पटाखों का ये इतिहास जानते हैं आप?

  • 23 अक्तूबर 2018
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  • पटाखों पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला- दिवाली पर पटाखे जलाने पर रोक नहीं.
  • रात आठ से 10 बजे तक ही जलाए जा सकेंगे पटाखे.
  • सिर्फ़ लाइसेंस वाले दुकानदार ही पटाखे बेच सकेंगे.
  • ऑनलाइन पटाखों की बिक्री पर रोक.

दिवाली पर पटाखों की बिक्री पर लगा बैन सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ हटा दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे में दायर याचिका की सुनवाई करते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिए हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ''कम प्रदूषण वाले ग्रीन पटाखे यानी कम प्रदूषण फैलाने वाले पटाखों को ही इस्तेमाल किया जा सकेगा. दिवाली या ऐसे किसी दूसरे त्योहार में रात 8 से 10 बजे के बीच ये पटाखे जलाए जा सकेंगे. क्रिसमस और नए साल के मौकों पर ये समय एक घंटे का है. ये समय रात के 11.45 से लेकर 12.45 तक होगा.''

ये याचिका तीन बच्चों अर्जुन गोपाल, आरव भंडारी और ज़ोया राव भसीन की ओर से कोर्ट में साल 2015 में दायर की गई थी. इन बच्चों की उम्र अब तीन से चार साल के बीच है. बच्चों की तरफ से वकील गोपाल संकरानारायण ने पटाखों की बिक्री पर पूरी तरह से बैन लगाने की अपील की थी.

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के वकील विजय पंजवानी ने मीडिया को बताया, ''पटाखों को बनाने में जो सामग्री इस्तेमाल होती है, उसकी मात्रा को तय किया है. अगर तय मानकों से ज़्यादा सामग्री या गन पाउडर इस्तेमाल हुआ, तो एक्शन लिया जाएगा. अगर नियमों का पालन न हुआ तो इलाके का एसएचओ अवमानना का दोषी माना जाएगा.''

फ़ैसले का स्वागत

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याचिकाकर्ता बच्ची ज़ोया राव भसीन के पिता सौरभ भसीन ने बीबीसी हिंदी से बात करते हुए इस फ़ैसले पर ख़ुशी जताई.

भसीन ने कहा, ''कोर्ट ने हमारी काफी बातें मानी हैं. कम प्रदूषण वाले पटाखों के इस्तेमाल की बात कही गई है. अच्छी बात ये है कि ये फ़ैसला पूरे देश पर लागू होगा. पटाखों के जलाने का सबसे ज़्यादा असर बच्चों पर होता है. सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फ़ैसले को सुनाते हुए इस बात को ध्यान में रखा है. पटाखों का असर सिर्फ़ बच्चों पर नहीं होता, बड़ों पर भी होता है.''

वो कहते हैं, ''दिवाली का मतलब पटाखे जलाना नहीं होता है. दिवाली का मतलब है खुशियां फैलाना. पटाखों से आप सिर्फ प्रदूषण फैला सकते हैं. पांच-दस मिनट में जलाए पटाखों से आप अपनों और दूसरों का काफी नुकसान करेंगे. मैं बिना पटाखों के सालों से दिवाली मना रहा हूं. आसमान नीला दिखेगा तो रंग ज़्यादा आ जाएगा.''

दिल्ली में मनोज गुप्ता पटाखे की दुकान चलाते हैं. मनोज गुप्ता ने बीबीसी से कहा, ''कोर्ट के फ़ैसले का हम स्वागत करते हैं. ये एक अच्छा फै़सला है. लोग अपना त्योहार तो मना सकेंगे. त्योहार पर पटाखे पूरी तरह बैन करने से अच्छा है कि कुछ घंटे तो पटाखे चलाए जा सकें. इससे पहले जब पटाखों की बिक्री पर बैन लगा था, तब तो पूरी तरह व्यापार ठप हो गया था. अब कम से कम कुछ तो राहत मिलेगी.''

