गुजरात: प्रवासियों की मुश्किलों का ठाकोर सेना कनेक्शन

  • 12 अक्तूबर 2018
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Image caption अल्पेश ठाकोर

गुजरात से प्रवासियों को बाहर करने की धमकी देने के आरोप ठाकोर सेना और उससे जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं पर लगाए जा रहे हैं.

2011 में अल्पेश ठाकोर ने इसकी स्थापना की थी और इसका संचालन अहमदाबाद से किया जा रहा है. इसे बनाने का उद्देश्य गुजरात की अन्य पिछड़ी जातियों में शामिल ठाकोर समुदाय का उत्थान करना था.

28 सितंबर को हिम्मतनगर के एक गांव में 14 महीने की एक बच्ची के साथ बलात्कार हुआ था. लड़की का परिवार ठाकोर समुदाय से है. इस मामले में बिहार के एक युवक पर आरोप लगे हैं.

देखते ही देखते यह विवाद ठाकोर समुदाय बनाम प्रवासी का मामला बन गया.

इधर बीजेपी ने प्रवासियों को धमकी देने का आरोप कांग्रेस विधायक अल्पेश ठाकोर पर लगाया. आरोप प्रत्यारोप के बीच गुजरात से निकलकर सैकड़ों प्रवासी मजदूर अपने अपने घर चले गए. इससे ठाकोर सेना चर्चा में आ गई.

गुजरात में गृह राज्य मंत्री प्रदीप सिंह जडेजा ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि गुजरात में अशांति पैदा करने और प्रवासियों को धमकी देने और मारपीट के 61 मामले दर्ज किए गए हैं जिसमें 543 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है.

इनमें से 20 लोग कांग्रेस से जुड़े हैं और उनकी कॉल रिकॉर्ड और व्हाट्सऐप ग्रुप की छानबीन की जा रही है.

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वो कहते हैं, "ज़्यादातर लोग ठाकोर सेना नामक संगठन से जुड़े हुए हैं, इस पर जांच जारी है. उनकी कॉल डिटेल्स भी खंगाली जा रही हैं."

इस मामले में अहमदाबाद अपराध शाखा के ज्वाइंट कमिश्नर जेके भट्ट ने बीबीसी से कहा, 'हमने नगीन राठौड़ (ठाकोर) की गिरफ़्तारी की है. वो दो साल से ठाकोर सेना की मीडिया सेल के लिए काम कर रहे हैं.'

वो कहते हैं, 'इसके अलावा जगदीश ठाकोर नाम के एक शख़्स को भी सोशल मीडिया में उकसाने वाले मैसेज फ़ैलाने के मामले में गिरफ़्तार किया गया है.'

गुजरात पुलिस की साइबर सेल ने सोशल मीडिया पर उकसाने वाले मैसेज फ़ैलाने वाले लोगों की सूची बनाई है और उनकी गिरफ़्तारी की योजना बनाई है.

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ठाकोर सेना क्यों?

ठाकोर समाज की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए और समाज में फैले सामाजिक और आर्थिक विषमताओं को दूर करने के साथ ही समाज में एकता स्थापित करने के लक्ष्य को लेकर अल्पेश ठाकोर ने इस ठाकोर सेना की 2011 में स्थापना की थी.

अल्पेश कहते हैं, 'सरकार ने बच्ची के साथ बलात्कार के मामले में हमारी सभी मांगे मान ली थी इसलिए हमने अपना आंदोलन ख़त्म कर दिया था. लेकिन इसके तीन दिन बाद हिंसा की शुरुआत हुई. जो अपने आप में बहुत कुछ बयान करती है.'

अल्पेश ठाकोर ने गुरुवार को हिंदी भाषी राज्यों के लोगों के ख़िलाफ़ हिंसा को रोकने के लिए एकदिवसीय सद्भावना उपवास किया. इस दौरान उन्होंने बीजेपी के सभी आरोपों का खंडन किया.

जब उनसे पूछा गया कि प्रवासियों के ख़िलाफ़ हिंसा भड़काने से जुड़े करीब 50 मामले दर्ज किए गए हैं तो उन्होंने कहा कि ठाकोर समुदाय के लोगों को डराने के लिए लिए झूठे केस दर्ज किए गए हैं.

बीबीसी गुजराती के फ़ेसबुक पेज के ज़रिए उन्होंने प्रवासियों से अपील की कि जो लोग डर से गुजरात छोड़ गए हैं वो वापस लौट आएं. साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि अगर राज्य सरकार उन्हें सुरक्षा मुहैया कराने में नाकाम रहती है तो वो उन्हें सुरक्षा देंगे.

अल्पेश के मुताबिक उनके ठाकोर संगठन में अभी ढाई लाख सक्रिय सदस्य हैं.

गुजरात में ठाकोर राजनीति की जड़ें

गुजरात की राजनीति में ठाकोर राजनीति का उदय अचानक नहीं हुआ है. इसकी जड़ें 36 साल पुरानी हैं.

