#MeToo: क्या हिंदी और क्षेत्रीय मीडिया में महिला पत्रकारों का यौन उत्पीड़न नहीं होता

  • 13 अक्तूबर 2018
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Image caption भारत में सबसे ज़्यादा भारतीय भषाओं के अख़बार पढ़े जाते हैं

मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान ही एक रेडियो में नौकरी के लिए अप्लाई किया था. मैंने वहां एक सीनियर से बात की और पूछा कि क्या मुझे नौकरी मिल सकती है?

उन्होंने जवाब दिया, "हां, हो सकता है लेकिन कुछ फ़ीस लगेगी."

उस वक़्त मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई तो कर ली थी लेकिन मेरा दिमाग़ गांव की एक मासूम लड़की जैसा ही था. या यूं कहें कि मैं पर्याप्त 'स्मार्ट' नहीं थी. मैंने 'फ़ीस'का मतलब पैसा समझा.

मैंने कहा, "सर, मेरे पास अभी ज़्यादा पैसे नहीं हैं. मैं ज़्यादा से ज़्यादा 5000 दे सकती हूं."

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Image caption नीतू सिंह, (रिपोर्टर, गांव कनेक्शन)

फिर उन्होंने कहा, "नहीं-नहीं पैसे नहीं. बस ऐसे ही...''

इसके बाद मैंने समझा कि वो असल में क्या कहना चाहते हैं.मैंने सीधे कहा कि ऐसा कुछ तो संभव ही नहीं है.

फिर उन्होंने मुझसे कहा कि मैं मीडिया में कभी क़ामयाब नहीं हो सकती क्योंकि मीडिया में जब तक कोई लड़की ख़ुद को परोसकर किसी के सामने नहीं रखेगी वो तरक़्क़ी नहीं कर सकती.

मैंने कहा, "मैं गांव-देहात की लड़की हूं. कुछ नहीं हुआ तो मैं गांव जाकर खेती करूंगी."

इस पर उनका जवाब था, "फिर तो तुम ज़िंदगी भर खेती ही करोगी, मीडिया में सफल नहीं होगी."

उनकी ये बात मेरे मन में इतनी बुरी तरह खटक गई कि मैं कुछ वक़्त के लिए घर वापस लौट गई. लेकिन मैंने तय किया था कि उनकी बात को ग़लत साबित करूंगी और बाद में उन्हें ग़लत साबित किया भी.

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ये कहानी है 'गांव कनेक्शन' अख़बार में काम करने वाली रिपोर्टर नीतू सिंह की. ये नीतू के करियर के शुरुआती दौर की बात है.

आज महिलाएं ग्राउंड ज़ीरो से मौक़ा-ए-वारदात का आंखों देखा हाल लोगों तक पहुंचा रही हैं. बलात्कार और यौन शोषण पीड़िताओं को इंसाफ़ दिलाने के लिए उनकी आवाज़ बनकर ब्रेकिंग न्यूज़ और अख़बारों की सुर्खियों में छा रही हैं.

लेकिन, लेकिन, लेकिन...

लेकिन वही महिलाएं न्यूज़रूम में अपने साथ होने वाले यौन उत्पीड़न पर ख़ामोश हैं.

यही वजह है कि पिछले कुछ हफ़्तों से जब न्यूज़रूम्स के भीतर से एक के बाद #MeToo यानी महिलाओं के यौन उत्पीड़न की कहानियां सामने आ रही हैं और उन्हें पढ़ने वालों की आंखें फटी की फटी रह जा रही हैं.

न्यूज़रूम्स के भीतर से आने वाली इन #MeToo की कहानियों में एक बात ग़ौर करने वाली है. अब तक सामने आई ज़्यादातर कहानियां अंग्रेज़ी मीडिया से हैं.

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Image caption सांकेतिक तस्वीर

ऐसे में सवाल ये उठता है कि अंग्रेज़ी मीडिया से कहीं बड़े हिंदी और क्षेत्रीय मीडिया से महिलाओं की आवाज़ें क्यों बाहर नहीं आ रही हैं? क्या वहां यौन उत्पीड़न जैसी घटनाएं नहीं होतीं?

