छत्तीसगढ़: चुनावों में क्या नोटा तय करेगा राजनीति की दिशा

  • 24 अक्तूबर 2018
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छत्तीसगढ़ में अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनाव में क्या फिर नोटा यानी 'इनमें से कोई नहीं' का विकल्प ही राज्य की राजनीति की दिशा को तय करेगा?

राजनीतिक दलों को यह सवाल इसलिये परेशान कर रहा है क्योंकि पिछले विधानसभा चुनाव में नोटा ने राजनीतिक दलों के सारे चुनावी गणित धराशायी कर दिये थे.

पिछले दिनों संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी लोगों से नोटा का बटन न दबाने की अपील की है. छत्तीसगढ़ में नोटा की बढ़ती लोकप्रियता को मोहन भागवत के बयान से जोड़कर देखा जा सकता है.

साल 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में राज्य की 90 में से 35 सीटें ऐसी थीं, जहां नोटा तीसरे नंबर पर था. आंकड़ों को देखें तो सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और विपक्षी दल कांग्रेस के बीच पिछले चुनाव में वोटों का अंतर केवल 0.75 प्रतिशत था, जबकि मतदाताओं ने नोटा में 3.16 प्रतिशत वोट डाले थे. यानी हार-जीत के अंतर से तीन गुणा अधिक वोट नोटा में डाले गये थे.

हालत ये हुई कि ख़ास परिस्थितियों में सितंबर 2014 में हुये अंतागढ़ विधानसभा उप-चुनाव में नोटा दूसरे नंबर पर जा पहुंचा.

छत्तीसगढ़ में राजनीतिक मामलों के जानकार ब्रजेंद्र शुक्ला कहते हैं, "नोटा केवल असंतोष नहीं दिखाता है बल्कि यह बताता है कि हमारी प्रजातांत्रिक व्यवस्था में किस तरह की गड़बड़ियां हैं."

"आदिवासी इलाक़ों में सरकार विकास के चाहे लाख दावे करे लेकिन एक पढ़ा लिखा वर्ग यह मानता है कि छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाक़ों में विकास की रोशनी अब तक नहीं पहुँची. नोटा के आँकड़े यही दर्शाते हैं."

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नोटा का डर

छत्तीसगढ़ में नवंबर महीने की 12 और 20 तारीख़ को विधानसभा चुनाव के लिये मतदान होना है. इस बार सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और विपक्षी दल कांग्रेस के अलावा एक तीसरा मोर्चा भी है.

पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की पार्टी छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठबंधन पहली बार एक साथ मैदान में उतरा है.

आम आदमी पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी जैसे राजनीतिक दल तो हैं ही.

लेकिन कई इलाक़ों में राजनीतिक दलों की चिंता नोटा से कहीं अधिक जुड़ी हुई है. यह चिंता अस्वाभाविक भी नहीं है.

पिछले लोकसभा चुनाव में राज्य की 11 सीटों में से पांच सीटों पर मतदाताओं ने नोटा का जमकर इस्तेमाल किया और नोटा तीसरे नंबर पर रहा.

माओवाद प्रभावित बस्तर में 38,772 मतदाताओं ने नोटा का इस्तेमाल किया था, जहां आम आदमी पार्टी की प्रत्याशी सोनी सोरी को केवल 16903 वोट से संतोष करना पड़ा था. इसी तरह कांकेर में 31,917 मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया है.

यहां तक कि मुख्यमंत्री रमन सिंह के गृह ज़िले राजनांदगांव में भी 32,384 लोगों ने नोटा को चुना. यहां से रमन सिंह के पुत्र अभिषेक सिंह को जनता ने अपना सांसद चुना था.

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हार-जीत से अधिक नोटा

नोटा के प्रति लोगों के उत्साह को इस आंकड़े से समझा जा सकता है कि मुख्यमंत्री रमन सिंह के गृह ज़िले कवर्धा और राजनांदगांव में पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान लोगों ने बढ़-चढ़कर नोटा का बटन दबाया.

कवर्धा में पिछले चुनाव में हार-जीत का अंतर 2558 वोटों का था, जबकि नोटा में 9229 वोट डाले गये.

