क्या ईसा मसीह का मक़बरा कश्मीर में है?

रौज़ाबल, श्रीनगर

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रौज़ाबल दरगाह के भीतर का दृश्य

(बीबीसी हिंदी पर सैम मिलर का ये लेख पहली बार साल 2010 में प्रकाशित हुआ था.)

ऐसी मान्यता है कि ईसा मसीह ने सूली से बचकर अपने बाक़ी दिन कश्मीर में गुज़ारे.

और इसी आस्था के कारण श्रीनगर में उनका एक मज़ार बना दिया गया जो विदेशी यात्रियों के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान बन चुका है.

श्रीनगर के पुराने शहर की एक इमारत को रौज़ाबल के नाम से जाना जाता है.

ये शहर के उस इलाक़े में स्थित है जहाँ भारतीय भारतीय सुरक्षा बल की गश्त बराबर जारी रहती है या फिर वह अपने ठिकानों से सर निकाले चौकसी करते हुए नज़र आते हैं.

इसके बावजूद वहां सुरक्षाकर्मियों को कभी-कभी चरमपंथियों से मुठभेड़ का सामना करना पड़ता है तो कभी पत्थर फेंकते बच्चों का.

सुरक्षा स्थिति में बेहतरी से सैलानियों के लौटने की उम्मीद जवान होती है.

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एक साधारण इमारत

पिछली बार जब हमने रौज़ाबल की तलाश की थी तो टैक्सी वाले को एक मस्जिद और दरगाह के कई चक्कर लगाने पड़े थे.

काफ़ी पूछने के बाद ही हमें वो जगह मिली थी.

ये रौज़ाबल एक गली के नुक्कड़ पर है और पत्थर की बनी एक साधारण इमारत है.

एक दरबान मुझे अंदर ले गया और उसने मुझे लकड़ी के बने कमरे को ख़ास तौर से देखने के लिए कहा जो कि जालीनुमा जाफ़री की तरह था.

इन्हीं जालियों के बीच से मैंने एक क़ब्र देखी जो हरे रंग की चादर से ढकी हुई थी.

दो हज़ार साल पहले

इस बार जब मैं फिर से यहां आया तो ये बंद था. इसके दरवाज़े पर ताला लगा था क्योंकि यहां काफ़ी पर्यटक आने लगे थे. इसका कारण क्या हो सकता था.

नए ज़माने के ईसाइयों, उदारवादी मुसलमानों और दाविंची कोड के समर्थकों के मुताबिक़ भारत में आने वाले सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति का यहां शव रखा है.

आधिकारिक तौर पर ये मज़ार एक मध्यकालीन मुस्लिम उपदेशक यूज़ा आसफ़ का मक़बरा है.

लेकिन बड़ी संख्या में लोग ये मानते हैं कि यह नज़ारेथ के यीशु यानी ईसा मसीह का मज़ार है.

उनका मानना है कि सूली से बचकर ईसा मसीह 2000 साल पहले अपनी ज़िंदगी के बाक़ी दिन गुज़ारने कश्मीर चले आए थे.

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'वो प्रोफ़ेसर'

रियाज़ के परिवार वाले इस रौज़े की देख-भाल करते हैं और वे नहीं मानते कि ईसा यहां दफ़न हैं.

उन्होंने कहा, "ये कहानी स्थानीय दुकानदारों की फैलाई हुई है क्योंकि किसी प्रोफ़ेसर ने कह दिया था कि ये क़ब्र ईसा मसीह की है."

"दुकानदारों ने सोचा की ये उनके कारोबार के लिए काफ़ी अच्छा होगा. पर्यटक आएंगे. आख़िर इतने सालों की हिंसा के बाद."

रियाज़ ने ये भी कहा, "और फिर ये हुआ कि लोनली प्लैनेट में इसके बारे में ख़बर प्रकाशित हुई और फिर ये हुआ कि बहुत सारे लोग यहां आने लगे."

उसने मेरी ओर खेद भरी नज़रों से देखते हुए कहा, "एक बार एक विदेशी यहां आया और मक़बरे से एक टुकड़ा तोड़ कर अपने साथ ले गया."

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ईसा का मज़ार

कहानी सुनाते हुए रियाज़ ने बताया, "एक बार एक थका-हारा और मैला ऑस्ट्रेलियाई जोड़ा अपने हाथ में लोनली प्लेनेट का नया ट्रैवेल गाइड लिए यहां पहुंचा."

"इसमें ईशनिंदा पर कुछ आपत्तियों के साथ ईसा की मज़ार के बारे में लिखा गया था."

"उन्होंने मुझे मज़ार के बाहर उनकी तस्वीर लेने के लिए कहा क्योंकि मज़ार बंद था. वे इस बात से ज़्यादा परेशान नहीं हुए."

उनका कहना था कि उनके लिए ईसा का मज़ार भारत में उनकी यात्रा के दौरान उन स्थानों की सूची में शामिल था जिन्हें देखना उन्होंने अनिवार्य कर रखा था.

यानी अपनी मस्ट-विज़िट लिस्ट में शामिल कर रखा था.

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बौद्ध सम्मेलन

श्रीनगर के उत्तर में पहाड़ों पर एक बौद्ध विहार के खंडहर हैं जिसका ज़िक्र उस समय तक लोनली प्लेनेट में नहीं हो सका था.

ये वो जगह है जहां हम पहले नहीं जा सके थे क्योंकि एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया था कि वो इलाक़ा चरमपंथियों से भरा हुआ है.

लेकिन अब ऐसा लगता है कि वहां के चौकीदार बहुत सारे पर्यटकों के आने के लिए तैयार हैं.

क्योंकि उन्होंने अंग्रेज़ी के 50 शब्द सीख लिए हैं और वे अपने छुपे हुए पुराने टेराकोटा टाइलों को बेचने का इरादा रखते हैं.

उन्होंने मुझे बताया कि सन 80 में हुए महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध बौद्ध सम्मेलन में ईसा मसीह ने भाग लिया था.

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ईसा से जुड़ी कहानियां

यहां तक कि उन्होंने वह जगह भी बताई कि ईसा मसीह उस सम्मेलन में कहां बैठे थे. ईसा मसीह के संदर्भ में ये कहानियां भारत में 19वीं शताब्दी से प्रचलित हैं.

ये उन कोशिशों का नतीजा थीं जिसमें बुद्धिजीवियों में 19वीं सदी के दौरान बौद्ध और ईसाई धर्मों के बीच समानता को उजागर करने की कोशिश की गई थी.

ऐसी ही इच्छा कुछ ईसाइयों की थी कि वे ईसा मसीह की कोई कहानी भारत से जोड़ सकें.

ईसा मसीह के कुछ वर्षों के बारे में कुछ पता नहीं है कि वह 12 साल की आयु से लेकर 30 वर्ष की आयु तक कहाँ थे.

कुछ लोगों का मानना है कि वह भारत में बौद्ध धर्म का ज्ञान प्राप्त कर रहे थे, लेकिन आम तौर पर इसे सही नहीं माना जाता है.

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