हालांकि ऐसा भी नहीं है कि वहां की लड़कियां कुछ बोल ही नहीं रही हैं. दबी-दबी ही सही आवाज़ें आने लगी हैं. लेकिन इन्हें बुलंद होने से कौन रोक रहा है?

नीतू कानपुर देहात की रहने वाली हैं. उनके गांव तक पहुंचने के लिए पांच किलोमीटर तक कोई गाड़ी नहीं मिलती.

नीतू कहती हैं, "हिंदी मीडिया में काम करने वाली लड़कियों की पृष्ठभूमि काफ़ी अलग है. वो छोटे कस्बों से ताल्लुक रखती हैं, जहां लड़कियों को बचपन से ये अहसास दिलाया जाता है कि अगर हमारे साथ कुछ ग़लत हुआ है तो हमारी ही ग़लती है. इसलिए जब ऑफ़िस में हमारे साथ कुछ ग़लत होता है तो हम कहीं न कहीं इसे अपनी ही ग़लती मानकर चुप रह जाते हैं."

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Image caption वर्तिका तोमर, पत्रकार

इसके अलावा नीतू ये भी मानती हैं कि हिंदीभाषी क्षेत्रों की लड़कियों के लिए पत्रकारिता को करियर के तौर पर चुनना ही अपने-आप में बड़ी चुनौती है. उनके घर वाले भी नहीं चाहते थे कि वो पत्रकार बनें. उन्हें बीएड करके टीचर बनने की सलाह दी जाती थी.

नीतू पूछती हैं, "कोई लड़की इतने संघर्षों के बाद बना अपना करियर एक झटके में दांव पर कैसे लगा सकती है?"

वर्तिका तोमर को हिंदी मीडिया में 10 साल का अनुभव है. वो मानती हैं कि अगर हिंदी मीडिया से #MeToo की कहानियां कम आ रही हैं तो इसकी वजहें सामाजिक और आर्थिक वजहें हैं.

वो कहती हैं, "हिंदी मीडिया में काम करने वालों के लिए नौकरी के मौक़े और विकल्प अंग्रेज़ी की तुलना में कम हैं. हिंदी के पत्रकारों को पैसे भी अंग्रेज़ी के मुकाबले कम मिलते हैं. ऐसे में अगर महिलाएं एक नौकरी छोड़ भी दें तो उन्हें दूसरे मीडिया हाउस में काम मिलना मुश्किल होता है.''

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Image caption नीरेंद्र नागर, पूर्व संपादक ( नवभारत टाइम्स ऑनलाइन)

'हिंदी मीडिया में खुला नहीं है माहौल'

नवभारत टाइम्स ऑनलाइन के पूर्व संपादक नीरेंद्र नागर के मुताबिक़ एक तो हिंदी मीडिया में लड़कियां अंग्रेज़ी मीडिया से कम हैं. दूसरा ये कि हिंदी न्यूज़रूम्स का माहौल उतना खुला नहीं है.

वो कहते हैं, "यहां ये संभावना बहुत कम रहती है कि कोई लड़की, अपने बॉस या दूसरे पुरुष सहकर्मी के साथ दोस्त की तरह बाहर जाकर कॉफ़ी पिए."

नीरेंद्र कहते हैं, "इन सबकी वजह से दफ़्तर में काम करने वाले पुरुष महिलाओं के उतने क़रीब पहुंचने की हिम्मत ही नहीं कर पाते.

मराठी अख़बार लोकसत्ता के संपादक गिरीश कुबेर ने मराठी और अंग्रेज़ी मीडिया दोनों में काम किया है.

उनका मानना है कि मराठी और क्षेत्रीय मीडिया में संपादकों और रिपोर्टरों के बीच उम्र का फ़ासला ज़्यादा होता है इसलिए उनके बीच क़रीबी रिश्ते बनने की संभावना पहले ही कम हो जाती है.

