RBI को मोदी सरकार की किस बात का डर है

  • 30 अक्तूबर 2018
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भारत के केंद्रीय बैंक रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया और केंद्र की वर्तमान मोदी सरकार के बीच की कड़वाहट अब सतह पर आ गई है. दोनों के बीच टकराव की स्थिति ऐसे समय में पैदा हुई है जब भारत की अर्थव्यवस्था हिचकोले खा रही है.

पिछले हफ़्ते शुक्रवार को आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने अपने भाषण में अर्जेंटीना के 2010 के आर्थिक संकट का ज़िक्र करते हुए चेताया था. कहा जा रहा है कि विरल काफ़ी ग़ुस्से में थे और उनका भाषण दर्शकों को हैरान करने वाला था.

अर्जेंटीना के केंद्रीय बैंक के गवर्नर को जमा पूंजी सरकार को देने के लिए मज़बूर किया गया था. अर्जेंटीना को डिफ़ॉल्टर तक होना पड़ा था. विरल आचार्य ने कहा कि अर्जेंटीना को सरकार के हस्तक्षेप की भारी क़ीमत चुकानी पड़ी थी.

आचार्य ने कहा था, ''जो सरकारें केंद्रीय बैंकों की स्वतंत्रता का सम्मान नहीं करती हैं वहां के बाज़ार तत्काल या बाद में भारी संकट में फंस जाते हैं. अर्थव्यवस्था सुलगने लगती है और अहम संस्थाओं की भूमिका खोखली हो जाती है.'' अर्जेंटीना में 2010 में ठीक ऐसा ही हुआ था.

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मतभेद के मुद्दे

आज यानी मंगलवार को इस तनाव के बीच आरबीआई गवर्नर और वित्त मंत्री अरुण जेटली की मुलाक़ात होने वाली है. पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने सरकार से आग्रह किया है कि इस टकराव को जल्दी ख़त्म करे. चिदंबरम ने कहा है कि आरबीआई और सरकार दोनों को बैठकर बात करनी चाहिए.

आरबीआई के वर्तमान नेतृत्व और मोदी सरकार के बीच कई मुद्दों पर मतभेद है. पिछले हफ़्ते आरबीआई बोर्ड की एक अधूरी और कलहपूर्ण बैठक हूई थी. आरबीआई बोर्ड में एस गुरुमूर्ति को मोदी सरकार ने नामित निदेशक बनाया है.

गुरुमूर्ति आरएसएस से जुड़े रहे हैं. कहा जा रहा है कि पिछले हफ़्ते आरबीआई बोर्ड की जो बैठक हुई थी उसमें गुरुमूर्ति उर्जित पटेल और उनकी टीम पर भड़क गए थे.

आरबीआई सिस्टम में पैसे डाल रहा है क्योंकि निवेशक डरे हुए हैं. रुपए में जारी गिरावट को थामने के लिए भी डॉलर मार्केट में लगाए गए हैं. ऐसे कई मुद्दे हैं जिन पर मोदी सरकार और आरबीआई में विवाद है.

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Image caption आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता पर संकट की आशंका जताई है

ब्याज दरों में कटौती को लेकर भी आरीबीआई और सरकार में एक राय नहीं है. उर्जित पटेल के तीन साल के गवर्नर का कार्यकाल अगले साल सितंबर में ख़त्म हो रहा है.

कहा जा रहा है कि वो अपने पूर्ववर्ती रघुराम राजन की तरह एक ही कार्यकाल के बाद इस्तीफ़ा दे देंगे. टाइम्स ऑफ़ इंडिया का कहना है कि वो शायद ये कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाएं.

केंद्रीय बैंकों और सरकारों के बीच टकराव केवल भारत की बात नहीं है. अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप भी फ़ेडरल रिज़र्व पर निशाना साधते रहते हैं.

कहा जा रहा है कि आरबीआई पर बैंकिंग सिस्टम के कारण भारी दबाव है. कई विश्लेषकों का कहना है कि आरबीआई क़र्ज़ देने में काफ़ी सख़्ती दिखा रहा है. दूसरी तरफ़ मोदी सरकार मुद्रा योजना के तहत क़र्ज़ दिलाने में कोई बाधा नहीं देखना चाहती है.

कई लोगों का कहना है कि मुद्रा योजना से भारत के बैंक नए क़र्ज़ संकट में फँस रहे हैं.

गुरुमूर्ति की नियुक्ति

आरबीआई को स्वदेशी जागरण मंच के सह-संयोजक एस गुरुमूर्ति की नियुक्ति भी रास नहीं आई थी. हालांकि आरबीआई ने इसका विरोध नहीं किया था.

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Image caption मोदी सरकार ने गुरुमूर्ति को आरबीआई बोर्ड में निदेशक बनाया है

जब नवंबर 2016 में पीएम मोदी ने नोटबंदी का फ़ैसला किया था तो इसके पीछे गुरुमूर्ति की अहम भूमिका मानी गई थी.

