अलीगढ़ में साधुओं की हत्या और मुसलमानों के एनकाउंटर का सच: BBC INVESTIGATION

  • 24 अक्तूबर 2018
अलीगढ़ एनकाउंटर

तक़रीबन एक महीने पहले अलीगढ़ के छह पुजारियों और किसानों की "निर्मम" हत्याओं का दोषी बताकर उत्तर प्रदेश पुलिस ने अतरौली के दो मुसलमान युवकों को 'एनकाउंटर' में मारा था.

बीबीसी ने अपनी विशेष पड़ताल में पाया है कि पुलिस और गवाहों की कहानी आपस में मेल नहीं खाती है और कई गंभीर सवाल हैं जो इस पूरे घटनाक्रम को शक के घेरे में लाते हैं.

यहां तक कि मारे गए पुजारियों और किसानों के परिजन ही इस पुलिस मुठभेड़ पर सवाल खड़े कर रहे हैं.

अलीगढ़ पुलिस एनकाउंटर की पूरी कहानी बताने से पहले हम पाठकों को बता दें कि बीते एक साल के दौरान उत्तर प्रदेश में हुए 1500 से ज़्यादा पुलिस मुठभेड़ों में 67 कथित अपराधी मारे गए हैं.

पुलिस मुठभेड़ों के इस सिलसिले में ब्रेक तब लगा जब बीते सितंबर के आख़िर में लखनऊ शहर के बीचों-बीच एप्पल के अधिकारी विवेक तिवारी की हत्या पुलिस एनकाउंटर में कर दी गई.

यह बात सामने आई कि उन्होंने पुलिस के कहने पर अपनी गाड़ी नहीं रोकी थी. विवेक पर गोली चलाने वाले पुलिस कॉन्स्टेबल गिरफ़्तार तो हो गए, लेकिन इस हत्या ने आम जनता का ध्यान पुलिस के रवैए की ओर खींचा.

प्रदेश में हो रहे पुलिस एनकाउंटरों पर सुप्रीम कोर्ट ने भी उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब तलब किया है.

विवेक तिवारी की हत्या के साथ ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का जून 2017 में दिया गया यह बयान दोबारा सुर्खियों में आ गया- 'अपराध करेंगे तो ठोक दिए जाएंगे.'

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Image caption एनकाउंटर स्थल पर गोलियों के निशान

उत्तर प्रदेश में जारी मुठभेड़ों की पड़ताल के लिए बीबीसी ने बीते पखवाड़े राज्य के अलीगढ़, आजमगढ़, मेरठ, बागपत और लखनऊ ज़िलों का दौरा किया. इस पड़ताल के दौरान हमने प्रभावित परिवारों, पीड़ितों और पुलिस अधिकारियों के साथ-साथ मंत्रियों तक से बात की.

इस सिलसिले में हमने स्पेशल टास्क फ़ोर्स, एंटी टेरर स्क्वॉड, स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप, थानों में कार्यरत पुलिस अधिकारियों से लेकर पुलिस महानिदेशक तक से बातचीत की. विवादास्पद मुठभेड़ों से जुड़े दर्जनों दस्तावेज़ों को खंगालने के बाद जो कुछ सामने आया, उसे हम तीन कड़ियों की एक विशेष शृंखला के तौर पर आपके सामने रख रहे हैं.

उत्तर प्रदेश में जारी मुठभेड़ों पर बीबीसी की इस विशेष पड़ताल की शृंखला की पहली कड़ी में पढ़िए अलीगढ़ एनकाउंटर की कहानी.

अलीगढ़ एनकाउंटर

कहानी पेचीदा भी है. इसे आसानी से समझने के लिए शुरुआत करते हैं वहीं से जहां से पूरे मामले की शुरुआत हुई.

20 सितंबर की सुबह अलीगढ़ के हरदुआगंज इलाक़े में हुआ एक पुलिस 'एनकाउंटर'. यहां अंग्रेज़ों के ज़माने के खंडहरनुमा बंगले में तड़के डेढ़ घंटे तक चली मुठभेड़ के बाद पुलिस ने मीडिया को बताया कि इस कार्रवाई में मुस्तकीन और नौशाद नाम के दो 'बदमाश' युवकों की मौत हो गई है.

