दिल्ली यूनिवर्सिटी: 'एंटी-हिंदू' किताबों को हटाने की बात साज़िश या प्रक्रिया?

  • 25 अक्तूबर 2018
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  • 'बुद्ध के विचारों को अगर भारत मानता तो चीन, यूरोप से ज़्यादा आगे होता.' (बुद्धा चैलेंज टू ब्राह्मिनिज़्म)
  • 'श्रम करके ज़िंदगी गुज़ारने वाले लोगों के बीच जाति के आधार पर विवाद रहा. दलित, आदिवासी मज़दूरी करके जीवन बिताते और ब्राह्मण बनिया लोग आराम की ज़िंदगी बिताते. ये बदलाव समाज में ज़रूरी है.' (वाय आई एम नॉट हिंदू)
  • आदिवासी से लेकर दलितों का उत्पादन करने का विज्ञान. जैसे नाई भारत में डॉक्टर की तरह रहे, मेडिकल प्रैक्टिस जैसी चीज़ें करते. कथित पिछड़ी जातियां उत्पादन में लगी रहीं. ब्राह्मण और बनिया ऐसे किसी काम में शामिल नहीं हुए. बस सिस्टम और धन अपने हाथ में लिए रहे. इसे बदलने की बातें....' (पोस्ट हिंदू इंडिया)

दलित चिंतक-लेखक कांचा इलैया की इन तीन किताबों को दिल्ली यूनिवर्सिटी में एमए राजनीतिक विज्ञान के सिलेबस की रीडिंग लिस्ट से हटाया जा सकता है.

'दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टैंडिंग कमेटी ऑन अकैडमिक मैटर्स' ने एक बैठक में ये सुझाव दिया है कि इन किताबों को एमए के सिलेबस की रीडिंग लिस्ट से हटाया जाना चाहिए. ये सुझाव एमए कोर्स के सिलेबस की समीक्षा के दौरान कमेटी के सदस्यों की ओर से दिया गया है.

इस कमेटी की सदस्य प्रोफ़ेसर गीता भट्ट ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''आपत्ति की मुख्य वजह रिसर्च, आंकड़ों की कमी है. किताब का कंटेंट बांटने वाला ज़्यादा है. ऐसी किताबों को अगर आप यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं तो वो सही नहीं है. किताब में कांचा इलैया का नज़रिया ज़्यादा है. अकादमिक तौर पर किताबें कमज़ोर हैं.''

कांचा इलैया ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''मेरी किताबें डीयू, जेएनयू और कई पश्चिमी देशों में लंबे वक़्त से पढ़ाई जाती हैं. मैं अपनी किताबों में बीजेपी और आरएसएस की सोच को चुनौती देता हूं इसलिए ही ये सब किया जा रहा है.''

डीयू की कमेटी के सदस्य प्रोफ़ेसर हंसराज सुमन, कांचा के आरोप को ख़ारिज करते हुए कहते हैं, ''ये बदलाव सिलेबस की समीक्षा की वजह से हो रहा है. इसमें किसी तरह का कोई राजनीतिक दबाव नहीं है.''

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Image caption कांचा इलैया

कांचा की किताबों पर आंच किस प्रक्रिया का हिस्सा?

दिल्ली यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर एमए के साल 2010-12 के सिलेबस की रीडिंग लिस्ट पर गौर करें तो कांचा इलैया की तीन किताबों का ज़िक्र मिलता है.

  • वाई आई एम नॉट ए हिंदू
  • पोस्ट हिंदू इंडिया
  • गॉड एज़ पॉलिटिकल फिलॉसफर: बुद्धिज़्म चैलेंज टू ब्राह्रमिनिज़्म

ये किताबें अब तक दिल्ली यूनिवर्सिटी के एमए की रीडिंग लिस्ट में बताई जाती रही हैं. लेकिन साल 2019 से शुरू होने वाले कोर्स के लिए सिलेबस की समीक्षा की जा रही है.

ऐसी हर समीक्षा 'दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टैंडिंग कमेटी ऑन अकैडमिक मैटर्स' करती है. इस कमेटी में क़रीब 30 सदस्य होते हैं. छात्रों के लिए बने सिलेबस के मामलों को ये कमेटी देखती है.

कमेटी के सदस्यों के सुझावों को विभाग के पास भेजा जाता है. विभाग अगर इनसे असहमत होता है तो मामला दिल्ली यूनिवर्सिटी के एकेडमिक काउंसिल के पास जाता है.