लेकिन क्या कम और ज़्यादा प्रदूषण फैलाने वाले पटाखों के बीच का फ़र्क़ लोग समझेंगे?

इस सवाल पर सौरभ कहते हैं, ''मेरे हिसाब से लोग समझदार हैं, सब समझेंगे. क्योंकि ये हम सबके स्वास्थ्य की बात है. जो समझना ही नहीं चाहते, उनका कुछ नहीं कर सकते. ये पब्लिक हेल्थ का मसला है. जिन लोगों की रोज़ी रोटी इससे प्रभावित हो रही है, उन्हें इस बात को समझना चाहिए. वो धीरे से ऐसे पटाखों को बनाने की तरफ मुड़ सकते हैं, जिससे प्रदूषण कम फैले. इससे लोगों को भी राहत मिलेगी और पटाखों का काम करने वालों को भी.''

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पटाखों का सेहत पर क्या असर?

सुप्रीम कोर्ट की ओर से पटाखों की बिक्री पर पहले प्रतिबंध लगाया गया था. इस मामले में दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में फेफड़े से जुड़ी बीमारियों के प्रमुख डॉक्टर अरविंद कुमार ने कोर्ट में एक हलफ़नामा लगाकर अपना अनुभव साझा किया था.

बीबीसी हिंदी से बात करते हुए डॉक्टर अरविंद कुमार ने कहा, ''जब एक बच्चा जन्म लेता है तो उसके फेफड़े गुलाबी होते हैं. लेकिन बीते कुछ वक़्त से मैं काले फेफड़े देख रहा हूं. ये सब प्रदूषण की वजह से होता है. ये हम सबके शरीर को खोखला कर रहा है. एक चेस्ट डॉक्टर होने के नाते मैं ये बातें अच्छे से समझता हूं. प्रदूषण फैलाने में पटाखों का रोल बहुत ज़्यादा है. पहली वजह- आप एक तय वक़्त में बहुत ज़्यादा मात्रा में पटाखे फोड़ते हैं. दूसरी वजह- पटाखे आप अपने एक मीटर के दायरे में फोड़ते हैं, उससे निकलने वाला धुंआ सीधा आपके अंदर जाता है.''

डॉक्टर अरविंद समझाते हैं, ''अगर एक ट्रक या बस से धुंआ निकल रहा है तो सबसे ज़्यादा प्रदूषण उस तेल के पाइप के पास से निकल रहा होता है. लेकिन कोई उस पाइप के पास जाकर खड़ा नहीं होता है. ऐसे में पटाखों के मुकाबले इसका कम असर होता है.''

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बच्चों को पटाखे से दूर रखिए वरना...

  • एक्यूट अस्थमा अटैक आ सकता है.
  • निमोनिया के मामले बढ़ सकते हैं.
  • दिमाग के विकास में हो सकती है दिक्कत.
  • फेफड़े से संबंधित होने वाली बीमारी का ख़तरा.
  • बीमारी का पता लगने तक हो जाती है देर.
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आंकड़े क्या कहते हैं?

पूरी दुनिया में पटाखों का सबसे बड़ा उत्पादक चीन है. दूसरे नंबर पर भारत है.

भारत में पटाखों का व्यापार 2600 करोड़ रुपये से ज़्यादा का है. भारत में तमिलनाडु के सिवाकाशी को पटाखा उत्पादन का गढ़ माना जाता है.

बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, हर साल हादसों की वजह से इस धंधे में काम करने वाले कम से कम 20-25 लोगों की मौत हो जाती है.

इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट के मुताबिक़, एक फुलझड़ी जलने से होने वाला नुकसान 74 सिगरेट पीने के बराबर होता है. स्नैक को जलाने से 462 सिगरेट पीने जितना असर होता है.

वहीं अनार को जलाने से 34 सिगरेट पीने जितना फर्क पड़ता है.

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पटाखों का इतिहास क्या है?