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टीवी पत्रकारों की मौजूदगी में हुए इस 'एनकाउंटर' के बाद अलीगढ़ पुलिस ने एक इंस्पेक्टर के घायल होने का दावा भी किया. पुलिस के अनुसार एनकाउंटर में मारे गए 25 वर्षीय मुस्तकीन और 22 वर्षीय नौशाद, इसी साल अगस्त और सितंबर में अलीगढ़ में हुई छह हत्याओं में शामिल थे.

कौन सी थी वह छह हत्याएं?

तक़रीबन एक महीने के भीतर ज़िले में हुई छह हत्याओं का सिलसिला अलीगढ़ के पाली मुकीमपुर थाना क्षेत्र में दोहरे हत्याकांड से शुरू हुआ.

12 अगस्त की रात पाली मुकीमपुर थाना क्षेत्र के भूडरा आश्रम रोड पर बने एक शिव मंदिर में अज्ञात हमलावरों ने धावा बोल दिया. उस वक़्त मंदिर में दो पुजारियों समेत तीन लोग सो रहे थे.

हमलावरों ने डंडों से पीट-पीट कर दो लोगों की हत्या कर दी और तीसरे को मरा हुआ समझकर फ़रार हो गए. मृतकों में मंदिर के 70 वर्षीय पुजारी और पड़ोस के गांव में रहने वाले एक 45 वर्षीय किसान शामिल थे.

दूसरी घटना 26 अगस्त की रात ज़िले के अतरौली क़स्बे में हुई. यहां बहरवाद नाम के एक गांव से लगे खेतों में अपने ट्यूब-वेल पर सो रहे मंटूरी सिंह नामक एक किसान की लाठियों से पीट-पीट कर हत्या कर दी गई. हमलावर अब भी अज्ञात थे और घटना के बाद फ़रार हो गए थे.

तीसरी घटना 14 सितंबर की रात हरदुआगंज के कलाई गांव के पास बसे दुरैनी आश्रम में हुई. यहां भी अज्ञात हमलावरों ने एक साधु की डंडों से पीट-पीट कर हत्या कर दी. उस रात मंदिर के पास ही खेतों में कीटनाशक दवाई डाल रहे एक किसान दंपती की भी निर्मम हत्या कर दी गई.

इस हमले में मारे गए किसान दंपती प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के दूर के रिश्तेदार थे.

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इन हत्याओं के बाद से पुलिस पर मामलों को सुलझाने का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा था. तभी 18 सितंबर को पांच लोगों की गिरफ़्तारी और तीन की फ़रारी दिखाते हुए पुलिस ने हत्याओं के सभी छह मामले सुलझा लेने का दावा किया.

अब सवाल यह उठता है कि साबिर अली उर्फ़ दिनेश प्रताप सिंह, सलमान, इरफ़ान, यसीन और नदीम नामक गिरफ़्तार हुए ये पांच लोग कौन थे? साथ ही फ़रार बताए गए मुस्तकीन, नौशाद और अफ़सर का इन आरोपियों से क्या ताल्लुक़ था? और आख़िर में यह कि इन सब बातों का मुस्तकीन और नौशाद के एनकाउंटर से क्या संबंध था?

इस पड़ताल के दौरान बीबीसी को इन सवालों के अलग-अलग जवाब मिले.

मुस्तकीन और नौशाद को जिन छह हत्याओं के लिए ज़िम्मेदार माना जा रहा है उसमें मारे गए साधुओं और किसानों के परिजनों के बयान, पुलिस की कहानी से बिल्कुल अलग हैं.

यहां तक कि इन हमलों में ज़िंदा बच गए एक पुजारी भी पुलिस तहकीकात में सामने आए नतीजों से इत्तेफाक़ नहीं रखते. साथ ही, मुस्तकीन और नौशाद के अपने परिजन घटनाक्रम का एक अलग ही किस्सा सुनाते हैं. लेकिन मृतकों, चश्मदीदों और पीड़ितों के परिजनों का पक्ष जानने से पहले जानते हैं इस पूरे मामले में पुलिस का पक्ष क्या है.

पुलिस का पक्ष

बीबीसी को दिए 45 मिनट लंबे इंटरव्यू में वरिष्ठ ज़िला पुलिस अधीक्षक अजय साहनी ने अलीगढ़ एनकाउंटर की पृष्ठभूमि बताते हुए एक लंबी कहानी सुनाई.