इस काउंसिल में क़रीब 20 सदस्य होते हैं. दोनों ही कमेटियों के सदस्य प्रोफेसर होते हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर हंसराज सुमन और गीता भट्ट कहती हैं- इन कमेटियों में उठाए गए मुद्दे राजनीतिक नहीं, कंटेंट को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं.

दोनों के मुताबिक़- कांचा इलैया की किताबों पर आपत्ति भी इसी प्रक्रिया के तहत हुई है.

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क्या वाक़ई हिंदुओं के ख़िलाफ़ हैं कांचा इलैया की किताबें?

प्रोफ़ेसर हंसराज सुमन कहते हैं, ''कमेटी के सदस्यों ने इन किताबों को हटाने की बात कही, क्योंकि इन किताबों में किसी धर्म और लोगों के प्रति गलत बातें कही गईं हैं.''

हालांकि प्रोफ़ेसर हंसराज मानते हैं कि उन्होंने कांचा इलैया की तीनों किताबों को पढ़ा नहीं है.

गीता भट्ट कांचा की किताबों के कंटेंट पर उंगली उठाते हुए कहती हैं, ''वाय आई एम नॉट हिंदू किताब में कांचा लिखते हैं- भगवा और तिलक मेरे लिए उत्पीड़न की तरह है, हिंदुवादी ताकतें मुस्लिम और इसाइयों से नफरत करती हैं. ऐसे बयान कांचा इलैया की अपनी सोच है.''

'वाय आई एम नॉट हिंदू' किताब के जिस हिस्से का गीता ज़िक्र कर रही थीं, वो असल में किताब की प्रस्तावना का हिस्सा है.

अगर आप इसी किताब की प्रस्तावना पढ़ें तो कांचा लिखते हैं, ''1990 के दौर से हमारे कानों ने रोज़ हिंदुत्व सुनना शुरू किया. जैसे भारत में कोई मुस्लिम, सिख, ईसाई नहीं...बस हिंदू है. मुझसे अचानक कहा गया कि मैं हिंदू हूं. सरकार भी इस मुहिम का हिस्सा हो गई. संघ परिवार हर रोज़ हमें हिंदू कहकर उत्पीड़न करती है.''

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क्या सिर्फ़ कांचा इलैया की किताब को हटाने की बात है?

किसी भी कोर्स की जब समीक्षा होती है तो उसमें कई किताबें जोड़ी और हटाई जाती हैं. तो क्या सिर्फ़ कांचा इलैया की किताब को हटाने का सुझाव डीयू कमेटी की ओर से दिया जा रहा है?

प्रोफ़ेसर गीता भट्ट कहती हैं, ''क्रिस्टोफ़र जैफरलॉट के 'द मिलिशियाज़ ऑफ हिंदुत्व' The Militias of Hindutva को भी हटाने का सुझाव दिया गया है. जैफरलॉट की बाकी किताबें रहेंगी लेकिन इसे हटाने की बात पर सभी कमेटी के सदस्य सहमत थे. ये पेपर धार्मिक चरमंपथ की बात करता था. इसमें तर्क ये था कि आपने बाकी किसी धर्म का तो कोर्स में नहीं डाला है तो हिंदू वाला हटाना चाहिए.''

डीयू के एमए से सलेबस की रीडिंग लिस्ट में भगत सिंह का निबंध 'मैं नास्तिक क्यों हूं' भी है. इसका ताल्लुक भी धर्म से है तो क्या भगत सिंह का निबंध भी हटाया जाएगा?

जवाब गीता भट्ट देती हैं, ''नहीं. आप दोनों की तुलना नहीं कर सकते. भगत सिंह शहीद थे. वो ऐसे इंसान थे, जो अंग्रेज़ों से लड़े. कांचा से भगत सिंह की तुलना नहीं हो सकती. भगत सिंह ने खुद के नास्तिक होने पर बात की थी. लेकिन कांचा इलैया ने अपनी किताब में एक धर्म के ख़िलाफ़ बात की है. भगत सिंह ने ऐसा नहीं किया था.''

छात्रों का हवाला देकर इन किताबों को कोर्स से हटाने की बात की जा रही है. लेकिन छात्र इस पर क्या सोचते हैं?

