सरदार पटेल की 'दुनिया की सबसे बड़ी' मूर्ति के नीचे पानी को क्यों तरस रहे हैं किसान

  • 30 अक्तूबर 2018
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Image caption भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और भारत के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की मूर्ति 182 मीटर (600 फ़ीट) ऊंची है

31 अक्तूबर को भारत सरकार 'दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति' का अनावरण करने वाली है.

'भारत के लौह पुरुष' के नाम से मशहूर सरदार वल्लभ भाई पटेल की इस मूर्ति को भारत सरकार ने 'स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी' का नाम दिया है.

गुजरात के अहमदाबाद से क़रीब 200 किलोमीटर दूर स्थित सरदार वल्लभ भाई पटेल की इस मूर्ति को बनाने में लगभग तीन हज़ार करोड़ रुपए ख़र्च हुए हैं.

लेकिन दक्षिणी गुजरात के नर्मदा ज़िले में इस मूर्ति के आसपास रहने वाले लोग मानते हैं कि इतनी बड़ी रकम अगर सूबे के ज़रूरतमंदों को मदद के तौर पर दी जाती तो उनकी हालत काफ़ी सुधर सकती थी.

ख़ासकर उन किसानों के हालात तो सुधर ही सकते थे जो नर्मदा नदी के किनारे तो रह रहे हैं पर अपने खेतों में पानी के लिए तरस रहे हैं.

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Image caption विजेंद्र ताडवी नर्मदा ज़िले के नाना पिपड़िया गाँव में रहते हैं

39 साल के विजेंद्र ताडवी का गाँव नाना पिपड़िया मूर्ति की जगह से मात्र 12 किलोमीटर दूर है. उनके पास तीन एकड़ ज़मीन है और वो मिर्च, मक्के और मूंगफली की खेती करते हैं.

भारत के तमाम अन्य किसानों की तरह विजेंद्र भी फ़सलों में पानी के लिए मॉनसून का इंतज़ार करते हैं. इस इलाक़े के काफ़ी किसान पंप की मदद से ज़मीन का पानी खींचते हैं ताकि खेतों की सिंचाई की जा सके.

विजेंद्र कहते हैं कि नर्मदा नदी से नज़दीकी होने के बावजूद उनके खेतों तक नदी का पानी नहीं पहुँचता. इसीलिए पानी की समस्या इस इलाक़े के किसानों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा है.

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सरदार पटेल की मूर्ति और कई सवाल

किसानों की नाराज़गी

साल 2015 में विजेंद्र ताडवी ने खेती के साथ-साथ मूर्ति स्थल पर ड्राइवर की नौकरी करने का फ़ैसला किया था ताकि उनका घर चल सके.

वो गुजरात सरकार की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहते हैं कि मूर्ति बनने में जो तीन हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च हुए हैं, उसमें आधी से ज़्यादा धनराशि का योगदान गुजरात सरकार ने किया है और बाकी का पैसा केंद्र सरकार ने आवंटित किया था. एक रिपोर्ट के अनुसार इस मूर्ति को बनाने के लिए सार्वजनिक चंदा भी इकट्ठा किया गया था.

लेकिन विजेंद्र ताडवी जैसे किसान गुजरात सरकार के इस फ़ैसले से काफ़ी नाराज़ हैं.

विजेंद्र कहते हैं, "एक विशालकाय मूर्ति पर इतना पैसा ख़र्च करने से अच्छा होता कि सरकार सूखा पीड़ित किसानों के लिए पानी की व्यवस्था तैयार कर देती."

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राजनीति का खेल

सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म गुजरात में हुआ था. भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी बड़ी भूमिका रही.

भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2010 में गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर सरदार वल्लभ भाई पटेल को समर्पित इस मूर्ति के निर्माण की घोषणा की थी.

बीते कुछ सालों में कई बार सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरदार वल्लभ भाई पटेल को 'हिन्दू राष्ट्रवादी नेता' के तौर पर पेश करने की कोशिश की है.

साथ ही मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को सरदार पटेल का क़द छोटा करने का ज़िम्मेदार ठहराया है.

भाजपा का आरोप है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू की छवि को बढ़ाने और उनके वंशजों को फ़ायदा पहुँचाने के लिए कांग्रेस पार्टी ने सरदार पटेल को हमेशा 'खेल से बाहर' रखा.

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साल 2013 में नरेंद्र मोदी ने कहा था कि "हर एक भारतीय को इस बात का अफ़सोस है कि सरदार पटेल क्यों देश के पहले प्रधानमंत्री नहीं बन पाये."

भारत में आज़ादी के कुल 71 वर्षों में से क़रीब 50 साल तक कांग्रेस पार्टी का राज रहा है.

इसीलिए भारतीय जनता पार्टी ने सरदार पटेल की इस मूर्ति के वैचारिक प्रभाव को ज़्यादा से ज़्यादा विशालकाय बनाने की कोशिश की है.

पटेल मेमोरियल में एक तीन सितारा होटल बनाया गया. यहाँ एक म्यूज़ियम भी है और एक रिसर्च सेंटर भी जो कि पटेल के पसंदीदा विषयों 'गुड गवर्नेंस' और 'कृषि विकास' पर काम करेगा.