उनकी कहानी के केंद्र में एक नया किरदार था- एटा के शहर क़ाज़ी के क़त्ल के जुर्म में मुक़दमा झेल रहे साबिर अली उर्फ़ दिनेश प्रताप सिंह.

Image caption नौशाद

साहनी बताते हैं, "मूलतः एटा ज़िले के निवासी साबिर अली का असली नाम दिनेश प्रताप सिंह है. यह जाति से जाटव हैं और धर्म परिवर्तन के बाद भी आरक्षण का फ़ायदा उठाकर एटा में सभासद रह चुके हैं. तहक़ीक़ात से मालूम चला कि पहले एटा के किदवई नगर में अभियुक्त साबिर अली की ज़मीन हुआ करती थी. अपनी ज़मीन में से कुल दो बीघे का हिस्सा अभियुक्त ने मदरसा बनाने के लिए दान में दे दिया. मदरसा चलाने के लिए बिहार से शहज़ाद नाम के मुफ़्ती बुलवाए गए. बच्चे आकर पढ़ने लगे और मदरसा ठीक-ठाक चलने लगा. इस बीच ज़मीन के दाम बढ़ गए और साबिर ने मदरसे की ज़मीन को बेचना चाहा. लेकिन मुफ़्ती शहज़ाद ने मदरसा छोड़ने से साफ़ मना कर दिया. काफ़ी डराने-धमकाने के बाद भी जब मुफ़्ती मदरसा छोड़ने को राज़ी नहीं हुए तो अप्रैल 2016 में साबिर ने दो शूटरों को किराए पर लेकर मुफ़्ती की हत्या करवा दी."

Image caption वह खंडहर जहां अलीगढ़ एनकाउंटर हुआ था

पुलिस के मुताबिक़ मुफ़्ती को अपनी जान पर मंडरा रहे ख़तरे का अंदेशा था इसलिए उन्होंने अपनी पत्नी और बेटे को साबिर से मिल रही धमकियों के बारे में बता रखा था. मुफ़्ती के क़त्ल के बाद उनकी पत्नी ने साबिर के ख़लाफ़ अपने पति की हत्या का मुकदमा दर्ज करवाया. मुफ़्ती का बेटा शोएब- जो कि मौका-ए-वारदात पर मौजूद था- इस मामले में चश्मदीद गवाह बना.

साहनी बताते हैं कि एटा पुलिस ने 40 दिनों के भीतर ही इस साज़िश का पर्दाफ़ाश कर साबिर को उसके बेटे नदीम सहित गिरफ्तार कर लिया. जेल में साबिर की मुलाक़ात असगर, अफ़सर और पाशा नाम के तीन'बावरियों' (घूमंतु जाति) से हुई और उनमें दोस्ती हो गई.

"साबिर कुछ दिनों बाद बेल पर रिहा तो हो गया, लेकिन मुफ़्ती हत्याकांड में उसे सज़ा होने का डर था इसलिए बाहर आते ही उसने असगर, अफ़सर और पाशा की ज़मानत करवाई और बदले में उनसे मुफ़्ती के मुकदमे में उसके ख़िलाफ़ गवाही देने वाले लोगों को झूठे मुकदमों में फंसाने के लिए कहा."

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Image caption नौशाद और मुस्तकीन के घरों के बाहर पुलिस का पेहरा

साहनी के मुताबिक़ बीते एक महीने में अलीगढ़ में हुए हर हत्याकांड के बाद पुलिस को मौक़ा-ए-वारदात से एक पर्ची मिला करती थी- जिस पर कुछ नाम और नंबर दर्ज होते थे.

साहनी बाताते हैं कि यह नाम हाजी क़ौसर, जान मोहमम्द और फ़िरोज़ उर्फ़ काले नेता नाम के तीन एटा निवासियों के थे. यह तीनों ही मुफ़्ती के क़त्ल के मुक़दमे में साबिर अली के खिलाफ पेश होने वाले मुख्य गवाह हैं.

