाली संपादकों में से एक रहे एमजे अकबर, द टेलीग्राफ़, द एशियन एज के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर रहे हैं.

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सबसे पहले उनका नाम सोमवार को वरिष्ठ पत्रकार प्रिया रमानी ने लिया था. उन्होंने एक साल पहले वोग इंडिया के लिए 'टू द हार्वे वाइंस्टींस ऑफ़ द वर्ल्ड' नाम से लिखे अपने लेख को रीट्वीट करते हुए ऑफिस में हुए उत्पीड़न के पहले अनुभव को साझा किया.

रमानी ने अपने मूल लेख में एमजे अकबर का कहीं नाम नहीं लिया था, लेकिन सोमवार को उन्होंने ट्वीट किया कि वो लेख एमजे अकबर के बारे में था.

उसके बाद से पांच अन्य महिलाओं ने भी एमजे अकबर से जुड़े अपने अनुभव साझा किए हैं.

अकबर के अलावा एक्टर आलोक नाथ और फ़िल्म निर्देशक विकास बहल पर भी यौन हमले के आरोप लगे हैं.

आलोक नाथ ने आरोपों का खंडन किया है लेकिन विकास बहल ने अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.

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कौन हैं एमजे अकबर?

वरिष्ठ पत्रकार एमजे अकबर 2014 लोकसभा चुनावों से पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हुए थे.

2015 में एमजे अकबर झारखंड से राज्यसभा के लिए चुने गए.

कभी राजीव गांधी के बेहद खास रहे एमजे अकबर 1989 में बिहार की किशनगंज लोकसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर सांसद निर्वाचित हुए थे.

राजीव गांधी के प्रधानमंत्री काल में एमजे अकबर उनके प्रवक्ता थे.

दोबारा 1991 में वो फिर से चुनावी मैदान में उतरे लेकिन जीत नहीं सके.

इस हार के बाद अकबर फिर से पत्रकारिता में आ गए.

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