नेताओं के महिला विरोधी बयान कैसे बढ़ाते हैं यौन अपराध?

  • 1 नवंबर 2018
यौन अपराध

सार्वजनिक ट्रांसपोर्ट में सफर करते हुए किसी ने उसे पीछे से छुआ. सफर करते हुए वो सो रही थी लेकिन किसी के इस तरह छूने से उसकी नींद खुल गई.

अपने आसपास काफ़ी भीड़ होने की वजह से उसने सोचा कि शायद ये ग़लती से हुआ होगा. लेकिन आधे घंटे बाद उसे फिर से छेड़छाड़ का सामना करना पड़ा. तब उस महिला को अहसास हुआ कि उसका यौन शोषण किया गया था.

न्यू मेक्सिको की इस घटना में अभियुक्त को यौन शोषण का आरोप लगा. लेकिन इस शख़्स ने अपने बचाव में कहा कि राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप कहते हैं कि महिलाओं को पकड़ना सही है तो मैंने पकड़ लिया.

साल 2016 के अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान एक टेप सामने आया था जिसमें ट्रंप को महिलाओं के साथ ग़लत व्यवहार करके उसका बखान करते सुना जा सकता है.

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ये टेप साल 2005 के दौरान टीवी होस्ट बिलि बुश के साथ बातचीत का था. दोनों लोगों को ये नहीं पता था कि उनकी आवाज़ को रिकॉर्ड किया जा रहा है.

इस टेप में ट्रंप ये कहते सुने जा सकते हैं, "आप महिलाओं के साथ कुछ भी कर सकते हैं, उन्हें पीछे से पकड़ सकते हैं."

अगर कोई व्यक्ति किसी महिला का शोषण करता है और कहता है कि मैं ये इस वजह से कर रहा हूं क्योंकि किसी फलां व्यक्ति ने कहा था कि इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है.

ये बात सुनकर आप क्या सोचेंगे. आप या तो ये सोचेंगे कि ये व्यक्ति झूठ बोल रहा है और अपने जुर्मों के लिए किसी दूसरे पर आरोप मढ़ रहा है. या तो आप ये सोच सकते हैं कि ये व्यक्ति पागल है और बिना सोचे समझे दूसरे लोगों को फॉलो कर रहा है.

लेकिन सोचिए कि अगर ऐसे बयान देने वाला व्यक्ति एक राजनेता या प्रभावशाली व्यक्ति हो?

भारत में भी ऐसे मामलों की कोई कमी नहीं है.

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क्या आपको साल 2014 में मुलायम सिंह यादव का दिया हुआ बयान याद है.

चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने बलात्कार के मामलों में मृत्युदंड का विरोध करते हुए कहा, "लड़कों से ग़लतियां हो जाती हैं तो क्या आप उन्हें फ़ांसी पर चढ़ा दोगे."

वरिष्ठ नेता शरद यादव ने भी राज्य सभा में बीमा कानून पर जारी बहस के दौरान कहा, "दक्षिण भारत की महिलाएं सांवली तो ज़रूर होती हैं, लेकिन उनका शरीर खूबसूरत होता है, उनकी त्वचा सुंदर होती है, वे नाचना भी जानती हैं."

संसद में स्मृति ईरानी ने जब शरद यादव पर सवाल उठाए तो उन्होंने ईरानी पर टिप्पणी करते हुए कहा था, 'मैं जानता हूं कि आप कौन हैं."

बयान क्या बिगाड़ सकते हैं?

यही नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वो बयान कोई कैसे भूल सकता है जब उन्होंने कांग्रेस नेता रेणुका चौधरी को शूर्पणखा बता दिया.

कोई ये सोच सकता है कि ये कभी कभार आने वाले बयान किसी का क्या बिगाड़ सकते हैं. अगर हम इनसे सहमत न हों तो हम हमेशा इन्हें नज़रअंदाज़ कर सकते हैं. लेकिन ये उतना आसान नहीं है जितना लगता है.