वह आगे जोड़ते हैं, "पाली-मुकीमपुर में हुए पहले हत्याकांड के बाद जब हमें मोबाइल नंबरों की पर्ची मिली तो हमने इन नंबरों की जांच की. मालूम चला कि घटनास्थल से साधुओं से लूटे गए फ़ोन से इन 3 गवाहों के नंबरों पर देर रात फ़ोन करके अनर्गल बातें की गई थीं.

दूसरे हत्याकांड में हमें पाली-मुकीमपुर की वारदात में लूटे गए साधुओं के फ़ोन घटनास्थल पर पड़े मिले और फिर वही नंबरों वाली पर्ची भी. सब कुछ प्लांट किया हुआ लग रहा था. सच्चाई जानने के लिए हमने एटा से इन गवाहों को बुलाकर पूछताछ की. तीनों ने साबिर अली पर शक ज़ाहिर किया.अब हमने साबिर का नंबर सर्विलेंस पर डाला और पाया कि अतरौली के एक नंबर से इनकी बात ज़्यादा हो रही थी. वो जियो का नंबर था और लोकेशन थी अतरौली के भैंसपाड़ा में मौजूद मुस्तकीन और नौशाद का घर."

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Image caption भैंसपाड़ा

पुलिस का कहना है कि 18 सितंबर को उन्होंने भैंसपाड़ा में रेड डालकर साबिर, सलमान, इरफ़ान, यसीन और नदीम को तो गिरफ्तार कर लिया, लेकिन मुस्तकीन, नौशाद और अफ़सर मौक़े से फरार हो गए. फिर 20 सितंबर की सुबह अचानक नौशाद और मुस्तकीन को चोरी की बाइक के साथ वायरलेस इंटरसेप्ट की मदद से पकड़ा गया. "वह दोनों गश्त कर रही पुलिस टीमों को चकमा देकर भागने का प्रयास कर रहे थे. पर हमने उन्हें उस खंडहर में कॉर्नर करके घेर लिया. उन्होंने पुलिस टीम पर गोलियां चलाईं इसलिए आत्मरक्षा में फ़ायर करते हुए हमें कार्रवाई करनी पड़ी. जवाबी गोलीबारी में दोनों मारे गए."

एनकाउंटर की वैधता पर उठ रहे सवालों का जवाब देते हुए साहनी मुस्तकीन और नौशाद को लगभग बंग्लादेशी बताते हुए कहते हैं, "अभी मैं इनका फ़ैमिली ट्री बना रहा था. इन लोगों का कुछ समझ ही नहीं आता. परिवार में आपस में ही शादियां की हुई हैं सबने. नाम और जगह बदल-बदल कर रहते थे. इनकी जड़ें ढूंढते हुए हम पश्चिम बंगाल के पुरुलिया ज़िले तक तो पहुंच गए हैं. आगे शायद बांग्लादेश का कनेक्शन भी निकल सकता है. यह दोनों पुराने अपराधी थे. मुस्तकीन चोरी-डकैती में जेल भी काट चुका था". यहीं मैंने पुलिस अधीक्षक से नौशाद के बारे में पूछा, 'छोटा वाला भी?". जवाब में उन्होंने कहा, "छोटे वाले के डीटेल्स अभी जेल से निकलवा रहे हैं. वह भी जल्दी ही कंफ़र्म हो जाएगा."

पुजारी और उनका परिवार

इस पड़ताल के दौरान हम सबसे पहले पाली-मुकीमपुर थाने के उस भूडरा आश्रम पहुंचे, जहां से हत्याओं का यह सिलसिला शुरू हुआ था. थाने के रूपवास गांव के मुहाने पर मौजूद एक शिव मंदिर और मंदिर से सटे दो कमरों की इमारत को ही पाली-मुकीमपुर में भूडरा आश्रम के नाम से जाना जाता है.

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Image caption भूडरा आश्रम

आश्रम के सामने एक खुला मैदान था. कुछ बुज़ुर्ग ग्रामीण मैदान में पेड़ों के नीचे चारपाई डालकर बैठे हुए थे. सुरक्षा के लिए पुलिस के दो सिपाही भी आश्रम में तैनात थे. साथ ही मंदिर के पड़ोस में एक पुलिस चौकी का निर्माण भी चल रहा था. आश्रम के सामने ही चादरों से ढकी एक कब्र भी नज़र आ रही थी. ग्रामीणों से बातचीत करने पर मालूम हुआ कि सामने मौजूद कब्र मृतक साधु कालिदास की है. सिपाहियों की तैनाती और चौकी का निर्माण कार्य भी 12 अगस्त की रात मंदिर में हुए हत्याकांड के बाद ही शुरू हुआ था.