दूसरी वजह को ज़्यादा महत्वपूर्ण बताते हुए गिरीश कुबेर कहते हैं, "क्षेत्रीय मीडिया का महौल कहीं न कहीं ज़्यादा रूढ़िवादी होता है. वहां पश्चिमी संस्कृति का असर कम है. मराठी या हिंदी मीडिया में बाहर जाकर पार्टी करने के मौक़े भी कम आते हैं और लोगों का साथ रहना भी कम ही होता है."

हालांकि गिरीश और नीरेंद्र दोनों ये मानते हैं कि इन वजहों से उत्पीड़न रुक जाता है, ये कहना ग़लत होगा.

इसके अलावा बॉस और रिपोर्टर के बीच स्वस्थ संवाद की कमी की वजह महिलाओं के लिए उत्पीड़न के बारे में बताना भी मुश्किल हो जाता है.

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Image caption मनस्विनी प्रभुणे नायक, स्वतंत्र पत्रकार

गोवा में काम करने वाली स्वतंत्र पत्रकार मनस्विनी प्रभुणे नायक पिछले 25 साल से पत्रकारिता के पेशे में हैं.

जब वो पत्रकारिता की पढ़ाई कर रही थीं तब उनकी क्लास में 38 लड़के थे और वो अकेली लड़की. जब पहली नौकरी लगी तो पूरा न्यूज़रूम मर्दों से भरा था. महिलाएं सिर्फ़ चार थीं.

मनस्विनी कहती हैं, "मराठी मीडिया में बहुत सी ऐसी लड़कियां हैं जो दबी ज़ुबान में अपने साथ होने वाले ग़लत बर्ताव के बारे में बोलती हैं. वो बताती हैं कि कैसे उनके साथ वाले उनके सामने सेक्शुअल कॉमेंट करते हैं और कैसे उन पर संबंध बनाने का दबाव बनाते हैं."

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Image caption गुजराती टीवी चैनल वीटीवी न्यूज़ की असिस्टेंट प्रोड्यूसर बंसी राजपूत की फ़ेसबुक पोस्ट

मनस्विनी को लगता है कि क्षेत्रीय मीडिया से #MeToo की कम कहानियां सामने आने की एक बड़ी वजह ये भी है कि लड़कियों के मन में नौकरी, काम और शोहरत को खोने का डर है जिसे उन्होंने पहले ही बहुत कुछ खोकर कमाया है.

तेलुगू टीवी मीडिया में 40 साल का अनुभव रखने वाली पद्मजा शॉ मानती हैं कि तेलुगू न्यूज़रूम्स का माहौल अब भी बहुत पितृसत्तात्मक हैं. लड़कियों को पत्रकारिता के पेशे में आने नहीं दिया जाता. वो किसी तरह आती भी हैं तो ऊंचे पदों तक नहीं पहुंच पातीं.

उनके मुताबिक तेलुगू और क्षेत्रीय मीडिया में काम करने वाली लड़कियां शायद अभी इतना बड़ा रिस्क नहीं ले सकतीं, क्योंकि बोल वही सकता है जिसे नौकरी जाने का डर न हो.

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Image caption सांकेतिक तस्वीर

'वो ज़रूर बोलेंगी...'

नीतू, वर्तिका, मनस्विनी और पद्मजा. चारों महिला पत्रकारों की चुप्पी की जो वजहें बताती हैं, वो मिलती-जुलती हैं.

आख़िर में नीतू दो वजहें और जोड़ती हैं, "अक्सर महिलाएं इसलिए भी नहीं बोलतीं क्योंकि आगे कोई कार्रवाई होती नहीं है. मामले को कैसे भी करके दबा दिया जाता है."

इन सबके बावजूद पद्मजा को उम्मीद है कि अगर आज अंग्रेज़ी मीडिया से महिलाएं बोल रही हैं तो क्षेत्रीय मीडिया में काम करने वाली महिलाएं भी कभी न कभी ज़रूर बोलेंगी.

वो कहती हैं, "वो बोलेंगी. ज़रूर बोलेंगी. आज नहीं, 5-10 साल बाद सही लेकिन बोलेंगी ज़रूर."

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