नज़रिया: भारत को अगले 10 साल तक मज़बूत सरकार क्यों चाहिए?

  • 30 अक्तूबर 2018
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भारतीय राजनीति और मीडिया में किसी के पूरे भाषण में से किसी एक हिस्से को निकालकर उस पर विवाद खड़ा करना एक नया मानक बनता जा रहा है.

भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने हाल ही में सरदार पटेल मेमोरियल लेक्चर में अपना भाषण दिया है.

डोभाल को भी ऐसे ही एक विवाद का सामना करना पड़ रहा है.

डोभाल अपने भाषण में अलग-अलग मुद्दों पर राय रखते हुए नज़र आए.

लेकिन उनके भाषण के इस हिस्से - ''अगले दस सालों में देश में एक मज़बूत सरकार होने की ज़रूरत है क्योंकि एक मज़बूत और स्थिर सरकार कड़े निर्णय ले सकती है जो कि गठबंधन वाली सरकार नहीं ले सकती"- को उठाकर एक विवाद खड़ा कर दिया गया.

डोभाल के आलोचकों ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार वर्तमान सरकार के लिए चुनावी भाषण दे रहे हैं.

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क्या डोभाल चुनावी भाषण दे सकते हैं?

हक़ीक़त ये है कि डोभाल एक पेशेवर नौकरशाह नहीं हैं. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) के रूप में उनका चुना जाना एक राजनीतिक नियुक्ति है.

इस आधार पर अगर वह राजनीतिक भाषण देते हैं या जिस सरकार का वह प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, उसका प्रचार करते हैं तो इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है.

इसके बाद भी डोभाल के बयान पर जो हायतौबा मची हुई है उसका कोई मतलब नहीं है क्योंकि डोभाल ने गठबंधन वाली सरकारों के ख़िलाफ़ बयान नहीं दिया है.

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वर्तमान सरकार भी एक गठबंधन सरकार है. हालांकि ये एक ऐसी गठबंधन वाली सरकार है जिसमें एक पार्टी बहुमत के लिए अपने सहयोगियों पर निर्भर नहीं है.

दरअसल डोभाल ने एक ऐसी गठबंधन वाली सरकार के ख़िलाफ़ बयान दिया है जो कि अपने आप में कमज़ोर हो.

अगर इस तथ्य को किनारे भी रख दें कि भारत में हर राजनीतिक पार्टी कई समूहों, समुदायों, वैचारिक मतों और हितों का गठबंधन है तो भी 1990 के दौर का अनुभव हमें उस अव्यवस्था के बारे में बताता है जब कमज़ोर गठबंधन सरकारें बनी थीं.

भारत के लिए क्यों ख़ास हैं अगले दस साल?

इस तरह के गठबंधन में घटक दल सरकार को अलग-अलग दिशा में खींचने की कोशिश करते हैं जिससे एक सरकार के लिए ज़रूरी वो सामंजस्य खो जाता है जो प्रशासन और नीति निर्माण के लिए ज़रूरी होता है.

कोई ये सवाल उठा सकता है कि डोभाल ने ये क्यों कहा कि भारत को अगले 10 सालों तक एक मज़बूत सरकार की ज़रूरत है और इसके बाद नहीं?

भारत को अनादिकाल तक एक मज़बूत सरकार की दरकार है. लेकिन अगले 10 सालों में ऐसा होना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अगले 10 साल भारत की सुरक्षा और आर्थिक प्रगति के लिए बेहद ख़ास हैं.

अंतरराष्ट्रीय राजनीति बदल रही है. भारत के पड़ोसी देशों में भी राजनीति तेज़ी से बदल रही है.

दुनिया में ऐसी ताक़तें जन्म ले चुकी हैं जो कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के अंतरराष्ट्रीय हालातों को चुनौती दे रही हैं.

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अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नए गुट और गठबंधन जन्म ले रहे हैं.

हम एक तरह से एक नए कोल्ड वॉर की शुरुआत देख रहे हैं जिसका असर सिर्फ़ हमारी ज़मीन पर ही नहीं बल्कि हमारी सामुद्रिक सीमाओं पर भी दिखाई देगा.

अर्थशास्त्र, तकनीक, राजनीति और रणनीति में एक तरह का गतिरोध दिखेगा. आगे का रास्ता न सिर्फ एक अनजान रास्ता होगा बल्कि इस रास्ते में तमाम बारूदी सुरंगे और जाल भी बिछे हैं.

ऐसी स्थिति में जो सरकार अपने असंतुष्ट सहयोगियों को साथ रखने में लगी रहेगी, वह भारत के लिए रास्ता बनाने की स्थिति में नहीं होगी.

अगले दशक में भारत को अपनी योजना, विज़न, रणनीति और कोल्ड वॉर 2.0 में अपनी स्थिति का निर्धारण करना होगा.

अंतरराष्ट्रीय हालातों की चुनौती

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क्या भारत अपने आपको किसी एक समूह के साथ जोड़ेगा या तटस्थ रहेगा? क्या भारत अलग-अलग तरीके अपनाकर तटस्थ बना रह सकता है या ट्रंप के दौर वाली दुनिया में ऐसा करना संभव भी होगा?