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आश्रम के सामने बैठे 70 वर्षीय लालाराम ने बताया, "गांव वालों ने आपस में चंदा करके लगभग 50 साल पहले यहां यह मंदिर बनवाया था. जब से हमें याद है तब से महात्मा बाबा कालिदास यहीं रहते थे. पास के ही ख़ुशीपुरा गांव के रहने वाले थे. 70 साल के रहे होंगे. ख़ुशीपुरा के ही महेंद्र शर्मा भी उनके साथ रहा करते थे. वह मंदिर में पुजारी थे."

लालाराम बताते हैं, "अपने खेतों में ट्यूबवेल का पानी लगाकर सोनपाल भी मंदिर में ही रुक गए थे. बाबा कालिदास, महेंद्र और सोनपाल, तीनों साथ ही छत पर सो रहे थे जब उन पर हमला हुआ. हम लोगों को तो सुबह पता चला. महात्मा जी और सोनपाल तो मर चुके थे. पुजारी महेंद्र बहुत घायल थे, लेकिन बच गए."

साथ ही बैठे 65 वर्षीय मक्खन सिंह कहते हैं, "उन्हें बहुत बुरी तरह मारा था. लाठियों से पीट-पीट कर कपार (सिर) फाड़ दिए थे. महात्मा जी की तो आंखें भी फोड़ दी थीं. इससे तो अच्छा होता कि गोली मार देते. इतना खून बहा था कि पूरी छत लाल हो गई थी."

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Image caption मंदिर में बैठे ग्रामीण

अलीगढ़ एनकाउंटर के बारे में पूछने पर आश्रम के सामने ही बैठे एक अन्य ग्रामीण पंजाबी सिंह बताते हैं, "असली विवाद तो मंदिर की ज़मीन का है. यह मंदिर यहां सालों से है और कभी कोई समस्या नहीं हुई. लेकिन इस साल गर्मियों में पड़ोस के पीढौल गांव के कुछ लोग आए और कहने लगे कि आश्रम की ज़मीन पर उनके गांव के 10-12 लोगों के पट्टे हैं."

लालाराम बताते हैं कि पीढौल गांव के लोग अगली बार लेखपाल को लेकर आए थे. "उन्होंने मंदिर के आसपास की ज़मीन नपवाई और बाबा को मंदिर छोड़ने की धमकी देकर चले गए."

अलीगढ़ एनकाउंटर में मारे गए मुस्तकीन और नौशाद के बारे में पूछने पर गांववाले कहते हैं, "हमारे रूपवास और ख़ुशीपपुरा गांवों की पूरी ग्राम पंचायत को विश्वास है कि महात्माजी और सोनपाल को पीढौल वालों ने ही मारा है. बाबा की हत्या के बाद उस गांव के कुछ लोग गिरफ्तार भी हुए थे. लेकिन बाद में पुलिस ने उन सबको छोड़ दिया. और फिर इन दो लड़कों को बिना वजह मार डाला. ये छर्रा के मुसलमान क्या करेंगे यहां रूपवास के बाबा को मारकर?"

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Image caption घटना स्थल पर जारी पुलिस चौकी का निर्माण कार्य

ग़ौरतलब है कि छर्रा अलीगढ़ का वह क़स्बा है, जहां एनकाउंटर में मारे गए मुस्तकीन और नौशाद के परिवार अतरौली के अपने वर्तमान निवास में आने से पहले रहा करते थे.

आगे पड़ताल करने पर यह भी मालूम चला कि घटना के 20 दिन बाद पुलिस ने पीढौल गांव के तुलसी और बबलू उर्फ़ कलुआ नाम के दो युवकों को गिरफ्तार भी किया था, लेकिन बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया.

चश्मदीद गवाह

ख़ुशीपुरा गांव में हमारी मुलाक़ात हमले के बाद ज़िंदा बच गए और अब मामले के एकलौते चश्मदीद गवाह पुजारी महेंद्र शर्मा से हुई.

