कैसी और कितनी ताक़तवर थी आज़ाद हिंद फ़ौज सरकार

  • 21 अक्तूबर 2018
नेताजी सुभाष चंद्र बोस, आज़ाद हिंद फौज सरकार इमेज कॉपीरइट Netaji Research Bureau

आज़ाद हिंद फौज सरकार की स्थापना के 75 साल पर आयोजित कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल क़िले से तिरंगा फहराया.

इस मौके पर उन्होंने कहा कि 75 साल पहले देश से बाहर बनी 'आज़ाद हिंद सरकार' अखंड भारत की सरकार थी, अविभाजित भारत की सरकार थी.

इस दौरान उन्होंने महिलाओं, सैनिकों की बात की और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के योगदान की चर्चा की.

इस दौरान मोदी ने कहा, "आज़ाद हिंद फ़ौज पर जब मुक़दमा चलाया गया था तब उसकी सुनवाई के दौरान शाह नवाज़ ख़ान ने कहा था कि सुभाष चंद्र बोस वो पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भारत के होने का अहसास उनके मन में जगाया. वो पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भारत के लोगों को भारतीय की नज़र से देखना सिखाया."

आखिर प्रधानमंत्री जिस 'आज़ाद हिंद फ़ौज सरकार' का ज़िक्र कर रहे हैं उसके बारे में क्या पता है, चलिए जानते हैं.

सुभाषचंद्र बोस क्रांतिकारी नेता थे, उनका लक्ष्य भारत की आज़ादी था. राजनेता, कूटनीतिज्ञ होने के साथ ही वो एक स्पष्ट वक्ता थे. अंग्रेज़ों से भारत की मुक्ति के लिए वो किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करना चाहते थे.

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शुरू-शुरू में वो महात्मा गांधी के साथ देश की आज़ादी के आंदोलन में शरीक थे लेकिन बाद में मतभिन्नता की वजह से गांधी और कांग्रेस से अलग होकर 1939 में उन्होंने फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की.

सुभाष का मानना था की जब अंग्रेज़ द्वितीय विश्व-युद्ध में फंसे हैं तभी उनकी राजनितिक अस्थिरता का फ़ायदा उठाते हुए स्वतंत्रता के प्रयास किए जाने चाहिए न कि यह इंतज़ार करना चाहिए कि युद्ध की समाप्ति पर अंग्रेज़ हमें स्वतंत्रता दे दें.

उन्होंने भारत को द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल किए जाने का विरोध किया. अंग्रेज़ों ने उन्हें जेल में डाल दिया. उन्होंने जेल में भूख हड़ताल कर दी, इसके बाद अंग्रेज़ों ने उन्हें जेल से निकालकर उनके ही घर में नज़रबंद किया.

सुभाष बोस इसी दौरान भारत से जर्मनी भाग गए. वहां युद्ध का मोर्चा देखा और युद्ध लड़ने की ट्रेनिंग ली.

वहीं उन्होंने सेना का गठन किया.

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आज़ाद हिंद फ़ौज और उसका विस्तार

जर्मनी में रहने के दौरान उन्हें जापान में रह रहे आज़ाद हिंद फ़ौज के संस्थापक रासबिहारी बोस ने आमंत्रित किया.

डॉक्टर राजेंद्र पटोरिया अपनी किताब 'नेताजी सुभाष' में लिखते हैं, "4 जुलाई 1943 को सिंगापुर के कैथे भवन में एक समारोह में रासबिहारी बोस ने आज़ाद हिंद फ़ौज की कामन सुभाष चंद्र बोस के हाथों में सौंप दी."

इसके बाद सुभाष चंद्र बोस ने आज़ाद हिंद के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार बनाई जिसे जर्मनी, जापान, फिलिपींस, कोरिया, चीन, इटली, आयरलैंड समेत नौ देशों ने मान्यता भी दी.

आज़ाद हिंद सरकार

उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज को बेहद शक्तिशाली बना दिया. फ़ौज को आधुनिक युद्ध के लिए तैयार करने की दिशा में जन, धन और उपकरण जुटाए.