राजनीतिक विश्लेषक सुजाता आनंदन ने एक बार मुझे बताया था कि राजनेता अपने समर्थकों के लिए देवताओं जैसे होते हैं.

वो कहती हैं, "विडंबना ये है कि ऐसे लैंगिक बयान देने वाले लोगों की पार्टी के दूसरे नेता भी इन बयानों से सहमत नहीं होते हैं. शिव सेना के बाल ठाकरे ने अक्सर ही महिलाओं के बारे में ग़लत बयान दिए हैं लेकिन उनके समर्थकों ने उनके ऐसे बयानों का स्वागत किया. जबकि उनकी ही पार्टी के कई लोग ऐसे बयानों को लेकर सहज नहीं होते थे."

इसके बाद जब मैंने सुजाता से एक सवाल किया कि जब राजनेता ऐसे बयान देते हैं तो ये बयान समाज के मानस को किस तरह प्रभावित करते हैं.

इसके जवाब में सुजाता कहती हैं, "हम एक समाज के रूप में महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने में यकीन नहीं रखते हैं. ऐसे में जब ऊंचे पदों पर बैठे लोग महिलाओं के बारे में ऐसे बयान देते हैं तो लोगों को प्रोत्साहन मिलता है. ये कुछ इस तरह है कि कोई बड़ी ताकत आपके किसी विश्वास को समर्थन दे रही हो. ऐसे में मामलों में वो लोग जो किसी एक नेता को फॉलो नहीं करते हैं तो वे इन बयानों का इस्तेमाल अपने ग़लत कामों को ठीक ठहराने में करने लगते हैं."

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Image caption कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी

इसी वजह से जब मोदी ने शूपर्नखा विशेषण का प्रयोग किया तो मैंने इसका विरोध किया. क्योंकि ऐसा करके वह एक राजनीतिक विरोधी को ही निशाना नहीं बना रहे थे बल्कि एक महिला का भी असम्मान कर रहे थे.

वह ये भी रेखांकित करते हैं कि जो महिलाएं ऊंची आवाज़ में बात करती हैं, हंसती हैं और पुरुषों का विरोध करती हैं तो वे अच्छी महिलाएं नहीं होती हैं. ऐसे महिलाएं शूर्पनखा होती हैं.

इससे ये मतलब भी निकाला जा सकता है कि महिलाओं को बेइज़्ज़त करने के लिए उनकी नाक को काट देना भी स्वीकार्य है. बल्कि, ये स्वीकार्य नहीं है, इसका सुझाव दिया जाता है.

अगर सारे राजनेता समाज में इतना ज़हर उगल रहे हैं तो हम समानता की बात भी कैसे शुरू कर सकते हैं.

नेताओं की अंधभक्ति

इससे मेरे मन में एक सवाल पैदा होता है कि क्या हम अपने नेताओं की अंधभक्ति करने जा रहे हैं. क्या हम सही और ग़लत का फ़ैसला नहीं करेंगे? हमारी समझ और नैतिकता का अर्थ क्या है?

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मनोविज्ञानी डॉ. प्रवीण त्रिपाठी इस सवाल का जवाब देते हुए बताते हैं, "इसमें हमें दो चीजें देखनी होंगी. सबसे पहले समर्थक ये सोचते हैं कि उनके नेता ने जो भी कहा है, वो सही है. चाहे वो उनके व्यक्तिगत विचारों और नैतिकता के विपरीत हो. लोग अपने नेता की अंधभक्ति करते हैं क्योंकि वे उन जैसा ही बनना चाहते हैं. ये नेता एक राजनेता, आध्यात्मिक, खिलाड़ी और फ़िल्म स्टार भी हो सकता है."

डॉक्टर त्रिपाठी इस मामले को विस्तार से समझाते हुए बताते हैं कि ये मनोविज्ञान में एक टर्म इंट्रोजेक्शन का ये शानदार उदाहरण है. लोग बिना जाने किसी व्यक्ति का व्यवहार अपना लेते हैं. इस मामले में वो व्यक्ति एक नेता होता है.