दिल्ली यूनिवर्सिटी के किरोड़ी मल कॉलेज में राजनीतिक विज्ञान पढ़ने वाली जेसिका से हमने इस मुद्दे पर बात की.

जेसिका कहती हैं, ''ऐसी कोई भी किताब जो किसी धर्म का समर्थन करती है या उसके ख़िलाफ़ कोई बात करती है तो इससे सोच पर थोड़ा बहुत फ़र्क़ पड़ता है. अगर हमें लगता है कि ये एंटी हिंदू है या किसी धर्म के ख़िलाफ़ है तो कोई भड़क सकता है.''

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Image caption सांकेतिक तस्वीर

डीयू कमेटी के सदस्य और कांचा इलैया का पक्ष

कांचा इलैया कहते हैं, ''मेरी किताबों में रेफरेंस नहीं होने की बात कर रहे हैं. लेकिन क्या सावरकर की किताबों में रेफरेंस हैं? मेरी किताबों को दुनिया में कई जगह ज़रूरी माना जाता है. ऐसे में ये लोग क्यों आपत्ति जता रहे हैं. बीजेपी-आरएसएस के लोग किताब न पढ़ते हैं और न लिखते हैं. दूसरा कोई लिखे तो आपत्ति दर्ज करने बैठते हैं. देश की सोच कैसे बदलेगी. ये सभी विश्वविद्यालयों को बर्बाद करने का काम कर रहे हैं. बीजेपी सत्ता में आने के बाद देश की अहम विश्वविद्यालयों को छोड़कर वेद पुराण पढ़वाना चाह रहे हैं. मैं आंबेडकर, फुले की सोच को आगे बढ़ा रहा हूं. आप भी अपने विचार छात्रों के आगे रखिए लेकिन किताबों को सिलेबस से हटाने का क्या मतलब है?''

कांचा इलैया ने कहा, ''मेरी किताब कोलंबिया यूनिवर्सिटी, ऑक्सफॉर्ड यूनिवर्सिटी, जेएनयू, बॉम्बे आईआईटी में पढ़ाई जाती है. मेरी किताबों के ख़िलाफ़ इनके कुछ लोग पहले भी कोलंबिया यूनिवर्सिटी में जा चुके हैं. मगर वहां इनकी बात नहीं मानी गई. इनके लोग हर जगह हैं.''

ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ किताबों में हिंदुओं की भावनाएं आहत करने या गैर-ज़रूरी कंटेंट पर आपत्ति जताई जा रही है.

प्रोफ़ेसर हंसराज सुमन बताते हैं, ''मेरी आपत्ति दलित शब्द पर है. कोर्स में चाहे कहीं भी दलित शब्द इस्तेमाल किया गया हो, मेरी आपत्ति बस इसी पर है. दलित की जगह किसी दूसरे शब्द का इस्तेमाल किया जा सकता है. दलित आंदोलन की जगह आंबेडकरवादी, बहुजन जैसा नाम दिया जाना चाहिए. कांचा इलैया आंबेडकर के नहीं, अपने विचारों को बढ़ा रहे हैं. आंबेडकर ने तो देश को पहले माना है. कांचा की किताबों में कई जगह हिंदुओं के मांस खाने की बात करते हैं. लेकिन विकल्पों के होने या न होने की बात नहीं करते हैं. आप अपनी सोच को समाज पर नहीं थोप सकते.''

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सितंबर 2018 में सूचना-प्रसारण मंत्रालय ने मीडिया संस्थानों से कहा था कि वो दलित शब्दावली का इस्तेमाल ना करें. मंत्रालय का कहना था कि अनुसूचित जाति एक संवैधानिक शब्दावली है और इसी का इस्तेमाल किया जाए.

प्रोफ़ेसर गीता भट्ट कहती हैं, ''सिलेबस में कांशीराम, आंबेडकर और कई लेखकों की किताब है. लेकिन ऐसी किताबों को सिलेबस में पढ़ाने का कोई औचित्य नहीं है. यूनिवर्सिटी में पूरी प्रक्रिया की तरह ये सब हो रहा है. किताबें हटेंगी भी और जुड़ेंगी भी. अभी तक कांचा को पढ़ाया ही जा रहा था. अब समीक्षा में ये बातें उठी हैं.''

इस पूरे मसले पर जेसिका ये कहते हुए अपनी बात ख़त्म करती हैं, ''हम जो पढ़ते हैं, उसे हम अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में लागू करने की कोशिश करते हैं.''

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