राजनीतिक विश्लेषक डॉ. बिनोद अग्रवाल ने बीबीसी गुजराती से बातचीत में कहा, '1981 में पहली बार छात्रों ने आरक्षण को लेकर आंदोलन किया था जिसे तत्कालीन मुख्यमंत्री माधव सिंह सोलंकी ने दबा दिया था. उस आंदोलन के बाद सोलंकी ने पटेलों पर अपनी निर्भरता घटाने के लिए क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम को साथ लेकर खाम समीकरण पर राजनीति खेली.'

वो कहते हैं, 'यूं तो ठाकोर समुदाय अन्य पिछड़ी जाति यानी ओबीसी में शामिल है लेकिन खाम समीकरण बनाने के दौरान उन्हें क्षत्रिय माना गया. उस समय गुजरात के नौ ज़िलों में ठाकोर मतदाता निर्णायक स्थिति में थे.'

खाम समीकरण की मदद से 1985 में कांग्रेस ने 182 में से 149 सीटें हासिल कीं जो कि अपने आप में गुजरात की राजनीति में एक रिकॉर्ड है जिसे अब तक कोई पार्टी तोड़ नहीं सकी है.

अग्रवाल कहते हैं, 'सोलंकी से नाराज़ पार्टीदारों को साथ लेकर 1990 में जनता दल के साथ मिलकर बीजेपी ने गठबंधन सरकार बनाई. 1995 और 1998 में बीजेपी ही सत्ता में आई.'

वो कहते हैं, 'नरेंद्र मोदी ने पहली बार अहमदाबाद के मेयर के तौर पर एक ठाकोर नेता को मौका दिया और अन्य ज़िलों के साथ ही तालुका पंचायतों में ठाकोर नेताओं को तरजीह दी गई. इसकी वजह से कांग्रेस की परंपरागत वोट बैंक में बड़ी सेंध लग गई.'

अग्रवाल बताते हैं, 'इसी के साथ गुजरात में एक बार फिर ठाकोर राजनीति का उदय हुआ है और इसका फ़ायदा 2007 और 2012 के विधानसभा चुनाव और 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को हुआ.'

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पाटीदार, ठाकोर और दलित आंदोलन

25 अगस्त 2015 के दिन अहमदाबाद के जीएमडीसी (गुजरात मेरीटाइम डेवलपमेंट कॉरपोरेशन) ग्राउंड में हार्दिक पटेल ने पाटीदार आरक्षण आंदोलन का बिगुल फूंका. शुरुआत में तो पाटीदारों की मांग थी कि उन्हें ओबीसी कोटे में ही आरक्षण मिले. अगर पाटीदारों को ओबीसी कोटे में आरक्षण मिलता तो ठाकोर हित को ठेस पहुंच सकती थी. इसलिए ठाकोर सेना सक्रिय हो गई.

गुजरात में 2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान ठाकोर सेना ने शराब की बिक्री पर जनता रेड के ज़रिए अपनी मौजूदगी दर्ज कराई. जिसमें ठाकोर महिलाएं और युवा भी जुड़े.

कांग्रेस ने अल्पेश ठाकोर को राधनपुर सीट से विधानसभा चुनाव के लिए टिकट दिया और इसका फ़ायदा उसे राधनपुर के आसपास की ठाकोर बहुतायत वाली सीटों पर भी मिला.

इस बीच दलितों के नेता के तौर पर जिग्नेश मेवाणी उभरे जिन्होंने दलितों की मांगों को लेकर आंदोलन छेड़ा. यही वो समय था जब गुजरात की राजनीति में तीन नए युवा नेताओं का उदय हुआ.

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किसको फ़ायदा, किसका नुकसान?

तालीम रिसर्च फाउंडेशन के चुनाव विशेषज्ञ एमवाई ख़ान कहते हैं, 'राज्य में दोनों ही पार्टियों ने ठाकोर समुदाय को अपनी तरफ़ खींचने की कोशिश की है. हाल ही में प्रवासियों के साथ हुए व्यवहार का असर राजस्थान, मध्यप्रदेश, और छत्तीसगढ़ के चुनाव में देखने को मिल सकता है.'

वो कहते हैं, 'गुजरात छोड़ कर गए लोगों को यहां पर उत्तर प्रदेश के भैय्या के तौर पर जाना जाता है पर असल में ये लोग राजस्थान, छतीसगढ़ और मध्य प्रदेश से भी आते हैं. बहुत संभव है कि इन राज्यों को चुनाव में प्रवासियों के साथ हुए व्यवहार का मुद्दा उछाला जाएगा.'

ख़ान कहते हैं, 'ये तो तय है कि इस पूरे प्रकरण से नुकसान गुजराती उद्योगपतियों को ज़रूर होगा. जैसे कि महाराष्ट्र में शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रादेशिक हित की बातें करती हैं वो प्रादेशिक स्तर तक ही रह जाती हैं.'

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