छोटे कद के 50 वर्षीय महेंद्र अपने घर के सामने बिछी चारपाई पर लेटे हुए थे. उनकी भूरी आंखों और लड़खड़ाती आवाज़ में आज भी मौत का खौफ़ साफ़ महसूस होता है.

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Image caption पुजारी महेंद्र शर्मा

सहमी आवाज़ में उन्होंने कहा, "हम सालों से बाबा के साथ मंदिर पर ही रहते थे. अतरौली से तहसीलदार और लेखपाल आश्रम आए. उनके साथ पीढौल की वो महिला-विजय भी थी. मई में वह दोबारा आश्रम आए. पीढौल के लोगों ने बाबा से कहा कि बाबा तुम ये जगह छोड़ दो. बाबा चुपचाप सुनते रहे. कुछ नहीं बोले. इसके बाद एक दिन पीढौल के लोग आश्रम आए और उन्होंने बाबा को धमकी दी. कहा कि बाबा ये जगह छोड़ दो नहीं तो तुम्हारे लिए अच्छा नहीं होगा. बस इस घटना के एक दिन बाद रात में ही कांड हो गया."

घटना की रात को याद करते हुए महेंद्र आगे जोड़ते हैं, "उस दिन सोनपाल के घर से खाना आया था. 8 बजे तक हम लोग खाना खाकर छत पर आ गए थे. फिर मैंने हनुमान चालीसा पढ़ी और 9 बजे के आसपास हम सारे सो गए. जब हमला हुआ तो मैं सो रहा था. लेकिन मुझे इतना याद है कि हमें बहुत मारा था. गांव वाले कहते हैं कि 5 दिनों तक मेरे कान से खून बहना बंद नहीं हुआ था." हमलावरों के बारे में पूछने पर महेंद्र थोड़ी देर चुप रहते हैं. फिर हाथ जोड़ते हुए कहते हैं, "पीढौल के ही लड़के थे".

हरदुआगंज का तिहरा हत्याकांड

पाली मुकीमपुर के बाद 14 सितंबर की रात हरदुआगंज के दुरैनी माता के मंदिर में मारे गए साधु रामस्वरूप के परिजन से मिलने हम सफेदापुरा गांव पहुंचे. मंदिर से कुछ ही दूर बसे इस गांव के एक छोटे-से मकान में रहने वाले बाबा रामस्वरूप का परिवार आज तक उनकी मौत के सदमे से निकल नहीं पाया है.

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Image caption दुरैनी माता का मंदिर

सबसे छोटे भाई सुंदर लाल कहते हैं, "हमारे बाबा का मंदिर बड़ा मान्यता वाला था. हर बृहस्पतिवार को यहां भक्तों की भीड़ लग जाती थी. मथुरा तक से लोग दर्शन को आते थे यहां. शुरू में जब बाबा ने यहां पीठ की स्थापना की थी, तब तो यहां घुटनों तक घास उगा करती थी. मंदिर की ज़मीन को कहां से कहां पहुंचा दिया था उन्होंने अपनी मेहनत से."

सुंदरलाल घटना के बाद बाबा रामस्वरूप को देखने वाले पहले लोगों में से थे. घटना की अगली सुबह याद करते हुए वह बताते हैं, "सुबह दूध लेकर पहुंचे तो देखा बाबा मच्छरदानी में लिपटे पलंग के नीचे गिरे पड़े थे. और हर तरफ खून ही खून था".

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Image caption साधु रामस्वरूप के परिजन

बाबा रामस्वरूप के परिजनों का मानना है कि अलीगढ़ एनकाउंटर के बाद अब बाबा को कभी इंसाफ नहीं मिलेगा. सुंदरलाल कहते हैं, "ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित होता हो कि हमारे बाबा की हत्या अतरौली के उन दो मुसलमान लड़कों ने की थी. हमें तो मीडिया से पता चला कि बाबा की हत्या का केस भी पुलिस से उन लड़कों पर ही खोला है. अब तो वो लड़के भी मर गए और हमारा केस भी बंद हो जाएगा. हम तो इस मामले की सही जांच और बाबा के लिए इंसाफ़ चाहते हैं. लेकिन क्या पता इंसाफ़ कभी मिलेगा भी या नहीं?"