इसी तरह खैरागढ़ में हार-जीत का अंतर 2190 और डोंगरगढ़ में यह आंकड़ा 1698 था. जबकि इन सीटों पर नोटा का बटन दबाने वालों की संख्या क्रमशः 4643 और 4062 थी.

पिछले विधानसभा चुनाव के परिणाम बताते हैं कि विधानसभा की सात सीटें ऐसी थीं, जहां हार-जीत के अंतर से कहीं अधिक वोट नोटा में डाले गए थे.

34 सीटों पर नोटा तीसरे नंबर पर था. इसके अलावा विधानसभा की 10 सीटें ऐसी थीं, जिन पर पांच हज़ार से अधिक वोट नोटा में डाले गये.

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नोटा के प्रति उत्सुकता

पिछले विधानसभा में चित्रकोट में कांग्रेस के दीपक बैज को कुल 50303 वोट मिले और जनता ने 10848 वोट नोटा में डाला था.

दंतेवाड़ा में कांग्रेस की देवती कर्मा कुल 5987 वोटों से जीतीं लेकिन वहां 9677 लोगों ने नोटा में वोट डाला. कांकेर में कांग्रेस के शंकर ध्रुवा की जीत का अंतर 4625 था, जबकि नोटा का इस्तेमाल करने वालों की संख्या 5208 थी.

इसी तरह कोंडागांव में कांग्रेस के ही मोहन मरकाम 5135 वोटों से जीते, वहां 6773 लोगों ने नोटा में वोट डालना पसंद किया. चित्रकोट में कांग्रेस के दीपक बैज को कुल 50303 वोट मिले और जनता ने 10848 वोट नोटा में डाले थे.

छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता संजय श्रीवास्तव की राय है कि चुनाव के दो महीने पहले ही नोटा लागू हुआ था, इसलिये नवंबर 2013 में लोगों की उत्सुकता थी और लोगों ने नोटा में बटन दबा दिया.

संजय श्रीवास्तव कहते हैं, "इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि राजनीतिक दलों को अपने उम्मीदवारों के चयन में ईमानदार लोगों को प्राथमिकता देनी ही पड़ेगी, नहीं तो जनता इसी तरह नकारेगी."

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मशीन उल्टी तो नोटा पड़ गया भारी

लेकिन पिछले चुनाव में कवर्धा से 2558 वोटों के अंतर से चुनाव हारने वाले कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार मोहम्मद अकबर का मानना है कि वोटिंग मशीन को उल्टा रखने के कारण मतदाताओं में भ्रम की स्थिति बनी और वे चुनाव हार गये.

इस विधानसभा में नोटा के खाते में 9229 वोट पड़े थे.

मोहम्मद अकबर ने पिछले महीने ही चुनाव आयोग के समक्ष प्रदर्शन करके अनुरोध किया कि इस चुनाव में वोटिंग मशीन सीधी रखी जाये, यह बात चुनाव आयोग सुनिश्चित करे.

अकबर का दावा है कि उनका नाम वोटिंग मशीन में सबसे ऊपर था. लेकिन कई जगह मशीन उल्टी रख दी गई और उनका नाम नीचे आ गया. जबकि नोटा का विकल्प सबसे ऊपर हो गया.

जिन मतदाताओं को समझाया गया था कि वो पहले नंबर के बटन को दबा कर उन्हें वोट दे सकते हैं, उन्होंने नोटा का बटन दबा दिया.

आदिवासी महासभा के राष्ट्रीय महासचिव और कोंटा विधानसभा से सीपीआई के उम्मीदवार मनीष कुंजाम का दावा कुछ और ही है.

कुंजाम कहते हैं, "आदिवासी बहुल इलाकों में अभी भी वोटिंग मशीन को लेकर जागरुकता नहीं है. ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक है जो पहले या अंतिम नंबर के बटन को दबाकर आ जाते हैं."

"इन इलाक़ों में अगर बैलेट पेपर से मतदान हो तब आप नोटा के आंकड़े दिखा दें. स्थिति एकदम बदल जायेगी."

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