गर्भ में भी बच्चे तक कैसे पहुंच जाता है प्रदूषण

  • 30 अक्तूबर 2018
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बच्चे बाहर खेलें-कूदें, खिलखिलाएं और खुल कर सांस लें तो माना जाता है कि इससे उनका शारीरिक विकास होगा. लेकिन अब यही खुल कर सांस लेना बच्चों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है.

हवा में बढ़ता प्रदूषण उनमें कई तरह की बीमारियां पैदा कर रहा है और उनके शारीरिक और मानसिक विकास में रुकावट डाल रहा है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की हालिया रिपोर्ट बच्चों पर प्रदूषण के गंभीर प्रभाव को दिखाती है. रिपोर्ट के मुताबिक साल 2016 में पांच साल से कम उम्र के एक लाख से ज़्यादा (101 788.2) बच्चों की प्रदूषण के कारण मौत हो गई.

'एयर पॉल्यूशन एंड चाइल्ड हेल्थ: प्रेसक्राइबिंग क्लीन एयर' नाम की इस रिपोर्ट में प्रदूषण के बढ़ते स्तर के कारण बीमारियों के बढ़ते बोझ को लेकर सावधान किया गया है.

रिपोर्ट में बताया गया है कि बाहर की हवा में मौजूद पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) 2.5 के कारण पांच साल की उम्र के बच्चों की सबसे ज़्यादा मौतें भारत में हुई हैं. पार्टिकुलेट मैटर धूल और गंदगी के सूक्ष्म कण होते हैं जो सांस के ज़रिए शरीर के अंदर जाते हैं.

बच्चों के लिए जानलेवा प्रदूषण

इसके कारण भारत में 60,987, नाइजीरिया में 47,674, पाकिस्तान में 21,136 और कांगों में 12,890 बच्चों की जान चली गई.

इन बच्चों में लड़कियों की संख्या ज़्यादा है. कुल बच्चों में 32,889 लड़कियां और 28,097 लड़के शामिल हैं.

प्रदूषण से सिर्फ़ पैदा हो चुके बच्चे ही नहीं बल्कि गर्भ में मौजूद बच्चों पर भी बुरा असर पड़ता है. रिपोर्ट कहती है कि प्रदूषण के कारण समय से पहले डिलीवरी, जन्म से ही शारीरिक या मानसिक दोष, कम वज़न और मृत्यु तक हो सकती है.

ऐसे तो प्रदूषण का सभी पर बुरा असर माना जाता है, लेकिन रिपोर्ट की मानें तो बच्चे इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं. प्रदूषण बच्चों के लिए कैसे जानलेवा साबित होता है, गर्भ में मौजूद बच्चे को यह कैसे बीमार कर सकता है.

नवजात और बड़े बच्चे

डॉक्टर्स का मानना है कि प्रदूषण का नवजात और थोड़े बड़े बच्चों (जो बाहर खेलने जा सकते हैं) पर अलग-अलग तरह से असर पड़ता है. नवजात बच्चा बीमारियों से लड़ने में कमज़ोर होता है और बड़े होने के साथ उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती जाती है.

नवजात बच्चों पर प्राइमस हॉस्पिटल में फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों के विशेषज्ञ डॉक्टर एसके छाबड़ा कहते हैं, ''नवजात बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है. उनके फेफड़ों का विकास ठीक से नहीं हुआ होता है. ऐसे में प्रदूषण उसे जल्दी प्रभावित करता है. उसे खांसी, जुकाम जैसी एलर्जी हो सकती हैं. यहां तक कि अस्थमा और सांस लेने में दिक्कत बढ़ जाती है. यही बीमारियां बढ़कर मौत का कारण बन सकती हैं. इस दौरान बच्चे का मानसिक विकास भी हो रहा होता है और प्रदूषण के कण इसमें बाधा बनते हैं.''

