अयोध्या: राम मंदिर की टलती सुनवाई से बीजेपी को फ़ायदा या नुकसान

  • 30 अक्तूबर 2018
अमित शाह- नरेंद्र मोदी इमेज कॉपीरइट Getty Images

सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सोमवार को महज तीन मिनट तक चली सुनवाई के बाद अगली सुनवाई जनवरी, 2019 तक टाल दी है.

इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एस.के. कौल और जस्टिस के.एम. जोसेफ़ की पीठ ने की. पहले इस मामले की सुनवाई चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस अब्दुल नज़ीर की पीठ कर रही थी.

ये उम्मीद जताई जा रही थी कि भारतीय राजनीति में चुनाव को नज़दीक आता देख इस मामले की सुनवाई आगे बढ़ेगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद अभी भी इस मुद्दे पर तस्वीर साफ़ नहीं हुई है.

जनवरी, 2019 से इस मामले में सुनवाई होगी. ये सुनवाई इसी बेंच के सामने भी होगी या किसी नए बेंच का गठन भी हो सकता है, यह तय नहीं है.

सुनवाई किस तारीख से शुरू होगी, इसका फ़ैसला भी जनवरी में ही होगा. सुनवाई रोजाना होगी या नहीं, इस पर भी अभी फ़ैसला नहीं हुआ है.

ऐसे में एक बड़ा सवाल यही है कि 2019 के आम चुनाव की ओर बढ़ते समय में सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले का भारतीय जनता पार्टी को फ़ायदा होगा या उसकी मुश्किलें बढ़ने वाली हैं.

क्या बीजेपी की मुश्किलें बढ़ीं?

भारतीय जनता पार्टी पर क़रीबी नज़र रखने वाली वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामाशेषन के मुताबिक इस फ़ैसले ने पार्टी की मुश्किलों को बढ़ा दिया है.

राधिका कहती हैं, "चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई की पीठ ने जो फ़ैसला दिया है उससे इस मामले का हल आम चुनाव तक निकलता नहीं दिख रहा है. दूसरी तरफ़ राम मंदिर निर्माण को लेकर पार्टी दबाव की स्थिति में है."

इमेज कॉपीरइट Getty Images

इस दबाव का अंदाज़ा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख अरुण कुमार के बयान से लगाया जा सकता है.

उन्होंने कहा "सर्वोच्च न्यायालय शीघ्र निर्णय करे और अगर कुछ कठिनाई हो तो सरकार क़ानून बनाकर मंदिर निर्माण के मार्ग की सभी बाधाओं को दूर कर श्रीराम जन्मभूमि न्यास को भूमि सौंपे."

भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी शाखा विश्व हिंदु परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने भी कहा है, "सरकार को क़ानून बनाकर भगवान राम के जन्म स्थल पर विशालकाय मंदिर बनाने का रास्ता साफ़ करना चाहिए और ये काम इसी शीतकालीन सत्र में होना चाहिए."

इससे पहले विजयादशमी के मौके पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने भी कहा था, "चाहे जैसे हो राम मंदिर बनना ही चाहिए. सरकार क़ानून लाकर मंदिर बनाए. इसमें किसी का कोई हस्तक्षेप ना हो."

इमेज कॉपीरइट Getty Images

राधिका रामाशेषन कहती हैं, "चाहे विश्व हिंदु परिषद हो या फिर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ये सब अगर आवाज़ नहीं उठाते तब इतनी मुश्किल नहीं होती, लेकिन अब तो लोग पूछेंगे कि केंद्र और राज्य में बहुमत वाली सरकार होने के बाद भी क्या मुश्किल हो रही है. मंदिर क्यों नहीं बन रहा है."

इससे पहले संत समाज और राम मंदिर से जुड़े हिंदु संगठन भी राम मंदिर निर्माण में हो रही देरी को मुद्दा बनाते आए हैं.

हिंदुस्तान टाइम्स के लखनऊ संस्करण की संपादक सुनीता एरॉन कहती हैं, "मौजूदा स्थिति में तो बीजेपी के पास एक ही रास्ता है कि वो क़ानून बनाकर या अध्यादेश लाकर राम मंदिर निर्माण पर फ़ैसला ले."

चुनाव से पहले बीजेपी के सामने रास्ता क्या?

क्या ये इतना आसान होगा, क्या भारतीय जनता पार्टी के सामने हिंदू मतदाताओं को रिझाने के लिए एकमात्र रास्ता यही बचा हुआ है.

इस बारे में राधिका रामाशेषन बताती हैं, "अभी केंद्र सरकार की स्थिति को देखिए, सीबीआई का विवाद सामने है, आरबीआई को लेकर भी विवाद चल रहा है ऐसे में देखना होगा कि सरकार राम मंदिर पर अध्यादेश लाकर कोई नया फ्रंट खोलती है क्या? "

इमेज कॉपीरइट TWITTER @RSSORG

ऐसे में समझना मुश्किल नहीं है कि राम मंदिर निर्माण मुद्दे पर बीजेपी की राज्य और केंद्र में बहुमत वाली सरकार होने के बाद भी वो आसानी से कोई बड़ा फ़ैसला नहीं ले सकती.

