मालेगांव धमाका मामले में पुरोहित-प्रज्ञा सिंह ठाकुर पर चलेगा मुक़दमा

  • 30 अक्तूबर 2018
पुरोहित इमेज कॉपीरइट PTI

एनआईए यानी नेशनल इंवेस्टिगेटिंग एजेंसी के स्पेशल कोर्ट ने लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित की उस याचिका को ख़ारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने 2008 के मालेगांव धमाका मामले में ख़ुद को आरोप मुक्त किए जाने की अपील की थी.

इस याचिका के ख़ारिज किए जाने के बाद इस मामले के सभी सातों अभियुक्त साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, रिटायर्ड मेजर रमेश उपाध्याय, समीर कुलकर्णी, अजय राहिरकर, सुधाकर द्विवेदी और सुधाकर चतुर्वेदी पर चरमपंथी षड्यंत्र रचने, हत्या और अन्य मामले में आरोप तय हो गए हैं.

इन सातों पर एनआईए की विशेष अदालत में मुक़दमा चलेगा. इस मामले की अगली सुनवाई दो नवंबर को होगी.

इसस पहले मुंबई हाई कोर्ट ने सोमवार को पुरोहित और अन्य अभियुक्तों पर आरोप तय किए जाने पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था. हालांकि जस्टिस एस.एस. शिंदे और ए.एस.गडकरी की पीठ ने अगले महीने पुरोहित की याचिका पर सुनवाई के लिए तैयार हो गई है.

पिछले साल 27 दिसंबर, एनआईए की विशेष अदालत ने पुरोहित, ठाकुर और अन्य लोगों की इस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें उन्होंने इस मामले से डिस्चार्ज किए जाने की मांग की थी. डिस्चार्ज किया जाना, आपराधिक मामलों में ट्रायल से पहले की प्रक्रिया है.

हालांकि उस समय अदालत ने इन लोगों पर महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ़ आर्गेनाइज्ड क्राइम एक्ट (मकोका) के तहत मुक़दमा चलाए जाने की अनुमति नहीं दी थी, लेकिन कहा था कि इन पर भारतीय दंड संहिता के तहत हत्या और आपराधिक षड्यंत्र का मुक़दमा चलेगा.

साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित समेत सात अभियुक्तों पर अब

  • चरमपंथ के ख़िलाफ़ बनाए गए क़ानून यूएपीए की धारा 16 और 18,
  • और आईपीसी की धारा 120बी (आपराधिक साज़िश),
  • 302 (हत्या),
  • 307 (हत्या की कोशिश)
  • और 326 (इरादतन किसी को नुकसान पहुंचाना) के तहत मामला चलेगा.

कौन हैं कर्नल पुरोहित

मालेगांव धमाके के अभियुक्त संख्या 9 लेफ़्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित बीते साल 23 अगस्त को 2017 को रायगढ़ ज़िले के उच्च सुरक्षा वाले तालोजा जेल परिसर रिहा हुए थे.

इमेज कॉपीरइट Reuters

वैसे 5 नवंबर 2008 को गिरफ़्तार किए गए कर्नल पुरोहित को 21 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने ज़मानत दे दी थी, जिसके बाद नौ साल से जेल में बंद पुरोहित की रिहाई का रास्ता साफ़ हुआ था.

मराठा लाइट इंफ़ेंट्री के लिए नियुक्त किए गए कर्नल पुरोहित बाद में सेना की मिलिट्री इंटेलिजेंस फ़ील्ड यूनिट का हिस्सा बन गए थे. जब उन्हें गिरफ़्तार किया गया तब वो सेना की मिलिट्री इंटेलिजेंस के लिए ही काम कर रहे थे.

मामले में दायर एटीएस की पहली चार्जशीट के मुताबिक अभियुक्त कर्नल पुरोहित ने साल 2007 में 'अभिनव भारत' नाम का एक संगठन बनाया जिसका उद्देश्य एक "पृथक हिंदू राष्ट्र का निर्माण करना था" जिसका अपना अलग संविधान और अलग भगवा ध्वज हो.

एटीएस के मुताबिक़ 'अभिनव भारत' संगठन के लोगों ने फ़रीदाबाद, कोलकाता, भोपाल, जबलपुर, इंदौर और नासिक शहरों में बैठकों की और धमाके करने की आपराधिक साज़िशें रचीं.

'अभिनव भारत' संगठन अपना उद्देश्य पूरा करने के लिए पूरे भारत से लोगों को अपने साथ जोड़ रहा था.

क्या है पूरा मामला

महाराष्ट्र के मालेगांव के अंजुमन चौक और भीकू चौक पर 29 सितंबर 2008 को बम धमाके हुए थे. इनमें छह लोगों की मौत हो गई थी और 101 लोग घायल हुए थे.

इन धमाकों में एक मोटरसाइकिल का इस्तेमाल किया गया था. रमज़ान के महीने में मुस्लिम बहुल इलाक़े में हुए इस धमाके की शुरुआती जाँच महाराष्ट्र एटीएस ने की थी.

महाराष्ट्र एटीएस ने अभियुक्तों पर मकोका एक्ट की धाराएं भी लगाई थीं. महाराष्ट्र एटीएस ने जांच पूरी करने के बाद 11 गिरफ़्तार और 3 फ़रार अभियुक्तों के खिलाफ़ मामले में पहली चार्जशीट 20 जनवरी 2009 को दायर की थी.

इसके बाद 21 अप्रैल 2011 को महाराष्ट्र एटीएस ने अतिरिक्त चार्जशीट भी अदालत में पेश की थी. भारत सरकार के जनवरी 2011 में आए एक आदेश के बाद इस मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी को सौंप दी गई थी.

अभियुक्तों ने उच्च न्यायालयों में कई याचिकाएं दायर कर मकोका एक्ट लगाए जाने को चुनौती दी थी.

एनआईए इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद जांच अप्रैल 2015 में ही शुरू कर सकी. 2015 तक एनआईए ने इस मामले में कोई साक्ष्य अदालत में पेश नहीं किया.

राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने मई 2016 में चार्जशीट दायर की जिसमें कर्नल पुरोहित समेत सभी अभियुक्तों पर से मकोका क़ानून की धाराएं हटा ली गईं.

इस मामले की सरकारी वकील रोहिणी सालियां ने 2015 में ये आरोप लगाते हुए इस्तीफ़ा दे दिया कि एनआईए ने उनसे मुक़दमे की गति धीमी करने को कहा था.

मामले की जांच से अलग होने की वजह बताते हुए सालियां ने बीबीसी से कहा था, "अब तो यह साफ़ हो गया है कि उनका एजेंडा अलग है. उन्हें मेरी सेवाएं नहीं चाहिए. पूरी सुनवाई में उनके मुताबिक़ कोई भी फ़ैसला नहीं आया. मेरी सेवा उनके लिए सुविधाजनक नहीं है. इस केस की ज़िम्मेदारी मेरे पास है, इसलिए जनता को इस बारे में पता होना चाहिए. उन्होंने बड़े विश्वास से मुझे यह केस सौंपा था. अगर कोई इसमें हस्तक्षेप करता है तो मुझे ठीक नहीं लगेगा. एक सरकारी वकील होने के नाते निष्पक्ष पैरवी की हमारी ज़िम्मेदारी बनती है. इसीलिए यह बात बताकर मैं केस से बाहर आई."

ये भी पढ़ें:-

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

मिलते-जुलते मुद्दे