वो 6 वजहें जिनसे RBI और सरकार हैं आमने-सामने

  • टीम बीबीसी हिन्दी
  • नई दिल्ली
वित्त मंत्री अरुण जेटली और उर्जित आर पटेल

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सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के बीच टकराव की ख़बरें लगातार बढ़ती जा रही हैं. भारत के केंद्रीय बैंक और सरकार के बीच तनाव का ये माहौल ऐसे समय में बना है जब भारतीय अर्थव्यवस्था पटरी पर आने के लिए संघर्ष कर रही है.

पिछले हफ़्ते दिए एक हैरान करने वाले भाषण में आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने चेतावनी दी थी कि यदि हालात ठीक नहीं किए गए तो देश में आर्थिक संकट आ सकता है.

बुधवार को आई ख़बरों के मुताबिक आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल इस्तीफ़ा देने तक का मन बना चुके हैं. हालांकि इन ख़बरों की अधिकारिक रूप से पुष्टि नहीं की जा सकी है.

क्या ये सब अचानक हुआ है या हालात बिगड़ते जा रहे थे. साल 2018 में अर्थव्यवस्था से जुड़े कई घटनाक्रम ऐसे हुए हैं जिनसे मौजूदा हालात की पृष्ठभूमि तैयार हुई है.

एक नज़र ऐसे ही मुद्दों पर जो मौजूदा तनाव की वजह बने.

ब्याज़ दरें

कहा जा रहा है कि सरकार आरबीआई के ब्याज़ दरों में कटौती न करने से नाख़ुश थी. आरबीआई ने दरें कम करने के बजाय बढ़ा दीं.

भारतीय रिज़र्व बैंक इसे अपना सर्वाधिकार मानता है. इसके बाद सरकार और आरबीआई के बीच अधिकारों को लेकर कई बार तकरार हुई.

डूबा हुआ क़र्ज़ यानी एनपीए

फ़रवरी में आरबीआई ने एक सर्कुलर जारी कर एनपीए (डूबे हुए क़र्ज़) को परिभाषित किया और क़र्ज़ देने की शर्तें भी फिर से तय कीं.

ये तकरार का एक और कारण बना. सरकार ने आरबीआई के इस रुख़ को बैंकों के प्रति बेहद कड़ा माना. इस सर्कुलर की वजह से दो सरकारी बैंकों को छोड़कर सभी सरकारी बैंक की क़र्ज़ देने की क्षमता सवालों के घेरे में आ गई.

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आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता पर संकट की आशंका जताई है

नीरव मोदी 'घोटाला'

जब नीरव मोदी घोटाले से जुड़ी जानकारियां और ख़बरें आईं तो उसी समय सरकार ने आरबीआई की निगरानी से जुड़ी नीतियों पर सवाल उठाए.

इसी समय आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल ने सरकारी बैंकों पर निगरानी रखने के लिए और अधिक अधिकार मांगे ताकि उन्हें निजी बैंकों को समकक्ष लाया जा सके.

ग़ैर बैकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफ़सी)

आईएल एंड एफ़एस ( इंफ्रास्ट्रक्चर लीसिंग एंड फ़ाइनेंशियल सर्विसेज़) के अपना क़र्ज़ चुकाने में नाकाम रहने के बाद सरकार ने आरबीआई से वित्तीय संकट से जूझ रही ग़ैर बैकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफ़सी) को राहत देने के लिए कहा था. आरबीआई ने इस दिशा में कोई क़दम नहीं उठाया.

नाचिकेत मोर को हटाना

रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के बोर्ड सदस्य नाचिकेत मोर को कार्यकाल समाप्त होने से दो साल पहले ही पद से हटा दिया गया.

मोर को इस बारे में औपचारिक जानकारी भी नहीं दी गई. मोर ने कई मुद्दों पर सरकार का खुला विरोध किया था. इसे ही उन्हें पद से हटाए जाने की वजह माना गया. केंद्रीय बैंक के उच्च अधिकारी इससे सकते में आ गए.

पेमेंट्स नियामक

सरकार के पेमेंट्स के लिए अलग से नियामक स्थापित करने के फ़ैसले का आरबीआई ने ख़ुला विरोध किया.

आरबीआई ने अपनी वेबसाइट पर एक नोट जारी कर इसका विरोध दर्ज करवाया. हालांकि सरकार ने कहा था कि वो आरबीआई के क्षेत्राधिकार में दख़ल नहीं दे रही है.

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