ऐसे में डोभाल अपनी जगह सही हैं कि कई कड़े निर्णय लिए जाने होंगे, कई नीतियों को ख़त्म करना होगा और राजनीतिक रूप से अरुचिकर क़दम उठाने होंगे.

ऐसे में एक कमज़ोर गठबंधन को ऐसी चुनौतियों का सामना करने और कड़े कदम उठाने में मुश्किल होगी.

इसके साथ ही ये भी कहा जा सकता है कि एक मज़बूत दिखने वाली स्थिर सरकार भी ग़लत फ़ैसले ले सकती है.

मज़बूत सरकारों के जोख़िम

मज़बूत सरकार होने के अपने जोख़िम हैं, लेकिन ये उन जोख़िमों से कम होते हैं जो कमज़ोर गठबंधन वाली सरकार के साथ आते हैं.

एक मज़बूत सरकार अपनी ग़लतियों को सुधार सकती है, लेकिन एक कमज़ोर गठबंधन वाली सरकार के लिए ऐसा करना मुश्किल होगा.

अंत में ज़रूरी बात ये नहीं है कि वर्तमान सरकार एक सिंगल पार्टी वाली सरकार है या एक गठबंधन वाली सरकार है.

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बल्कि ज़रूरी ये है कि क्या ये सरकार देश को राष्ट्रीय सुरक्षा, सामुदायिक सौहार्द और राजनीतिक स्थिरता देने के लिए सामने आने वाली चुनौतियों से अवगत है.

भारत में हमारे यहां सिंगल पार्टी वाली सरकारें आई हैं और उन्होंने भारी ग़लतियां की हैं.

उदाहरण के लिए, नेहरू ने चीन के मुद्दे पर जो नीति अपनाई या कश्मीर के मुद्दे पर सयुंक्त राष्ट्र में यक़ीन करने की ग़लती की.

हमने इंदिरा गांधी की सरकार देखी है जिन्होंने एक मज़बूत और निर्णय लेने वाली सरकार दी, लेकिन इस सरकार ने भी हमें ऐसी कई सामाजिक, राजनीति और आर्थिक समस्याएं दी हैं जिनका हम आज भी सामना कर रहे हैं.

राजीव गांधी को कश्मीर मुद्दे को ग़लत ढंग से हैंडल करने के लिए ज़िम्मेदार ठहरा सकते हैं जब उन्होंने 80 के दशक में जम्मू-कश्मीर की नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकार को अस्थिर किया था.

कमज़ोर सरकारों के बड़े फ़ैसले

लेकिन इसके बाद एक कमज़ोर सी दिखने वाली नरसिम्हा राव सरकार सामने आई जिसने आर्थिक मोर्चे पर अहम फ़ैसले लिए.

साल 1998 में वाजपेयी सरकार आई जिसने परमाणु परीक्षण करके अमरीका के साथ भारत के रिश्तों को हमेशा के लिए बदल दिया.

ऐसे में इस बात में कोई शक़ नहीं है कि भारत को एक मज़बूत सरकार की ज़रूरत है.

लेकिन मज़बूत सरकार की परिभाषा ये नहीं है कि वह अपने विपक्षियों को डराकर रखे.

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Image caption भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी

इसकी जगह एक ऐसी सरकार की ज़रूरत है जो कि एक अच्छा शासन दे सके.

ये सरकार ऐसी होनी चाहिए जो कि अपने नागरिकों को सुरक्षा दे सके और उन्हें सेहत, शिक्षा और स्वच्छता के मोर्चे पर जरूरी मदद दे सके. इसके साथ ही ऐसी सरकार देश को बाहरी ताकतों से सुरक्षा दे सके.

ऐसी सरकार को एक सिंगल पार्टी की सरकार होना ज़रूरी नहीं है.

हालांकि, एक सिंगल पार्टी के लिए एक ऐसी सरकार देना आसान होगा. लेकिन सामंजस्य से भरा हुआ एक ऐसा गठबंधन जो कि सरकार को अलग-अलग दिशाओं में न खींचे, वो भी ऐसी सरकार दे सकता है.

बड़ी शक्ति बनने की मांग

डोभाल के भाषण में से कुछ हिस्से को निकालकर उस पर विवाद बनाने की जगह उनके पूरे भाषण को सुना जाना ज़रूरी है. अगर भारत को सच में एक बड़ी शक्ति बनना है और इसे अपनी राष्ट्रीय ताक़त को बढ़ाना होगा.

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डोभाल अपनी सरकार के लिए वोट जुटाने की जगह ये बता रहे थे कि भारत को एक बड़ी ताक़त कैसे बनाया जा सकता है.

अगर उनको सुनने के बाद इस देश की जनता को लगता है कि वर्तमान सरकार डोभाल की बताई हुई योजना में फ़िट होती है तो वो 2019 में एक बार फिर वर्तमान गठबंधन को सत्ता में ला सकती है.

लेकिन अगर उसे लगता है कि एक गठबंधन भी ये कर सकता है तो उसे इसके मुताबिक़ वोट देना चाहिए.

आदर्श रूप से मीडिया को उन सब मुद्दों पर बहस शुरू करनी चाहिए थी जिनके बारे में डोभाल ने बात की.

लेकिन डोभाल की जगह मीडिया ने एक शानदार भाषण का राजनीतिकरण करके एक विवाद खड़ा करने की कोशिश की है.

(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)

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