बाबा रामस्वरूप हत्याकांड की रात ही मंदिर के पास के खेतों से एक किसान दंपती की लाशें मिली थीं. यह दंपती भी इसी सफेदापुरा गांव के रहने वाले थे. बाबा के घर से आगे बढ़ते हुए हम गांव के दूसरे छोर पर मौजूद इस मृतक दंपती के घर पहुंचे.

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Image caption मृतक किसानों की तस्वीरें लिए ललित और भावना

घर का दरवाज़ा मृतक किसान की बड़ी बेटी 16 वर्षीय भावना ने खोला.

आंगन में परिवार के अन्य सदस्यों के साथ बैठे भावना के चाचा और मृतक किसान के छोटे भाई ललित कुमार ने अपने भैया-भाभी का नाम योगेन्द्र पाल और विमलेश देवी बताया. "भैया 45 के थे और भाभी की उम्र 42 के आसपास. उस रात मेरे भैया-भाभी हमारे मक्के के खेतों में दवाई डालने गए थे. फिर लौटे ही नहीं. सुबह 9 बजे मुझे पता चला तो हम सबने उन दोनों को ढूंढना शुरू कर दिया. तब तक मंदिर वाले रामस्वरूप बाबा की हत्या की ख़बर हर जगह फैल चुकी थी इसलिए हम ज़्यादा डरे हुए थे. कुछ ही देर में भैया की लाश खेत में पड़ी हुई मिली. भाभी की लाश वहां से क़रीब 100 मीटर दूर दूसरी क्यारी में फेंकी गई थी."

ललित के साथ खड़े उनके भतीजे राज पाल ने अलीगढ़ एनकाउंटर पर सवाल उठाते हुए आगे कहा, "यह एनकाउंटर करके पुलिस ने तो इस मामले में सिर्फ़ लीपापोती ही की है. क्षेत्रीय विधायक दलवीर सिंह ने हमारे थानेदार से कहा था कि इस मामले की तफ्तीश ठीक से की जाए. उस दिन थानेदार साहब ने बताया भी था कि हमारे गांव के ही कुछ लोग इस हत्याकांड में शामिल हो सकते हैं. उन्होंने कहा था कि 3-4 दिन में पुलिस परिवार के लोगों को बुलाकर केस खोलेगी. लेकिन हमें कभी कुछ नहीं बताया गया. मीडिया के ज़रिए ही 18 सितंबर को पकड़े गए 5 लोगों के बारे में पता चला और फिर 20 को तो एनकाउंटर ही हो गया."

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Image caption मृतक किसानों के परिजन

ललित आगे जोड़ते हैं, "भैया की बॉडी तो अकड़ी हुई थी, लेकिन भाभी के सिर से खून ताज़ा रिस रहा था. उस खून को देखकर लगता था कि उनकी और भैया की मौत के वक्त में काफ़ी अंतर होगा. भाभी को तो बहुत मारा था. गर्दन, रीढ़ की हड्डी, सब कुछ टूटा हुआ था. आंखें फूटी हुई थीं. पता नहीं उनके साथ क्या हुआ होगा. उन दोनों के पास तो सिर्फ़ पुराना मोबाइल ही था जिसके टॉर्च को जलाकर वो खेतों में दवा और पानी डाला करते थे. मंदिर का सामान भाभी के आस-पास पड़ा मिला था. जैसे कि चुन्नी में लिपटा एक नारियल और कुछ अगरबत्तियाँ."

परिजनों का कहना है कि वो आगे सुप्रीम कोर्ट जाकर अदालत से सीबीआई जांच की मांग करना चाहते हैं, लेकिन मृतक दंपती के बच्चों के भविष्य की फ़िक्र में कोई कदम नहीं उठा पा रहे हैं.

मुस्तकीन, नौशाद और हिना का पक्ष :

मृतकों के घर के सामने पुलिस की भारी तैनाती थी. वर्दीवालों की कड़ी नाकाबंदी के साथ-साथ लोकल-इंटेलिजेंस के सिपाही भी वहां सादे कपड़ों में घूम रहे थे. मृतकों के परिजनों से अब मीडिया या किसी और का मिल पाना लगभग नामुमकिन-सा था. फिर भी थोड़े प्रयास के बाद मैं मुस्तकीन के घर में दाखिल हो गई.

