नज़रिया: सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला क्या सरकार को चपत है?

  • 26 अक्तूबर 2018
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सरकार में दो आला अधिकारियों के बीच की लड़ाई कभी भी हंसी का विषय नहीं रहा है लेकिन मौजूदा समय में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के प्रमुख यानी नंबर एक अधिकारी आलोक वर्मा और नंबर दो के अधिकारी राकेश कुमार अस्थाना के बीच का गतिरोध काफी हद तक राजनीतिक व्यंग से भरपूर ब्रिटिश शो "यस मिनिस्टर" जैसा ही है.

सरकार और सीबीआई के बीच सुप्रीम कोर्ट मध्यस्थता के लिए आया और सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ़ न्याय नहीं दिया बल्कि सरकार के चेहरे पर चपत भी लगाई है.

अपने साथ हुए बर्ताव की क्षतिपूर्ति और न्याय पाने की उम्मीद से आलोक वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट का रुख़ किया था.

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Image caption आलोक वर्मा (कुर्सी पर) और राकेश अस्थाना

उन्होंने केंद्र सरकार के उस फ़ैसले को कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें उनके जूनियर आरके अस्थाना के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के बाद सरकार ने जबरन छुट्टी पर भेजा दिया था. राकेश अस्थाना ने वर्मा पर आरोप लगाया था कि वर्मा ने उन लोगों से घूस ली है जिनके ख़िलाफ़ सीबीआई कई गंभीर आरोपों की जांच कर रही थी.

सीबीआई के पास उस समय कई ताक़तवर और पैसे वाले लोगों के मामले थे, जिसमें एक मीट कारोबारी मोइन कुरैशी का मामला भी था. हालांकि इस बात की अभी पुष्टि नहीं हुई है लेकिन ऐसा लगता है कि वर्मा के ख़िलाफ़ तख़्ता पलट की तैयारियां पहले से ही थीं ताकि उनके द्वारा किसी क़दम को उठाए जाने से पहले उन्हें किनारे कर दिया जाए.

इसके पीछे बकायदा एक पृष्ठभूमि भी है.

राकेश अस्थाना गुजरात कैडर के अधिकारी हैं. पुलिस के कई विवादित मामलों को सुलझाने में उनका नाम शामिल रहा है. इनमें से एक मामला गुजरात दंगों का भी है. उनकी जांच के बाद 2002 के दंगों में मोदी को क्लीन चिट मिली थी, जो उस दौरान गुजरात के मुख्यमंत्री थे. साल 2014 में जब मोदी सरकार सत्ता में आई, अस्थाना का नाम आंतरिम निदेशक के रूप में सामने आया.

जब आलोक वर्मा डायरेक्टर बने तो वह बहुत जल्दी ही ये समझ गए कि भले ही पद के आधार पर वो बॉस हों लेकिन अस्थाना के भीतर सुपर-बॉस बनने की चाहत है और इस चाहत का होना इसलिए स्वभाविक भी है क्योंकि जो लोग देश को चला रहे हैं, उनका समर्थन उनके साथ है.

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सीबीआई एक स्वायत्त संस्था है जो सिर्फ़ और सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट के लिए ज़िम्मेदार है, वो भी सुबूतों के आधार पर. हालांकि उनके द्वारा किसी मामले में दोषी ठहराने के फ़ैसले बहुत अधिक नहीं है (लगभग तीन फ़ीसदी) लेकिन इसे उनकी आलोचना के रूप में नहीं देखा जा सकता.

सीबीआई ने बड़े पैमाने पर मामलों की जांच की है चाहे वो 13 साल की आरुषी तलवार की हत्या का मामला हो (जिसमें उनके माता-पिता को दोषी माना गया) या फिर राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव के ख़िलाफ भ्रष्टाचार के आरोप हों, जिसकी वजह से फिलहाल वो जेल में हैं.

वहीं सीबीआई के आलोचकों की कहना है कि व्यापम जैसे भ्रष्टाचार के मामलों को सुलझाने में सीबीआई की रफ़्तार बहुत धीमी है. लेकिन इन सबके बावजूद सीबीआई की अपनी एक साख है जिसकी वजह से जब लोगों को लगता है कि उनके साथ स्थानीय पुलिस ने न्याय नहीं किया है तो वे सीबीआई जांच की मांग करते हैं.