अध्यादेश लाना भी आम चुनाव तक राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ नहीं कर सकता क्योंकि राज्यसभा में बीजेपी को बहुमत नहीं है और लोकसभा में अध्यादेश पारित होने के बाद भी राज्यसभा में मामला अटक सकता है. ठीक उसी तरह से जिस तरह से एकसाथ तीन तलाक़ वाला मुद्दा अब तक क़ानून नहीं बन पाया है.

सुनीता एरॉन कहती हैं, "बीजेपी अगर अध्यादेश लाती भी है तो भी उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी और तब तक चुनाव आ जाएगा."

इमेज कॉपीरइट Getty Images

अध्यादेश का पेंच

2019 के आम चुनाव से पहले संसद में एक शीतकालीन सत्र ही होना है. मोटे तौर पर यह 15 दिसंबर से पांच जनवरी के बीच में आयोजित होता है. इतने कम समय में राम मंदिर मुद्दे को बीजेपी कितनी अहमियत देती है, इसे भी पार्टी ने अब तक तय नहीं किया है.

हालांकि आम मतदाताओं को रिझाने के लिए बीजेपी राम मंदिर निर्माण पर अध्यादेश लाने का काम कर सकती है, भले उसे क़ानून का रूप देना उसके बस से बाहर की बात हो.

इसकी एक वजह तो ये भी होगी कि पार्टी अपने हिंदुत्ववादी राजनीति के कार्ड को जिंदा रख पाएगी और अपने मतदाताओं को ये भी संदेश दे पाएगी कि 'हम तो मंदिर निर्माण चाहते हैं, लेकिन विपक्ष इसका विरोध कर रहा है'.

अध्यादेश लाने की स्थिति में विपक्षी दलों का साथ बीजेपी को मिल पाएगा, ये बात दावे से नहीं कही जा सकती है क्योंकि जब संघ प्रमुख मोहन भागवत ने राम मंदिर की बात कही थी तब बीजेपी के सहयोगी दल जनता दल यूनाइटेड के मुखिया नीतीश कुमार ने विरोध किया था.

लेकिन क्या देश भर के हिंदू मतदाताओं को अब इस झुनझुने से संभाला जा सकता है, ये चुनौती पार्टी के सामने रहेगी.

मोदी इकलौती उम्मीद

बीजेपी 1989 से ही राम मंदिर निर्माण का मुद्दा ज़ोर शोर से उठाती रही है और ऐसा पहली बार है कि यूपी और केंद्र सरकार में इतना बहुमत होने के बाद भी बीजेपी ने राम मंदिर बनाने को लेकर कोई स्पष्ट स्टैंड नहीं लिया है.

बीजेपी के कुछ नेता ऑफ़ द रिकॉर्ड बातचीत में ये ज़रूर मानते हैं कि पार्टी इस मुद्दे पर पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ से समर्थन वाले फ़ैसले की उम्मीद कर रही थी.

इतना ही नहीं आने वाले दिनों में संत समाज और विश्व हिंदू परिषद राम मंदिर निर्माण पर समर्थन जुटाने की कोशिशें तेज़ करने जा रहा है. इसके अलावा 14 जनवरी से इलाहाबाद में कुंभ मेले का आयोजन शुरू होने वाला है, जिसमें धर्म संसद का आयोजन भी होगा.

इन आयोजनों में राम मंदिर निर्माण और अयोध्या की बात गूंजेगी और बीजेपी की सरकार से सवाल भी पूछे जाएंगे, जो निश्चित तौर पर बीजेपी के लिए मुश्किलें बढ़ाने वाली होंगी.

इन मुश्किलों के बीच बीजेपी के लिए इकलौती उम्मीद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा ही है क्योंकि राम मंदिर मुद्दे पर देश भर में फैली भारतीय जनता पार्टी समाजवादी-बहुजन समाजवादी के गठबंधन के सामने 1993 में यूपी का चुनाव हार गई थी.

इसके बाद 2014 तक के तमाम चुनावों में पार्टी का वोट बैंक कम होता गया. राधिका रामाशेषन कहती हैं, "ये बात तो है कि 2014 का आम चुनाव हो या फिर 2017 का विधानसभा चुनाव यूपी में लोगों ने नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट दिए. राम मंदिर बड़ा मुद्दा नहीं था."

लेकिन भारतीय जनता पार्टी की एक मुश्किल ये भी रही है कि चुनाव नज़दीक आते ही उसे अयोध्या और राम मंदिर याद ज़रूर आते हैं.

वैसे अभी जो इस पूरे विवाद की स्थिति है, उसके मुताबिक ये मामला बीते आठ साल से सुप्रीम कोर्ट में है. इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने 30 सितंबर, 2010 को 2:1 के बहुमत वाले फ़ैसले में कहा था कि 2.77 एकड़ जमीन को तीनों पक्षों- सुन्नी वक्फ़ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला में बराबर-बराबर बांट दिया जाए.

इस फ़ैसले को किसी भी पक्ष ने नहीं माना और उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. सुप्रीम कोर्ट ने 9 मई 2011 को इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले पर रोक लगा दी थी.

सुनीता एरॉन कहती हैं, "बातें चाहे जितनी हो जाएं लेकिन 2019 के आम चुनाव तक यही यथास्थिति कायम रहेगी. कोई बदलाव नहीं हो पाएगा."

ये भी पढ़ें:-

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए