किसी को क्यों होती है वंदे मातरम् को अनिवार्य करने से आपत्ति?

  • 27 अक्तूबर 2018
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Image caption प्रकाश आंबेडकर

''संविधान समिति ने 'जन गण मन' को राष्ट्रगान चुना, फिर वंदे मातरम् की मांग क्यों? वंदे मातरम राष्ट्रगान नहीं है इसलिए ये वैकल्पिक होना चाहिए कि इसे गाया जाये या नहीं या ये स्पष्ट कीजिए कि आप राष्ट्रगान को क्यों नकार रहे है?''

भारिप बहुजन महासंघ (बीबीएम) के नेता प्रकाश आंबेडकर इसी हफ़्ते महाराष्ट्र के परभणी जिले में एक कार्यक्रम में ये बातें कह रहे थे.

उन्होंने कहा कि ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) ने वंदे मातरम् का विरोध किया है और हम भी इसका विरोध करते हैं.

अभी तक एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी और कुछ मुस्लिम संगठनों ने ही वंदे मातरम् की अनिवार्यता का विरोध किया है. अब इसमें आंबेडकर का नाम भी शामिल हो गया है.

क्या कहतें हैं प्रकाश आंबेडकर

प्रकाश आंबेडकर ने बीबीसी को बताया, "'जन गण मन' राष्ट्रगान होते हुए भी वंदे मातरम् गाने के लिए जबरदस्ती क्यों की जाती है? भारत का राष्ट्रगान 'जन गण मन' हो या वंदे मातरम् इस पर संविधान समिति में चर्चा हुई थी. संविधान समिति ने सबकी सहमति से 'जन गण मन' को चुना था. इसलिए हम उसका सम्मान करते है."

वह कहते हैं, "राष्ट्रगान का सम्मान करना हमारी कानूनी जिम्मेदारी है और नैतिक कर्तव्य भी है. इसके लिए हम प्रतिबद्ध है. लेकिन, वंदे मातरम् भी गाया जाए, ऐसा कोई कानून नहीं कहता."

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वंदे मातरम् और एआईएमआईएम का गठबंधन

एआईएमआईएम वंदे मातरम् का विरोध करती आई है. वहीं, हाल ही में चुनावों के लिए एआईएमआईएम और भारिपा बहुजन महासंघ का गठबंधन हुआ है. क्या इन्हीं संदर्भों में वंदे मातरम् का विरोध हो रहा है?

इस पर प्रकाश आंबेडकर कहते हैं, "वंदे मातरम गाने के लिए जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए. यही बात हमने शुरू से कही है. इसलिए जब-जब वंदे मातरम् गाने का आग्रह किया जाता है, हम यही बात दोहराते हैं.

प्रकाश आंबेडकर के इस बयान पर बीजेपी ने अहसमति जताई है. उनका कहना है कि वंदे मातरम् को संविधान ने मान्यता दी है. इसलिए उसे पूरा सम्मान दिया जाना चाहिए.

बीजेपी प्रवक्ता माधव भंडारी ने कहा, "वंदे मातरम्, स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा है. इस गीत से स्वतंत्रता सेनानियों की प्रेरणा मिलती है. प्रकाश आंबेडकर को पहले ये इतिहास पढ़ना चाहिए, फिर टिप्पणी करनी चाहिए."

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वंदे मातरम् का इतिहास

वंदे मातरम् का इतिहास बड़ा ही दिलचस्प है. बांग्ला भाषा के शीर्ष साहित्यकारों में गिने जाने वाले बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने वंदे मातरम् की रचना 1870 के दशक में की थी.

बाद में बंकिम चंद्र के उपन्यास 'आनंद मठ' में वंदे मातरम को भी शामिल किया गया जो देखते-देखते पूरे देश में राष्ट्रवाद का प्रतीक बन गया.

रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसके लिए धुन तैयार की और वंदे मातरम् की लोकप्रियता तेज़ी से बढ़ने लगी.

बंकिम चंद्र के उपन्यास 'आनंद मठ' पर आधारित एक फ़िल्म भी बनी है जिसमें वंदे मातरम् एक गीत है.

जब आज़ाद भारत का नया संविधान लिखा जा रहा था तब वंदे मातरम् को न राष्ट्रगान के रूप में अपनाया गया और न ही उसे राष्ट्रगीत का दर्जा मिला.