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Image caption हिना

अंदर हिना की बहन ईंटो के एक चूल्हे पर पड़ोसियों का दिया हुआ अनाज पकाकर रात के खाने का इंतज़ाम कर रही थी. चूल्हे के सामने बहनों के कपड़े रस्सी पर सूख रहे थे.

बातचीत के दौरान हिना ज्यादातर शून्य में देखती रहीं. भाई और शौहर को खो देने के ग़म के साथ-साथ उनके चेहरे पर मदद के लिए तड़पते इंसान की हताशा थी.

हिना की कहानी, पुलिस की कहानी के ठीक उलट है. उनके अनुसार पुलिस मुस्तकीन और नौशाद को 16 सितंबर को ही उनके घर से उठाकर ले गई थी.

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Image caption हिना और मुस्तकीन का घर

वह बताती हैं, "इतवार की दोपहर थी. पुलिस वाले आए और घर में घुसते ही हमारे शौहर और हमारे भाई को मारने लगे. ज़ोर-ज़ोर से मारने लगे. पूरे मोहल्ले ने देखा है, सब जानते हैं, फिर उन्होंने मुस्तकीन और नौशाद दोनों को अपनी गाड़ियों में भरा और ले गए. बिना खता के ले गए दोनों को और ले जाकर मार दिया. बीच में पुलिसवाले दोबारा हमारे घर भी आए थे. घर से हम सबके आधार कार्ड, हमारे निकाह के कागज़ और मेरे पास जो 230 रुपए बचे थे, वो सब ले गए. इसके बाद तीसरी बार आए तो मुझे सीधे लाशें दिखाने ही ले गए. शौहर की लाश मैंने चुपचाप देख ली. पर भाई की लाश देखते ही मैं बेहोश हो गई. वो सिर्फ 17 साल का था. उसके दांत टूटे हुए थे और आंखें फूटी हुई थीं. फिर पुलिसवालों ने दो अंगूठे लगवाए मुझसे और वापस घर भिजवा दिया. ठीक से आखिरी बार देखने भी नहीं दिया उन दोनों को."

सरकार का पक्ष

अलीगढ़ एनकाउंटर पर उठ रहे सवालों के बारे में सरकार का पक्ष जानने के लिए हमने लखनऊ सचिवालय में बैठने वाले प्रदेश सरकार के उर्जा मंत्री और राज्य सरकार के आधिकारिक प्रवक्ता श्रीकांत शर्मा से बात की. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "देखिए, सरकार की पहली प्राथमिकता प्रदेश में सुरक्षा का वातावरण बनाना है. पूर्व में जो यहां सपा-बसपा और कांग्रेस का कॉकटेल था, वह अपराधियों को संरक्षण देता था. हमारे काम करने का तरीका अलग है. इस सरकार में अपराधियों को कोई संरक्षण नहीं दिया जाएगा. अगर कोई अपराध करेगा तो उसको उसी की भाषा में पुलिस जवाब देगी. साथ ही, अगर कोई वर्दी पहनकर दादागीरी करेगा तो उसको भी बख्शा नहीं जाएगा".

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Image caption उर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा

इस बारे में और बात करने के लिए हमने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह से मुलाक़ात की. अलीगढ़ एनकाउंटर पर उठ रहे सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने मेरे हाथ में प्रदेश के पिछले तीन साल का आपराधिक रिकॉर्ड थमाते हुए कहा, "सवाल तो कोई भी किसी पर भी उठा सकता है, लेकिन आप देखिए, प्रदेश में अपराध कम हुए हैं या नहीं? आकंड़े तो यही कहते हैं. इसके साथ ही मैं यह भी कहना चाहता हूं कि हर एनकाउंटर की मजिस्ट्रेट से जांच होगी और होती है! यही क़ानून है. मैं किसी एक एनकाउंटर पर टिप्पणी तो नहीं कर सकता, लेकिन पूरे राज्य की क़ानून-व्यवस्था के बारे में यह ज़रूर कह सकता हूं कि हमारा पहला उद्देश्य अपराधी को ज़िंदा पकड़ना होता है. आत्म-रक्षा के लिए गोली चलाना अंतिम उपाय है, नियम नहीं. सभी एनकाउंटरों की जांच हो रही है. और अगर कोई भी पुलिस अफसर दोषी पाया गया तो उस पर उचित कार्रवाई की जाएगी".

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