मोदी सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक के बीच तकरार की वजह क्या

  • 1 नवंबर 2018
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बुधवार को जारी हुए सरकारी बयान के बाद भी इस बात को लेकर संशय बरक़रार रहा कि सरकार ने उस क़ानून को लागू किया है या नहीं जिसके तहत उसके पास भारत के केंद्रीय बैंक को निर्देश जारी करने का अधिकार है.

हाल के दिनों में नरेंद्र मोदी सरकार और रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के बीच मनमुटाव की वजहों में ये क़ानून सबसे ताज़ा वजह बताई जा रही है.

हालांकि गवर्नर उर्जित पटेल ने बोर्ड के चार दूसरे सदस्यों के साथ वित्त मंत्री अरुण जेटली से मंगलवार को ही दिल्ली में मुलाक़ात की थी, मगर फिर ख़बरें आने लगीं कि सरकार ने आरबीआई ऐक्ट के सेक्शन-7 के भीतर अपने विशेषाधिकार को लागू कर दिया है जिसे केंद्रीय बैंक अपनी स्वायत्तता में हस्तक्षेप के तौर पर देख रहा है और उर्जित पटेल विरोध स्वरूप इस्तीफ़ा दे सकते हैं.

वित्त मंत्रालय और आरबीआई, दोनों ने इन ख़बरों की पुष्टि नहीं की है.

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वित्त मंत्रालय का बयान

हालांकि बुधवार को दोपहर बाद वित्त मंत्रालय की तरफ़ से एक बयान आया जिसमें कहा गया कि केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता आरबीआई ऐक्ट के भीतर एक अनिवार्य और स्वीकार्य व्यवस्था है.

बयान में ये भी कहा गया है कि "अपने काम को अंज़ाम देते वक़्त दोनों, सरकार और केंद्रीय बैंक को, जनहित और भारतीय अर्थव्यवस्था की ज़रूरतों का ध्यान रखना ज़रूरी है."

वित्त मंत्रालय के बयान को जहाँ वित्तीय जगत के अख़बार इकोनॉमिक टाइम्स ने सरकार के रुख़ में नरमी के तौर पर देखा. वहीं आरबीआई कर्मचारी संघ का कहना था कि "ऐसा नहीं है कि आरबीआई ने पहले जनहित का ध्यान नहीं रखा है."

मनमोहन सिंह सरकार में वित्त मंत्री रह चुके पी चिदंबरम ने फ़ौरन ट्वीट कर कहा कि "सरकार के उस बयान पर ध्यान दें जिसमें आरबीआई से 'सलाह-मशविरे' की बात कही गई है. अगर यही सच है तो फिर बयान जारी करने की क्या ज़रूरत थी?"

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विचार-विमर्श जारी?

वित्त मंत्रालय के बयान में कहा गया है कि जनहित और अर्थव्यवस्था की बेहतरी के लिए सरकार और आरबीआई के बीच समय-समय पर विचार-विमर्श जारी रहता है.

केंद्रीय बैंक कर्मचारी संघ के जनरल सेक्रेटरी समीर घोष ने बीबीसी से कहा, "सेक्शन-7 जहाँ सरकार को निर्देश जारी करने का अधिकार देती है, वहीं एक शर्त ये भी है कि वो ऐसा गवर्नर के परामर्श से ही करेगी."

आरबीआई ऐक्ट के सेक्शन-7 (1) के अनुसार, "केंद्र सरकार समय-समय पर, बैंक के गवर्नर से परामर्श के बाद, वैसे निर्देश जारी कर सकती है जो कि जनहित में हों."

समीर घोष कहते हैं, "चूंकि ये सेक्शन आरबीआई के 83 साल के इतिहास में पहले लागू नहीं हुआ इसलिए पूरा मामला इस बात पर निर्भर करेगा कि गवर्नर से परामर्श वाली शर्त का मतलब क्या लगाया जाता है. क्या इसका अर्थ होगा- सरकार फ़ैसला लेकर गवर्नर को महज़ इसका निर्देश जारी कर देगी या वो ऐसा कोई भी फ़ैसला गवर्नर के सलाह-मशविरे से तय करेगी."