''नवजात बच्चों को घर में होने वाला प्रदूषण ज़्यादा प्रभावित करता है. घर में खाना पकाने, एसी, परफ्यूम, धूम्रपान और धूप व अगरबत्ती जलाने से होने वाले धुंए से प्रदूषण होता है. ग्रामीण इलाकों में खाना पकाने के लिए लकड़ी या कोयले का इस्तेमाल होता है जिसका धुंआ फेफड़ों पर बहुत ख़राब असर डालता है.''

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रिपोर्ट में भी बाहरी और घरेलू प्रदूषण के प्रभाव को अलग से आंका गया है. घरेलू प्रदूषण को भी उतना ही ख़तरनाक बताया गया है. साल 2016 में घरेलू प्रदूषण के कारण पांच साल से कम उम्र के 66 890.5 बच्चों की मौत हो गई.

इसके पीछे की वजह बताते हुए एसके छाबड़ा कहते हैं कि ''नवजात बच्चे घर में ज़्यादा रहते हैं. उनका जमीन से संपर्क भी ज़्यादा रहता है. जब वह थोड़ा चलने लगते हैं तो अधिकतर मां के साथ रहते हैं. इसलिए रसोई में भी उनका काफ़ी समय बीतता है. इससे बच्चे घरेलू प्रदूषण से ज़्यादा प्रभावित होते हैं और यह प्रदूषण कई बार बाहर के प्रदूषण से भी ज़्यादा ख़तरनाक होता है.''

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बड़े बच्चों पर प्रभाव

बड़े बच्चों के संबंध में गंगाराम अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर धीरेन गुप्ता कहते हैं कि बच्चों के थोड़ा बड़ा होने पर वह बाहर खेलने लगते हैं. घर में उनका कम समय बीतता है. फिर सुबह प्रदूषण का स्तर काफी ज़्यादा होता है और बच्चे उसमें ही स्कूल जाते हैं. इसलिए इस उम्र में वो बाहरी प्रदूषण से अधिक प्रभावित होते हैं. आजकल बच्चों को कम उम्र में चश्मा भी लग जाता है. प्रदूषण भी इसका एक कारण है.

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डॉक्टर धीरेन गुप्ता बताते हैं कि बड़े होने के साथ बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती जरूर है लेकिन प्रदूषण का प्रभाव हर उम्र में पड़ सकता है. पहले से जिन बच्चों को सांस संबंधी कोई बीमारी होती है उनके लिए हालात और मुश्किल हो जाते हैं. सड़क पर प्रदूषण के कण नीचे की तरफ इकट्ठा होते हैं इसलिए भी बच्चे ज़्यादा प्रभावित होते हैं क्योंकि उनकी लंबाई कम होती है.

वह कहते हैं, ''इस वक्त जो प्रदूषण का स्तर है या आगे होने वाला है वो बहुत ख़तरनाक है. मेरे पास आने वाले बच्चों की संख्या 30 प्रतिशत तक बढ़ गई है. बच्चों की दवाई की डोज़ बढ़ानी पड़ी है. उनमें इंफेक्शन बढ़ गया है.''

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गर्भ में मौजूद बच्चे पर असर

रिपोर्ट बताती है कि गर्भ में मौजूद बच्चा भी प्रदूषण से नहीं बच पाता. इसके कारण समयपूर्व डिलीवरी और जन्म से दोष जैसी समस्याएं हो जाती हैं.

मैक्स अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर अनिता चांदना इसे बिल्कुल सही बताती हैं. उन्होंने बताया कि किस तरह प्रदूषण मां के ज़रिए बच्चे तक पहुंचता है.

अनिता चांदना कहती हैं, ''गर्भ होने से पहले या होने के बाद पहला एक महीना जब बच्चा गर्भ के अंदर होता है तब वह वायु प्रदूषण से सबसे ज़्यादा प्रभावित होता है. मां जब सांस लेती है तो वायु में मौजूद पार्टिकुलेट मैटर उसके शरीर में पहुंचते हैं. ये इतने महीन होते हैं कि कुछ फेफड़ों से चिपक जाते हैं, कुछ खून में घुल जाते हैं और कुछ प्लेसेंटा तक भी पहुंच जाते हैं. प्लेसेंटा गर्भ के पास ही होता है जिससे बच्चे को पोषण मिलता है.''