गुरुमूर्ति की नियुक्ति को विदेशी मीडिया ने भी तवज्जो दी थी. फ़ाइनैंशियल टाइम्स ने लिखा था कि हिन्दू राष्ट्रवादी पार्टी बीजेपी पर बैंकों की स्वायत्तता को कमज़ोर करने के आरोप लग रहे हैं.

वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता का कहना है कि गुरुमूर्ति को उनकी हिन्दूवादी विचारधारा के कारण ही नियुक्त किया गया है.

गुहा ने बीबीसी से कहा, ''गुरुमूर्ति ख़ुद को चार्टड अकाउंटेंट कहते हैं. इसके अलावा उनकी कोई विशेषज्ञता नहीं है. उन्होंने ही मोदी जी को नोटबंदी और मुद्रा योजना का आइडिया दिया था और उसे स्वीकार भी किया गया. वो आरएसएस और स्वदेशी जागरण मंच से जुड़े रहे हैं इसलिए ये इनाम मिला है.''

इससे पहले गुरुमूर्ति आरबीआई की नीतियों को लेकर बोलते रहे हैं. वो रघुराम राजन के प्रमुख आलोचकों में रहे हैं. राजन आईएमएफ़ में अर्थशास्त्री थे और उन्हें यूपीए सरकार के समय वित्त मंत्री रहे पी चिदंबरम ने आरबीआई का गवर्नर बनाया था.

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नोटबंदी के बारे में क्या कहते हैं रघुराम राजन?

साल की शुरुआत में गुरुमूर्ति ने एक ट्वीट किया था, "भारत केंद्रित समाधान तलाशने की बजाय आरबीआई वैश्विक विचारों के अधीन काम कर रहा है. ऐसा करके रघुराम राजन ने आरबीआई की स्वायत्तता को नुक़सान पहुंचाया है. आरबीआई अब इस लाइन से हट नहीं सकेगा, क्योंकि उसे वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा से अलग होने का डर रहेगा. आरबीआई ने भारत के लिए सोचने की अपनी क्षमता खो दी है."

अर्थव्यवस्था की चिंता

आरबीआई के साथ यह विवाद तब ज़ोर पकड़ रहा है, जब रुपया एशिया की सबसे कमज़ोर मुद्रा बनता जा रहा है.

विदेशी निवेशक भारतीय बाज़ार से पैसे निकाल रहे हैं. जानकारों का मानना है कि अगर आरबीआई और सरकार के बीच टकराव ऐसे बना रहा तो अर्थव्यवस्था की स्थिति और बुरी हो सकती है.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स का कहना है कि सरकार इस विवाद के सार्वजनिक होने से काफ़ी असहज है. रॉयटर्स के अनुसार इस टकराव का असर निवेशकों पर पड़ेगा. प्रधानमंत्री कार्यालय ने इसे बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताया है.

रॉयटर्स से सरकार के अधिकारियों ने कहा है, ''सरकार आरबीआई की स्वायत्तता का सम्मान करती है, लेकिन उसे भी अपनी ज़िम्मेदारी समझनी होगी.''

इस टकराव के बीच आरबीआई के कर्मचारियों ने अपने बॉस पर भरोसा जताया है और कहा है कि सरकार केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता को भंग ना करे. ऑल इंडिया एम्पलॉई एसोसिएशन ने इस पर एक बयान जारी कर इस टकराव के लिए सरकार की आलोचना की है.

सरकार चाहती है कि आरबीआई कुछ बैंकों को क़र्ज़ देने के मामले में उदारता दिखाए. आरबीआई के पास भुगतान सिस्टम के मामले में जो नियामक तंत्र है उसे सरकार शायद वापस लेना चाहती है.

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सरकार इसके लिए कोई नया नियामक तंत्र बनाना चाहती है. विरल आचार्य ने कहा है कि केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता के साथ खिलवाड़ किया गया तो यह विनाशकारी साबित होगा.

वित्त मंत्रालय के प्रवक्ता डीएस मलिक ने कहा है कि उन्होंने आचार्य की टिप्पणी सुनी है, लेकिन वो इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देंगे.

आरबीआई ने ऐसे 11 बैंकों को चिह्नित किया है जिनका एनपीए बेशुमार बढ़ गया है. इन बैंकों को आरबीआई ने क़र्ज देने पर भी पाबंदी लगा दी है.

पिछले हफ़्ते आरबीआई ने अप्रत्याशित रूप से एक नोट प्रकाशित किया था, जिसमें पेमेंट सिस्टम के लिए अलग से नियामक संस्था बनाए जाने का विरोध किया गया है. अभी ये काम आरबीआई करता है, लेकिन जानकारों के मुताबिक मोदी सरकार ये काम आरबीआई से शायद वापस लेना चाहती है.

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