सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा ने सरकार को चुनौती क्यों दी?

  • 25 अक्तूबर 2018
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भारत में अपराध और भ्रष्टाचार के मामलों की जांच की सर्वोच्च संस्था केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा के प्रधानमंत्री कार्यालय के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट जाने के बाद यह विवाद मौजूदा सरकार के लिए अब नाक का सवाल बन गया लगता है.

सीबीआई के डायरेक्टर आलोक वर्मा और स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के बीच बीते कुछ समय से रिश्वत को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला चल रहा था.

आलोक वर्मा ने सीबीआई डायरेक्टर की हैसियत से राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ रिश्वत लेने के एक कथित मामले में एफ़आईआर करके जांच करना शुरू किया था. सीबीआई ने इस सिलसिले में ही छापा मारा और अपने ही स्टाफ़ डीएसपी देवेंद्र कुमार को गिरफ़्तार किया.

लेकिन राकेश अस्थाना अपने ख़िलाफ़ दर्ज एफ़आईआर में गिरफ़्तारी से बचने के लिए हाई कोर्ट चले गए. इसके बाद मंगलवार की रात, केंद्र सरकार ने इस मामले में दखल देते हुए सीबीआई के नंबर-1 वर्मा और नंबर-2 अधिकारी अस्थाना दोनों को छुट्टी पर भेज दिया.

अस्थाना के ख़िलाफ़ जांच कर रहे सीबीआई अधिकारी एके बस्सी को भी पोर्ट ब्लेयर भेज दिया गया.

अब छुट्टी पर भेजे जाने के ख़िलाफ़ आलोक वर्मा सुप्रीम कोर्ट में याचिका लेकर पहुंचे जिसमें उन्होंने केंद्र सरकार पर निशाना साधा.

कई बातें हैं जिनमें एक सबसे अहम यह है कि क्या सरकार सीबीआई के प्रमुख को इस तरह से छुट्टी पर भेज सकती भी है या नहीं क्योंकि उसका तय कार्यकाल दो साल का होता है और अगर उसे हटाना है तो उसके लिए भी एक तय प्रक्रिया है जिसका पालन हुआ या नहीं.

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Image caption राकेश अस्थाना के साथ आलोक वर्मा (कुर्सी पर बैठे हुए)

मोदी के ख़िलाफ़ क्यों गए वर्मा?

लेकिन इन सब के बीच गंभीर सवाल तो यह भी है कि सीबीआई डायरेक्टर के रूप में आलोक वर्मा का कार्यकाल अगले साल जनवरी में ख़त्म होने वाला था और इस स्तर के नौकरशाह के लिए रिटायरमेंट के बाद तमाम तरह के आयोगों के दरवाज़े खुले होते हैं. यानी अवसरों की कमी नहीं होती. तो ऐसे में सवाल उठता है कि आख़िर उन्होंने केंद्र सरकार से अपने रिश्ते ख़राब क्यों किए?

आलोक वर्मा को एक ऐसे पुलिस अधिकारी के रूप में जाना जाता है जो विवादों से दूरी बनाकर चलते रहे हैं. अपने 35 साल के लंबे करियर में उन्होंने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में अच्छा ख़ासा समय गुज़ारा है.

अगर मोदी सरकार से उनके रिश्तों की बात करें तो वर्तमान सरकार ने ही आलोक वर्मा को उस समय दिल्ली का पुलिस कमिश्नर बनाया था जब केंद्र सरकार जेएनयू विवाद को ग़लत ढंग से हैंडल करने की वजह से आलोचनाओं के घेरे में थी.

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इसके बाद वर्तमान सरकार ने उन्हें तब तय प्रक्रिया के तहत सीबीआई निदेशक के पद पर नियुक्त किया जब ये मामला कोर्ट तक पहुंच गया.

ऐसे में सवाल उठता है कि वर्मा और मोदी सरकार के रिश्तों में कड़वाहट का सिलसिला कहां से शुरू हुआ?

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण इस सवाल का जवाब देते हुए बताते हैं कि वर्मा और मोदी सरकार के बीच संबंधों के ख़राब होने के केंद्र में रफ़ाल मामला हो सकता है.

बीबीसी के साथ बातचीत में प्रशांत भूषण कहते हैं, "जब हमारी मुलाकात हुई तो आलोक वर्मा रफ़ाल विमान सौदे को लेकर हमारी शिकायतों को बड़े ध्यान से सुन रहे थे. ये संभव था कि वो इस मामले में एफ़आईआर दर्ज करके जांच शुरू कराते."

उन्होंने कहा, "रफ़ाल मामले में सरकार के डर की वजह से हमारी मुलाकात को लेकर भी बड़ा हो हल्ला मचाया गया कि आलोक वर्मा ने हमसे मुलाकात क्यों की? हमारी शिकायतें क्यों सुनीं? सरकार इस मुद्दे पर किसी तरह की जांच नहीं चाहती है. इसी वजह से उन्होंने ये सोचा कि आलोक वर्मा को हटाने से दोनों दिक्कतें दूर हो जाएंगी. रफ़ाल पर जांच भी नहीं होगी और राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ भी जांच रुक जाएगी."

जब प्रशांत भूषण से ये सवाल किया गया कि आलोक वर्मा ने रफ़ाल मामले की जांच करने के संकेत देकर मोदी सरकार से अपने रिश्ते ख़राब करने का जोख़िम क्यों उठाया तो उन्होंने कहा, ''आलोक वर्मा ने वही किया जो एक ईमानदार अफ़सर को करना चाहिए था.''

वर्मा के सुप्रीम कोर्ट जाने का असर?

आलोक वर्मा के सुप्रीम कोर्ट जाकर केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ अपना पक्ष रखने से केंद्र सरकार के सामने बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई है.