इस व्यवहार को समझाते हुए वह कहते हैं, "कुछ लोग जो किसी ऐसे नेता का अनुसरण भी नहीं करते हैं, वे भी अपने तर्कों को स्थापित करने के लिए ऐसे बयानों का प्रयोग करते हैं."

अगर सरल शब्दों में समझाया जाए तो अगर एक लड़का किसी लड़की का शोषण करना चाहता है तो वह ऐसा कर सकता है और आसानी से ये कह सकता है कि नेताजी ने भी कहा है कि लड़कों से ग़लतियां हो जाती हैं, इसमें बड़ी बात क्या है.

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'गंदी बात' को समाज में स्वीकार्यता दिलाया जाना

जब शाहिद कपूर अपने फ़िल्म में गाते हैं, "अच्छी बातें कर ली बहुत, अब करूंगा तेरे साथ गंदी बात" तो सिनेमा हॉल के बाहर सैकड़ों लड़के शाहिद जैसा बनना चाहते हैं.

वे भी महिलाओं के साथ गंदी बात करना चाहते हैं.

सिनेमा के पर्दे पर दिखने वाले हीरो महिलाओं के शोषण को सामान्य घटना के रूप में स्थापित करते हैं.

आप किसी भी चौराहे पर एक 'भाई' को देख सकते हैं. इंट्रोजेक्शन ही वो वजह जिसके कारण वो हर जगह दिखाई पड़ते हैं.

वे ये भी सोचते हैं कि उद्दंडता, महिलाओं के ख़िलाफ़ ग़लत व्यवहार, सेक्सिट व्यवहार और लड़कियों का पीछा करना भी ठीक है क्योंकि भाई ऐसा करता है.

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हमारी फ़िल्में, लोक कथाएं और शास्त्र बड़ी सहजता के साथ स्वीकृति लेने के विचार को दरकिनार करते हैं. इसी वजह से हमारे भगवान भई महिलाओं का पीछा करते हैं, उनके कपड़े चुराते हैं और उनकी मर्जी के बिना उनका हाथ पकड़ लेते हैं. और हम ऐसी कहानियों को पसंद करते हैं.

हमारे समाज में महिलाओं को किसी का छुप छुपकर पीछा करना इतनी गहराई में समाया हुआ है कि हमारे दिमाग से भी ये आसानी से नहीं निकल सकता.

ऐसे में इसका जवाब क्या है. पितृसत्तात्मक समाज को इसकी परवाह करने की ज़रूरत नहीं है. उनके पास अपने समाधान हैं जिनमें महिलाओं को घर के अंदर बंद करना, उन्हें आगे बढ़ने की इजाज़त न देना, शिक्षा न देना और उन्हें पर्दे में रहने के लिए बाध्य करना शामिल है.

हालांकि, आज की दुनिया में ये संभव नहीं है. ऐसे में सिर्फ एक विकल्प बचता है कि अपने बेटों को सही मूल्यों के साथ बड़ा करें. उन्हें वो संस्कार दें जिससे महिलाओं का सम्मान करना उनके आचार-विचार में शामिल हो जाए. सबसे ज़्यादा अहम बात ये है कि उन्हें अपने विवेक का इस्तेमाल करने और आज़ादी के साथ सोचने का प्रशिक्षण दें जिससे वे अंधभक्तों की तरह अपने रोल मॉडल्स का अनुसरण न करें.

जहां तक नेताओं का सवाल है तो जब उनको पता चलेगा कि उनकी अपमानजनक टिप्पणियों पर तालियां नहीं बजती हैं, कोई भी उनकी सेक्सिस्ट फ़िल्में नहीं देखता है, कोई भी महिलाओं के ख़िलाफ़ बयानबाजी करने पर उनका अनुसरण नहीं करेगा तो वे इस तरह व्यवहार करना बंद कर देंगे.

जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक हमें शूर्पनखा जैसी टिप्पणियां सुनने को मिलती रहेंगीं.

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