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दिखाए जा रहे हैं बड़े सपने

ये सबकुछ विजेंद्र ताडवी के गाँव के पास हो रहा है जो कि गुजरात के सबसे ग़रीब, पिछड़े और आदिवासियों के अधिकतम घनत्व वाले नर्मदा ज़िले में स्थित है.

इस ज़िले के बहुत से लोगों को ये नहीं पता होता कि उन्हें दूसरे वक़्त की रोटी मिलेगी भी या नहीं. यहाँ प्राइमरी स्कूलों में बच्चों के नामांकन की दर गिरी है और आज भी इस इलाक़े में कुपोषण के शिकार लोग आपको मिल जाएंगे.

इस इलाक़े की इन सभी समस्याओं का ज़िक्र साल 2016 में गुजरात सरकार द्वारा जारी की गई एक रिपोर्ट में किया गया है.

लेकिन गुजरात सरकार को लगता है कि इस विशालकाय मूर्ति के अनावरण के बाद नर्मदा ज़िले की आर्थिक स्थिति सुधरेगी.

सरकार का अनुमान है कि मूर्ति को देखने के लिए यहाँ हर साल क़रीब 25 लाख पर्यटक आया करेंगे.

पटेल मेमोरियल प्रोजेक्ट के एक वरिष्ठ अधिकारी संदीप कुमार ने बताया, "इस प्रोजेक्ट के आने से स्थानीय लोगों के लिए रोज़गार के अवसर पैदा होंगे और इस इलाक़े को यात्रियों से आमदनी होगी."

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कुछ सवाल

लेकिन स्थानीय लोगों को सरकार के इस दावे पर शक़ है.

स्थानीय आदिवासी कार्यकर्ता लखन ने कहा, "हम सरकार से ये पूछते हैं कि वो क्यों किसानों को सीधा फ़ायदा पहुँचाने वाली योजनाएं नहीं लेकर आती. ऐसी योजनाएं जिनसे रोज़ मर रहे किसानों को कुछ राहत मिले. हमसे कहा गया था किसानों को सिंचाई का पानी मिलेगा. लेकिन स्थिति अब तक वैसी की वैसी ही है."

साल 2013 में सूबे के मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने यहाँ के किसानों से ये वादा किया था कि यहाँ के किसानों तक कर्जन बांध से पानी पहुँचाया जाएगा.

लेकिन 'कमांड एरिया' में गाँव स्थित होने के बावजूद विजेंद्र ताडवी को कभी सिंचाई का पानी नहीं मिला. कमांड एरिया किसी बांध से सटा वो इलाक़ा होता है जहाँ सिंचाई योजना के तहत खेती का पानी पहुँचाना होता है.

ताडवी कहते हैं कि "पानी की कमी के कारण वो साल में एक ही फ़सल कर पाते हैं. जबकि जिन किसानों के पास पानी की सुविधा है वो एक साल में तीन फ़सलें बोते हैं."

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नर्मदा ज़िले की स्थिति

साल 2011 की जनगणना के अनुसार नर्मदा ज़िले की 85 फ़ीसदी आबादी खेती-किसानी से जुड़ी हुई है.

इनमें भी ज़्यादातर छोटे किसान हैं जिनके पास दो से लेकर चार एकड़ तक ही ज़मीन है.

किसानों के हक़ के लिए काम करने वाले लखन ने बताया कि "नर्मदा नदी का पानी गुजरात के अंदरूनी इलाक़ों में तो पहुँच जाता है, लेकिन मूर्ति स्थल के पास के किसी गाँव में नहीं पहुँचता."

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यहाँ के ज़िलाधिकारी ने बीबीसी को बताया कि वो इसकी जाँच करेंगे और सुनिश्चित करेंगे कि सभी किसानों को पानी मिले.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत की आधी आबादी खेतों में काम करती है. लेकिन जीडीपी का सिर्फ़ 15 फ़ीसद ही कृषि से आता है.

भारत की कृषि विकास दर सिकुड़ कर 1.2 फ़ीसद रह गई है. स्थिति ये है कि किसानी में देश के बहुत सारे लोग लगे हुए तो हैं, लेकिन उनका कृषि-उत्पादन बहुत कम है और लाखों किसान हर साल अपने कृषि लोन को चुकाने के लिए भारी संघर्ष करते हैं.

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भारत में किसान

पिछले महीने ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने दिल्ली बॉर्डर पर एक बड़ा प्रदर्शन किया था. इसी साल महाराष्ट्र के किसान भी बड़ा प्रदर्शन कर चुके हैं और पिछले साल तमिलनाडु के परेशान किसानों ने दिल्ली में लंबा प्रदर्शन किया था.

इन सभी प्रदर्शनों में ये माँग उठी थी कि किसानों का कर्ज़ माफ़ किया जाए और उनके लिए योजनाएं बनाई जाएं.

लेकिन स्थिति ये है कि जहाँ देश की सबसे बड़ी मूर्ति बन रही है, उसकी जड़ में मौजूद गाँव पानी की चोरी करने को मजबूर हैं.

एक किसान ने बताया कि "मज़बूर होकर कुछ किसानों ने बांध तक पाइप बिछाए हैं ताकि वो अपने खेतों तक पानी ला सकें. अपने आप को ज़िंदा रखने के लिए हमें ये करना पड़ता है. हम जानते हैं कि बांध से पानी चुराना ग़ैरक़ानूनी है. लेकिन खेती के लिए पानी का कोई और ज़रिया हमारे पास अब बचा नहीं है."

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