लेकिन, संविधान सभा के अध्यक्ष और भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने 24 जनवरी 1950 को घोषणा की कि वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया जा रहा है.

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Image caption बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय

वंदे मातरम् का विरोध

बंकिम चंद्र ने वंदे मातरम् गीत में भारत को दुर्गा का स्वरूप मानते हुए देशवासियों को उस माँ की संतान बताया था.

उन्होंने भारत को वो माँ बताया जो अंधकार और पीड़ा से घिरी है. उसके बच्चों से बंकिम आग्रह करते हैं कि वे अपनी माँ की वंदना करें और उसे शोषण से बचाएँ.

वंदे मातरम में भारत को दुर्गा माँ का प्रतीक बताए जाने के कारण बाद के वर्षों में मुसलमान समुदाय की ओर से इसे लेकर असहज होने की बातें कही गईं.

इसी विवाद के कारण भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू वंदे मातरम् को आज़ाद भारत के राष्ट्रगान के रूप में नहीं स्वीकार करना चाहते थे.

मुस्लिम लीग और मुसलमानों ने वंदे मातरम् का इस वजह से विरोध किया था कि वो देश को भगवान का रूप देकर उसकी पूजा करने के ख़िलाफ़ थे.

नेहरू ने स्वयं रवींद्रनाथ ठाकुर से वंदे मातरम् को स्वतंत्रता आंदोलन का मंत्र बनाए जाने के लिए उनकी राय माँगी थी.

रवींद्रनाथ ठाकुर बंकिम चंद्र की कविताओं और राष्ट्रभक्ति के प्रशंसक रहे थे और उन्होंने नेहरू से कहा कि वंदे मातरम् के पहले दो छंदों को ही सार्वजनिक रूप से गाया जाए.

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Image caption जवाहरलाल नेहरू और डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद

जब बंकिम चंद्र ने 'आनंदमठ' लिखा तो उसमें उन्होंने बंगाल पर शासन कर रहे मुस्लिम राजाओं और मुसलमानों पर ऐसी कई टिप्पणियाँ की थीं जिससे हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच तनाव पैदा हुआ.

वंदे मातरम् को हालाँकि कई वर्ष पहले एक कविता के रूप में लिखा गया था लेकिन उसे बाद में प्रकाशित हुए आनंदमठ उपन्यास का हिस्सा बनाया गया.

आनंदमठ की कहानी 1772 में पूर्णिया, दानापुर और तिरहुत में अंग्रेज़ और स्थानीय मुस्लिम राजा के ख़िलाफ़ संन्यासियों के विद्रोह की घटना से प्रेरित है.

आनंदमठ का सार ये है कि किस प्रकार हिंदू संन्यासियों ने मुसलमान शासकों को हराया. आनंदमठ में बंकिम चंद्र ने बंगाल के मुस्लिम राजाओं की कड़ी आलोचना की.

लेकिन प्रतिष्ठित इतिहासकार केएन पणिक्कर के मुताबिक़, "बंकिम चंद्र के साहित्य में मुस्लिम शासकों के ख़िलाफ़ कुछ टिप्पणियों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि बंकिम मुस्लिम विरोधी थे. आनंदमठ एक साहित्यिक रचना है. इस रचना को उस समय के मौजूदा हालात के संदर्भ में पढ़ना और समझना ज़रूरी है."

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सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा

स्वतंत्रता मिलने के बाद वंदे मातरम् को लेकर विवाद बार-बार सामने आया है. एक समय ऐसा भी था जब ये विवाद कोर्ट में भी पहुंच गया था.

इसके बाद मद्रास हाई कोर्ट ने निर्णय दिया था कि विद्यार्थियों में देशभक्ति की भावना जगाने के लिए सभी स्कूल और कॉलेज में कम ये कम हफ्ते में एक बार वंदे मातरम् गाना चाहिए.

भारत सरकार की वेबसाइट knowindia.org के अनुसार वंदे मातरम् राष्ट्रीय गीत है. पर पूर्व न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की बेंच ने फैसला दिया था कि संविधान में ये कहीं नहीं लिखा है कि वंदे मातरम् राष्ट्रीय गीत है.

बीजेपी प्रवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने एक याचिका भी दायर की थी जिसमें वंदे मातरम् के प्रसार के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग की गई थी. लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा था कि संविधान की धारा 51ए में सिर्फ राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज का उल्लेख किया गया है.

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