दरअसल, आपराधिक क़ानूनों (क्रिमिनल लॉ) के संशोधन संबंधी पूर्व चीफ़ जस्टिस जे एस वर्मा की समिति ने राजनीतिक दबाव से सीबीआई को आज़ाद रखने के लिए इसके डायरेक्टर के कार्यकाल को दो साल किए जाने का सुझाव दिया, जिसे अमल में लाया गया था.

आलोक वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में इसी व्यवस्था का हवाला देते याचिका डाली है कि क़ानून के मुताबिक़, सरकार उन्हें इस तरह अचानक नहीं हटा सकती है.

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लेकिन इसके साथ ही उन्होंने अपनी याचिका में कहा है कि सीबीआई को केंद्र सरकार के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) से आज़ाद करने की ज़रूरत है क्योंकि डीओपीटी सीबीआई के स्वतंत्र तरीके से काम करने के ढंग को गंभीरता से प्रभावित करता है.

सरकार में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग प्रधानमंत्री कार्यालय के अंतर्गत आता है.

इसके साथ ही उन्होंने कहा है कि सीबीआई से अपेक्षा की जाती है कि वह स्वतंत्रता से काम करे, लेकिन ऐसे मौके भी आते हैं जब उच्च पदों पर बैठे लोगों के ख़िलाफ़ जांच की जाती है जो कि सरकार के मन के मुताबिक़ नहीं होती है.

आलोक वर्मा ने जिस तरह सरकार पर सीधा हमला बोला है उससे सरकार की साख पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगता है.

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वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक परंजॉय गुहा ठाकुरता ने बीबीसी संवाददाता दिलनवाज़ पाशा के साथ बातचीत में बताया कि आम आदमी को अब तक सीबीआई की जांच पर भरोसा था, लेकिन इस कांड से उसे धक्का लगा है.

ठाकुरता कहते हैं, "सीबीआई की साख तो पहले से ही काफ़ी प्रभावित थी, लेकिन इस मामले के बाद इसकी साख को भारी धक्का लगा है. इसके साथ ही मोदी सरकार की छवि को भी भारी नुकसान पहुंचा है. आप रात के दो बजे एक इस एजेंसी के दफ़्तर जाकर उसे सील कर देते हैं और सुबह बताते हैं कि इसके शीर्ष दो अधिकारियों को छुट्टी पर भेज दिया गया है."

वो कहते हैं, "दोनों अधिकारियों के ख़िलाफ़ गंभीर आरोप हैं. दोनों एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं कि एक जांच में बाधा बन रहा है तो दूसरे ने किसी ने घूस ली है. भारत के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ. इससे नरेंद्र मोदी सरकार की छवि को बहुत बड़ा धक्का पहुंचेगा. अब शुक्रवार को पता चलेगा कि इस मामले में आगे क्या होगा."

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सीबीआई विवाद में अब आगे क्या?

सीबीआई विवाद के सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद बीजेपी की विपक्षी पार्टियों ने केंद्र सरकार पर हमले शुरू कर दिए हैं.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर ट्वीट करते हुए कहा है, "सीबीआई चीफ आलोक वर्मा रफ़ाल घोटाले के क़ाग़ज़ात इकट्ठा कर रहे थे. उन्हें जबरदस्ती छुट्टी पर भेज दिया गया. प्रधानमंत्री का मैसेज एकदम साफ़ है जो भी रफ़ाल के इर्द गिर्द आएगा- हटा दिया जाएगा, मिटा दिया जाएगा. देश और संविधान खतरे में हैं."

वो आगे लिखते हैं कि 'श्रीमान 56 ने चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया और नेता प्रतिपक्ष को दरकिनार करके क़ानून तोड़ा है.'

क्या मोदी सरकार ने CBI निदेशक को हटा ग़लती की है

कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने बीबीसी से कहा है, "सच्चाई ये है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केंद्रीय जांच एजेंसी की स्वायत्तता और निष्पक्षता पर व्यक्तिगत तौर से आक्रमण कर रहे हैं. लोग ये कह रहे हैं कि मोदी-अमित शाह की जोड़ी, सीबीआई कहीं की नहीं छोड़ी. कारण साफ़ है."

वो कहते हैं, "सीबीआई डायरेक्टर ने रफ़ाल घोटाले के कागज़ मांगे थे जिस पर वह एफ़आईआर दर्ज करने वाले थे. उससे बचने के लिए पीएमओ ने डरकर रात के एक बज़े सीबीआई डायरेक्टर को जबरन उनके पद से हटा दिया और रात के एक बजे ही एडिशनल डायरेक्टर को दरकिनार करके एक दागदार छवि वाले जॉइंट डायरेक्टर को अंतरिम निदेशक बना दिया."

लेकिन केंद्र सरकार की तरफ़ से अरुण जेटली ने सामने आकर कहा है कि इस मामले की जांच सीवीसी की निगरानी में होगी और सरकार ने अधिकारियों को छुट्टी पर भेजने का कदम सीबीआई की साख को बचाने के लिए उठाया है.

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Image caption प्रशांत भूषण, अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला बेहद अहम रोल अदा करेगा.

कोर्ट ने आलोक वर्मा की याचिका को स्वीकार करके उसकी सुनवाई के लिए शुक्रवार का दिन मुकर्रर किया है. ऐसे में देखना ये होगा कि शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट इस मामले में फ़ैसला सरकार के पक्ष में सुनाती है या आलोक वर्मा के पक्ष में.

क्योंकि अगर आलोक वर्मा के पक्ष में फ़ैसला आता है तो भारत की वर्तमान राजनीति में ये एक बेहद अहम फ़ैसला होगा और इसके दूरगामी प्रशासनिक और सियासी परिणाम हो सकते हैं.

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