वो काग़ज़, जो हाशिमपुरा के हत्यारों को जेल पहुंचाएगा

  • 31 अक्तूबर 2018
हाशिमपुरा इमेज कॉपीरइट Getty Images

मेरठ के हाशिमपुरा में 31 साल पहले हुए नरसंहार में दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को सभी अभियुक्तों को उम्रकैद की सज़ा सुनाई है.

इससे पहले ट्रायल कोर्ट ने पीएसी के 16 जवानों को इस केस में संदेह का लाभ देते हुए 2015 में बरी किया था.

इस केस में मानवाधिकार आयोग की तरफ़ से केस लड़ने वाली वकील वृंदा ग्रोवर ने बीबीसी हिंदी से बताया, ''कोर्ट का ये फ़ैसला आया है कि पीएसी के जिन जवानों को छोड़ दिया गया था, अब उन्हें उम्रकैद की सज़ा मिली है. कोर्ट ने कहा कि इस बात के ठोस सबूत हैं कि पीएसी के जवानों ने अल्पसंख्यकों को जानबूझकर निशाना बनाया था.''

वृंदा ग्रोवर ने बताया, ''ये सज़ा आईपीसी की धारा 302, 120 बी, 307, 366, 201 के तहत सुनाई गई हैं. कोर्ट ने ये भी कहा कि इस केस में अहम जनरल डायरी एंट्री (GDE) थी, जिसे ट्रायल कोर्ट की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष की ओर से छिपा दिया गया था. हमने वो कागज़ निकलवाया और हाईकोर्ट में दोबारा एविडेंस रिकॉर्ड हुए. इस डायरी में 19 लोगों को स्पष्ट नाम लिखा था कि इन लोगों ने ट्रक में ले जाकर लोगों को मार दिया था. इनमें से तीन लोग अब जीवित नहीं हैं.''

कोर्ट ने अपने फ़ैसले के आधार में 16 अप्रैल 2018 को अभियुक्तों के दर्ज बयानों को भी अहम माना.

हाशिमपुरा नरसंहार के वक़्त एक शख़्स ज़ुल्फिकार भी थे, जो पीएसी के जवानों की गोली से बच गए थे.

बीबीसी हिंदी से बात करते हुए ज़ुल्फिकार ने कहा, ''31 साल से जो हम लड़ाई लड़ रहे थे. आज कोर्ट के फैसले के बाद हमारी जीत हुई है. अदालत के हम आभारी हैं कि इंसाफ को कायम रखा गया है. जो झूठ दबाया हुआ था ताकि केस कमज़ोर पड़ जाए. आज हमारी जीत हुई है. हाशिमपुरा में आज मिठाइयां बंट रही हैं.''

क्या था पूरा मामला?

1987 में हाशिमपुरा कस्बे में हुए नरसंहार में 40 मुसलमान मारे गए थे.

1987 में मेरठ में हुए दंगे के बाद पीएसी के जवान हाशिमपुरा मुहल्ले के 40-50 मुसलमानों को कथित तौर पर अपने साथ ले गए थे. जवानों ने उन्हें जांच अभियान के बाद पकड़ा था.

इस मामले में अभियोग पत्र ग़ाज़ियाबाद के चीफ़ ज्युडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने 1996 में पेश किया गया था.

सुप्रीम कोर्ट ने मारे गए लोगों को रिश्तेदारों की अर्ज़ी पर 2002 में यह मामला दिल्ली ट्रांसफर कर दिया था.

हाशिमपुरा में बचने वाले ज़ुल्फिकार ने इस फ़ैसले के बाद बताया- हमने बहुत मेहनत से सबूत इकट्ठे किए थे, तब जाकर कोर्ट ने हमारे हक में फ़ैसला सुनाया.

ज़ुल्फिकार कहते हैं, ''1987 के उस दिन की दहशत आज भी उनके अंदर भरी हुई है. मगर आज हाशिमपुरा में सब खुशी मना रहे हैं. पहले जब कोर्ट ने पीएसी के जवानों को बरी किया था, हाशिमपुरा में लोगों के घरों में चूल्हे नहीं जले थे. ख़ाना नहीं बना था. लेकिन आज हर किसी के चेहरे पर खुशी है.''

वृंदा ग्रोवर ने कोर्ट के फ़ैसले के बाद कहा, ''पीएसी के वकीलों की तरफ से ये दलील दी जा रही थी कि उनके पक्ष के लोग मौजूद नहीं थे. मगर हमने पीएसी के कागज़ों को ही पेश किया और इंसाफ पाया. पीएसी के जवान जब कहीं जाते हैं तो जिस डायरी में उनके कहीं जाने को दर्ज़ किया जाता है, हमने उसे ही पेश किया. हम शुरू से ही कह रहे थे कि इसमें सांठगांठ है. मगर अब सच सामने आ गया है. दोषी जवानों को 22 नवंबर तक सरेंडर करना होगा. किसी एक समुदाय पर हमला करने की ऐसी हरकतें अब आम हो चली हैं.''

ज़ुल्फिकार की ज़बानी- क्या हुआ था हाशिमपुरा में?

''22 मई 1987 का दिन था. पीएसी के लोगों ने हमारे मोहल्ले में छानबीन की थी. जांच के बहाने इन लोगों ने गिरफ्तारी की गई. ये क़रीब पांच-छह ट्रक में लोगों को भरकर जेल ले गए. एक ट्रक में लोगों को भरकर पीएसी के जवान गंगनगर लेकर गए थे. इस ट्रक में मैं भी था. वहां ले जाकर इन जवानों ने लोगों को अपनी गोलियों से भूनना शुरू कर दिया. मुझे भी गोली लगी थी. हम पांच लोग बचे थे उस गोलीबारी में. बाकी लोगों को जवानों ने मार दिया था.

मुझे गोली दाईं बाजू में लगी थी. वहां अंधेरा था, जिस वजह से उन्हें पता नहीं चला कि गोली कहां लगी है. मुझे गोली मारकर नहर में फेंक दिया था. मैं झाड़ियों के क़रीब में गिरा. मैं छिपकर बैठ गया. जब ये लोग मार-काट करके चले गए, मैं तब वहां से निकला. मैं वहां अकेला था, ऊपर आया तो मेरे साथ के कुछ लोग घायल मिले. मेरे पड़ोसी कमरुद्दीन को मैं पुल तक लाया. उसके तीन गोलियां लगी हुईं थीं. वो बच नहीं पाया.

जब ये जवान हम पर गोलियां चला रहे थे, तब वो कुछ नहीं बोल रहे थे. मगर जिन लोगों को पीएसी ट्रकों में डालकर जेल लेकर गई थी. वो बताते थे कि उन्हें खूब ग़ालियां दी जाती थीं. बोलते थे बुलाओ अपने शहाबुद्दीन को. ये ले इमरान ख़ान का छक्का.बुलाओ अब्दुल्ला बुखारी को. जेल में इन लोगों की खूब पिटाई भी की जाती थी.

उस हादसे के बाद मैं महीनों दहशत में रहा. शुरू में तो पीएसी को देखकर ही घबरा जाता था. पुलिसवाले या पीएसी के सामने भी नहीं आता था. अगर सामने से कोई आता तो छिपकर निकल जाता. मेरे साथ छह महीने पुलिस सुरक्षा भी रही. कई साल दहशत में बीते.''

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