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''ये पार्टिकुलेट मैटर या प्रदूषण के कण प्लेसेंटा में इकट्ठे हो जाते हैं. यहां एक तरह से सूजन पैदा हो जाती है. तो जब ये अप्राकृतिक चीज प्लेसेंटा पर पहुंचती है तो वहां व्हाइट ब्लड सेल्स बढ़ जाते हैं. वहां पर जमावट हो जाती है और बच्चे तक रक्त प्रवाह में रुकावट होने लगती है. इसी रक्त से बच्चे को पोषण मिलता है. रक्त कम पहुंचने से बच्चे का विकास रुक जाता है, वह शारीरिक या मानसिक रूप से अपंग हो सकता है. उसका दिमाग पूरी तरह विकसित नहीं हो पाता. जब प्लेसेंटा ठीक से रक्त प्रवाह नहीं कर पाती और जल्दी मैच्योर हो जाता है तो समय से पहले प्रसव हो जाता है.''

डॉक्टर चांदना के मुताबिक इससे बच्चे का वजन कम हो सकता है, वह किसी मानसिक विकार से ग्रस्त हो सकता है, अस्थमा या फेफड़ों संबंधी बीमारियां भी हो सकती हैं. इसमें बच्चे की मौत भी हो सकती है.

हालांकि, इन बीमारियों के बारे में डॉक्टर छाबड़ा बताते हैं कि हर समस्या सिर्फ प्रदूषण के असर की वजह से नहीं होती. प्रदूषण अन्य कारणों में से एक बड़ा कारण जरूर हो सकता है, लेकिन सिर्फ एक ही कारण नहीं. जैसे अगर बच्चे का वजन कम है तो इसका कारण मां को पर्याप्त पोषण न मिलना भी हो सकता है. कई कारण मिलकर बीमारी को जन्म दे सकते हैं. प्रदूषण बीमारी के कारणों में योगदान देता है.

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रिपोर्ट की अन्य बातें

  • पांच से ज़्यादा उम्र के बच्चों को भी प्रदूषण से बचाना बहुत जरूरी है.​ रिपोर्ट बताती है ​कि साल 2016 में पांच से 14 साल के 4,360 बच्चों की वायु प्रदूषण से जान चली गई.
  • निम्न और मध्यम आय वाले देशों में पांच साल से कम उम्र के 98 प्रतिशत बच्चे पीएम 2.5 से प्रभावित होते हैं. वहीं, उच्च आय वाले देशों में ये 52 प्रतिशत है.
  • वायु प्रदूषण वातावरण के लिए एक बहुत बड़ा खतरा है. बाहरी और घरेलू हवा में मौजूद प्रदूषण के महीन कणों के करण विश्व में हर साल करीब 70 लाख समयपूर्व मौतें होती हैं.
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कैसे हो सकता है बचाव

  • सबसे पहले तो मां को प्रदूषण से बचाएं ताकि बच्चा सुरक्षित रहे.
  • घरेलू प्रदूषण को कम करने की कोशिश करें.
  • नवजात को मां का दूध पिलाएं. उससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है.
  • बच्चों को विटामिन सी से जुड़ी चीजें खिलाकर रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करें, जैसे संतरा, अमरूद और नींबू इसमें काम आ सकता है.
  • दीवाली के दौरान लोग रात भर घर में दिया जलाकर रखते हैं तो ऐसा करने से बचें.
  • पटाखे प्रदूषण का बड़ा कारण बनते हैं तो उन्हें कम जलाएं और अपनी तरफ से प्रदूषण कम करने की कोशिश करें.

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