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Image caption आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता पर संकट की आशंका जताई है

रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया की स्थापना साल 1935 में आरबीआई ऐक्ट, 1934 के प्रावधान के तहत हुई थी.

साल 1937 में मुंबई में इसका मुख्यालय बनने से पहले तक ये कोलकाता में हुआ करता था.

केंद्रीय बैंक के टॉप पर एक बोर्ड होता है जिसमें गवर्नर के अलावा 18 और सदस्य होते हैं.

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तात्कालिक और दीर्घकालिक लक्ष्य का मतभेद

पिछले दिनों आरबीआई राजनीतिक हल्क़ों से लेकर सोशल मीडिया तक ट्रेंड करता रहा है.

नीरव मोदी और गीतांजलि जेम्स जैसे एक से बढ़कर एक बड़े वित्तीय गबन के मामलों की वजह से मोदी सरकार पर बन रहे दबाव की आजकल चर्चा हो रही है.

वित्तीय मामलों की ऑनलाइन पत्रिका मनी लाइफ़ इंडिया की मैनेजिंग एडिटर सुचेता दलाल कहती हैं, "आरबीआई पर कई मामलों में लगाम लगाने की ज़रूरत है."

लेकिन साथ उनका ये भी मानना है कि इस सरकार के नोटबंदी जैसे कई 'ग़लत फ़ैसलों' की वजह से केंद्रीय बैंक उनमें उलझकर रह गया और अब सरकार अर्थव्यवस्था की पतली हालत का ठीकरा आरबीआई के सिर फोड़ना चाहती है.

नोटबंदी के बाद बने हालात को सामान्य करने में आरबीआई को लगभग दो साल का समय लगा.

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अर्थव्यवस्था की हालत

बैंक पहले जन-धन योजना में लगे रहे, फिर वो आधार मामलों में उलझे रहे और फिर जीएसटी ने बैंको का लंबा वक़्त खा लिया. इन सब के बीच बैंक इनके अलावा दूसरे कामों पर ध्यान ही नहीं लगा पाए.

इस दौरान एक समय 10 बैंक ऐसे थे जिनके शीर्ष पद ख़ाली रहे और जिस व्यक्ति के पास प्रभार था, वो बड़े फ़ैसलों को लेकर झिझकता रहा.

सरकार अब जागी है जब अर्थव्यवस्था की हालत बद से बदतर होती जा रही है.

सुचेता दलाल कहती हैं कि ये सरकार भी औरों की तरह किसी तरह के दीर्घकालिक सुधार को लेकर सीरियस नहीं है और बहुत सारी बातें जो दिख रही हैं वो चुनाव का दबाव है.

केंद्रीय बैंक और सरकार के बीच जो मतभेद पिछले क़रीब साल भर से धीरे-धीरे बढ़ते जा रहे थे. लेकिन जब सरकार ने हिंदुत्व विचारधारा से ताल्लुक़ रखनेवाले दो लोगों- एस गुरुमूर्ति और सतीश मराठे को आरबीआई बोर्ड में मनोनीत किया, तो ये मतभेद अगस्त 2018 से कुछ अधिक छनकर सामने आने लगे.

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बैंकिग सेक्टर में चर्चा रही है कि मनोनीत सदस्य बोर्ड पर कई तरह के दबाव बनाने की कोशिश करते रहे हैं.

एस गुरुमूर्ति स्वदेशी जागरण मंच के संयोजक रह चुके हैं. मराठे का संबंध अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से रहा है.

कहा जाता है कि केंद्रीय बैंक के बोर्ड में सामान्यत: राजनीति से सीधे तौर पर ताल्लुक़ रखनेवाले लोगों को इससे पहले नहीं चुना गया था.

इन नियुक्तियों के समय वित्तमंत्री अरुण जेटली की ग़ैर-मौजूदगी में उनका कामकाज पीयूष गोयल देख रहे थे.