मौजूदा समय में जो मामला चल रहा है, उसे देखकर सीधे तौर सरकार फंसती नज़र आ रही है. वर्मा और अस्थाना के बीच झगड़ा हुआ तो दोनों को फ़ोर्स लीव पर भेज दिया गया और साथ ही एम नागेश्वर राव को अंतरिक निदेशक नियुक्त कर दिया गया. सुबह होते-होते ख़बर आई कि एजेंसी के लगभग दर्ज़न भर अधिकारियों का तबादला कर दिया गया है और इनमें वो अधिकारी भी शामिल थे जो अस्थाना के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के मामले की जांच कर रहे थे.

आज सुप्रीम कोर्ट ने वर्मा की याचिका पर सुनवाई करते हुए सीवीसी को दो सप्ताह में जांच पूरी करने की बात कही.

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने रिटायर्ड जस्टिस एके पटनायक के नेतृत्व में जांच कराने की बात कही है. उन्होंने ये भी साफ़ कहा है कि एक्टिंग डायरेक्टर के तौर पर नागेश्वर राव को केवल रूटीन काम देखने को कहा गया है. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि नागेश्वर राव अंतरिम निदेशक बने रहेंगे लेकिन वे कोई भी नीतिगत फ़ैसला नहीं लेंगे.

वर्मा मामले में दो सप्ताह में सीवीसी जांच पूरी हो: SC

कौन हैं वर्मा मामले की जांच करने वाले जस्टिस एके पटनायक?

सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले में केंद्र सरकार को नोटिस भेजा है. कोर्ट ने यह भी कहा कि जांच के फ़ैसले सीलबंद लिफाफे में कोर्ट को दिए जाएं. इस पूरे मामले की अगली सुनवाई अब 12 नवंबर को होगी. ऐसे में ये कहने की ज़रूरत तो नहीं है कि आने वाली दीवाली न तो वर्मा के लिए बहुत खुशियों वाली होगी और न ही अस्थाना के लिए.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का जो सबसे अधिक बेचैन करने वाला हिस्सा है वो

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की सबसे बैचेन करने वाली बात ये है कि उसने सीवीसी को कहा है कि वो एक रिटायर्ड जज को रिपोर्ट करे. हांलाकि अदालत ने ये साफ़ किया है कि ये 'वन-टाइम ऑर्डर' है. और जो भी केस सीबीआई ने जीता है, वो एक बार फिर अदालती समीक्षा के दायरे में आ सकता है.

उदाहरण के तौर पर, सुप्रीम कोर्ट सीबीआई बनाम लालू प्रसाद यादव की बेटी मीसा भारती पर लगे मनी लॉन्ड्रिंग की सुनवाई कर रहा है. सुप्रीम कोर्ट में ही लालू प्रसाद यादव पर भी सुनवाई चल रही है, उन पर रेल मंत्री होने के दौरान भ्रष्टाचार के आरोप पर सुनवाई चल रही है.

हालांकि वो हमेशा से ये कहते आए हैं कि उनके ख़िलाफ़ सीबीआई ने जो भी आरोप लगाए हैं वो निराधार हैं क्योंकि ये सारे आरोप राजनीति से प्रेरित हैं. आप कुछ वक्त पहले तक कह सकते थे कि इन बातें निराधार हैं

लेकिन अब सबूत गढ़ने के इल्ज़ामों के बीच, कुछ भी कहना मुश्किल है. हो सकता है कि अन्य केसों में भी सबूत गढ़े गए हों.

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कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि सरकार ने सीबीआई प्रमुख को ज़बरन छुट्टी पर इसलिए भेजा क्योंकि सरकार रफ़ाल ख़रीद मामले पर विवाद को दबाना चाहती थी. लेकिन ये मामला बहुत आगे निकल गया है. यह सरकार की नाकामयाबी को दिखाता है.

इस साल की शुरुआत में जब चार जजों ने तत्कालिक चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा के ख़िलाफ़ खुला विद्रोह कर दिया था और उन पर आरोप लगाया था कि उनके फ़ैसले न्यायसंगत न होकर कुछ विशेष वजहों से प्रेरित होते हैं तो सरकार के प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्रा को चीफ़ जस्टिस से मिलने के लिए भेजा गया था.

जो देखने में आया वो ये कि वो महज़ नए साल की बधाई देने के लिए ग्रीटिंग कार्ड लेकर गए थे लेकिन असल में वो उस मुश्किल दौर में उनका हाथ थामने गए थे.

अब सुप्रीम कोर्ट ने एकबार फिर अपना फ़ैसला सुना दिया है और सरकार को उसकी हद बता दी है. अब हमें 12 नवंबर का इंतज़ार करना है ताकि पता चल सके कि क्या यह जो अनुमान है, वो सटीक है?

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