साल 2017 में पंजाब विश्वविद्यालय में इतिहास पढ़ाने वाले राजीव लोचन और मुगलकालीन इतिहास के प्रोफ़ेसर नजफ़ हैदर ने इस बारे में बीबीसी हिंदी से कुछ दिलचस्प किस्से साझा किए थे.

प्रोफ़ेसर नजफ़ हैदर ने कहा था, ''मुग़लों के दौर में आतिशबाज़ी और पटाखे ख़ूब इस्तेमाल होते थे, ये तो पता है. लेकिन ये कहना सही नहीं होगा कि भारत में पटाखे मुग़ल ही लेकर आए थे. ये दरअसल उनसे पहले ही आ चुके थे.

  • दारा शिकोह की शादी की पेंटिंग में लोग पटाखे चलाते हुए देखे जा सकते हैं. लेकिन ये मुग़लों से पहले भी थे. फ़िरोज़शाह के ज़माने में भी आतिशबाज़ी ख़ूब हुआ करती थी.
  • गन पाउडर बाद में भारत में आया. लेकिन मुग़लों से पहले पटाखे ज़रूर आ गए थे. इसका बड़ा इस्तेमाल शिकार या हाथियों की लड़ाई के दौरान होता था. पटाखे चलाए जाते थे ताकि उन्हें डराया जा सके.
  • मुग़ल दौर में शादी या दूसरे जश्न में भी पटाखे और आतिशबाज़ी होती थी.''

राजीव लोचन के मुताबिक, ''ईसा पूर्व काल में रचे गए कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी एक ऐसे चूर्ण का विवरण है जो तेज़ी से जलता था, तेज़ लपटें पैदा करता था और अगर इसे एक नलिका में ठूंस दिया जाए तो पटाख़ा बन जाता था. बंगाल के इलाक़े में बारिश के मौसम में बाद कई इलाक़ों में सूखती हुई ज़मीन पर ही लवण की एक परत बन जाती थी.

  • इस लवण को बारीक पीस लेने पर तेज़ी से जलने वाला चूर्ण बन जाता था. अगर इसमें गंधक और कोयले के बुरादे की उचित मात्रा मिला दी जाए तो इसकी ज्वलनशीलता भी बढ़ जाती थी. जहां ज़मीन पर यह लवण नहीं मिलता था, वहां इसे उचित क़िस्म की लकड़ी की राख की धोवन से बनाया जाता था. वैद्य भी इस लवण का इस्तेमाल अनेक बीमारियों के लिए करते थे.
  • लगभग सारे देश में ही यह चूर्ण और इससे बनने वाला बारूद मिल जाता था. पर लगता नहीं कि इसका इस्तेमाल पटाख़े बनाने में होता था. ख़ुशियां मनाने के लिए, उल्लास जताने के लिए घर द्वार पर रौशनी ज़रूर की जाती थी. पर इस रौशनी में भी पटाखों का तो कोई विवरण नहीं मिलता. घी के दिए जलने का उल्लेख ज़रूर है.
  • यह बारूद इतना ज्वलनशील भी नहीं था कि इसका इस्तेमाल दुश्मन को मारने के लिए किया जा सके. उस तरह के बारूद का ज़िक्र तो शायद पहली बार साल 1270 में सीरिया के रसायनशास्त्री हसन अल रम्माह ने अपनी किताब में किया जहां उन्होंने बारूद को गरम पानी से शुद्ध करृके ज़्यादा विस्फोटक बनाने की बात कही.
  • जब 1526 में काबुल के सुल्तान बाबर ने दिल्ली के सुल्तान पर हमला किया तो इतिहासकार कहते हैं कि उसकी बारूदी तोपों की आवाज़ सुनकर भारतीय सैनिकों के छक्के छूट गए. अगर मंदिरों और शहरों में पटाख़़े फोड़ने की परम्परा रही होती तो शायद ये वीर सिपाही तेज़ आवाज़ से इतना न डरते.''

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