राजेंद्र पटोरिया लिखते हैं, "आज़ाद हिंद की ऐतिहासिक उपलब्धि थी कि उसने जापान की मदद से अंडमान निकोबार द्वीप समूह को भारत के पहले स्वाधीन भूभाग के रूप में प्राप्त किया."

नेताजी ने राष्ट्रीय आज़ाद बैंक और स्वाधीन भारत के लिए अपनी मुद्रा के निर्माण के आदेश दिए.

आज़ाद हिंद सरकार के बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल क़िले की प्राचीर से बताया, "आज़ाद हिंद सरकार ने हर क्षेत्र से जुड़ी योजनाएं बनाई थीं. इसका अपना बैंक था, अपनी मुद्रा थी, अपना डाक टिकट था, अपना गुप्तचर तंत्र था."

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Image caption रानी झांसी रेजीमेंट

महिला सशक्तीकरण

नेताजी अपने युग के बहुत आगे की सोच रखते थे. उन्होंने आज़ाद हिन्द फ़ौज में महिला रेजिमेंट का गठन किया था, जिसकी कमान कैप्टन लक्ष्मी स्वामीनाथन के हाथों में थी.

इसे रानी झांसी रेजिमेंट भी कहा जाता था.

प्रधानमंत्री ने इस रेजिमेंट का ज़िक्र भी लाल क़िले से दिए अपने भाषण में किया. उन्होंने कहा कि सशस्त्र महिला रेजिमेंट की शुरुआत नेताजी ने ही की थी और 22 अक्तूबर को रानी झांसी रेजिमेंट को 75 साल पूरे हो रहे हैं.

सुभाष चंद्र बोस का मानना था कि आज़ादी की इच्छा हर भारतीय के दिल में उठे तो भारत को स्वतंत्र होने से कोई रोक नहीं सकेगा.

इसके लिए उन्होंने अपने लेखों, भाषणों में लिखना-बोलना शुरू किया. उन्होंने 'फॉरवर्ड' नाम से पत्रिका के साथ ही आज़ाद हिंद रेडियो की स्थापना की और जनमत बनाया.

बेहद कम साधनों के साथ आज़ाद हिंद फ़ौज, आज़ाद हिंद सरकार, आज़ाद हिंद रेडियो और रानी झांसी रेजिमेंट नेताजी की विशेष उपलब्धियां रही.

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हार ग आज़ाद हिंद फ़ौज

इंफाल और कोहिमा के मोर्चे पर कई बार भारतीय ब्रिटेश सेना को आज़ाद हिंद फ़ौज ने युद्ध में हराया.

लेकिन जर्मनी और इटली की हार के साथ ही 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो गया. युद्ध में लाखों लोग मारे गए. जब यह युद्ध ख़त्म होने के क़रीब था तभी 6 और 9 अगस्त 1945 को अमरीका ने जापान के दो शहरों- हिरोशिमा और नागासाकी पर एटम बम गिरा दिए. इसमें दो लाख से भी अधिक लोग मारे गए. इसके फौरन बाद जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया.

डॉक्टर राजेंद्र पटोरिया अपनी किताब 'नेताजी सुभाष' में लिखते हैं, "जापान की हार के बाद बेहद कठिन परिस्थितियों में फ़ौज ने आत्मसमर्पण कर दिया और फिर सैनिकों पर लाल क़िले में मुक़दमा चलाया गया. जब यह मुक़दमा चल रहा था तो पूरा भारत भड़क उठा और जिस भारतीय सेना के बल पर अंग्रेज़ राज कर रहे थे, वे विद्रोह पर उतर आए."

"नौसैनिक विद्रोह ने ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत में अंतिम कील जड़ दी. अंग्रेज़ अच्छी तरह समझ गए कि राजनीति व कूटनीति के बल पर राज्य करना मुश्किल हो जाएगा. उन्हें भारत को स्वाधीन करने की घोषणा करनी पड़ी."

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आखिर क्या हुआ था उस विमान में जिसमें सुभाष बोस सफर कर रहे थे.

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