हालांकि एस गुरुमुर्ति ने कहा है कि सरकार की तरफ़ से आरबीआई पर किसी तरह का दबाव नहीं है.

उन्होंने ये बयान उस ख़बर के जवाब में दिया था जिसमें कहा गया था कि वो और कुछ और मनोनीत सदस्य बोर्ड पर छोटे और मध्यम उद्योग धंधों को क़र्ज़ देने और कुछ बैंको पर कर्ज़ देने को लेकर लगाई गई शर्तों में ढिलाई देने की माँग को लेकर बराबर दबाव बना रहे थे.

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उर्जित पटेल क्यों हुए नाराज़

आरबीआई ने 12 ख़स्ताहाल बैंकों द्वारा उद्योग-धंधों को कर्ज़ देने के नियमों को कड़ा कर दिया है.

बैंक के मुताबिक़ भारतीय बैंकों के पास 150 अरब डॉलर का बुरा कर्ज़ या एनपीए है और वो अगर बिना कड़ी देखरेख के कर्ज़ देंगे तो उनकी हालत और ख़राब हो जाएगी.

दूसरी तरफ़ बैंकों पर कड़े किए गए नियमों की वजह से उद्योग-धंधों को क़र्ज मिलने में दिक्क़त हो रही है जिसका असर अर्थव्यवस्था और अंतत: रोज़गार पर पड़ रहा है.

चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी द्वारा हर साल 10 लाख सालाना नए रोज़गार पैदा करने का वायदा अब आम लोगों और विपक्षी दलों के बीच मज़ाक़ बनकर रह गया है.

लेकिन फिलहाल जब चार राज्यों में विधानसभा और अगले साल लोकसभा चुनाव होने वाले हैं तो सरकार भारी दबाव में है और इस जल्दी में उस व्यक्ति, उर्जित पटेल तक को नाराज़ कर दिया है.

उर्जित पटेल को जब सितंबर 2016 में गवर्नर बनाया गया था तो कहा जा रहा था कि वो मोदी के क़रीबी हैं और शायद इसीलिए वो नोटबंदी के वक़्त भी ख़ामोश रहे थे.

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पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने साफ़तौर पर कहा था कि वो नोटबंदी के ख़िलाफ़ थे और कम से कम उसे उस तरह से लागू नहीं करते जैसा कि किया गया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नवंबर 2016 को अचानक से ये ऐलान कर दिया था कि 500 और 1000 के नोट आधी रात के बाद चलन से बाहर हो जाएंगे.

इस फ़ैसले का अर्थव्यवस्था, ख़ासतौर पर छोटे उद्योग-धंधों पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ा और जिसकी निंदा आईएमएफ़ तक ने की है.

26 अक्टूबर को मुंबई में दिए गए एक भाषण में केंद्रीय बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आयार्य ने कहा कि जो हुकूमतें केंद्रीय बैंको की स्वतंत्रता का सम्मान नहीं करतीं वहाँ की अर्थव्यवस्था को विकट स्थितियों का सामना करना पड़ता है.

अपने भाषण में उन्होंने अर्जेंटिना का भी ज़िक्र किया.

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उन्होंने कहा था, "अर्जेंटिना की हुकूमत ने वहाँ के केंद्रीय बैंक के कामकाज में बेजा दख़ल किया था और उसपर कुछ फ़ैसले लेने का दबाव बनाया था जिसका असर वहाँ की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा पड़ा."

समझा जाता है कि आचार्य के इस भाषण को उनके बॉस, रिज़र्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल की हामी थी.

'द वायर' के संस्थापक संपादक और वित्तीय मामलों के जानकार एमके वेणु कहते हैं कि सरकार ने आरबीआई के रिज़र्व फंड पर हाथ डालने की कोशिश की है जिसके बाद पूरा मामला खुलकर सामने आ गया.

आरबीआई के पूर्व डिप्टी गवर्नर राकेश मोहन ने अपने हाल के एक लेख में इसका ज़िक्र किया था.

सीबीआई, सीवीसी, ईडी के लगातार चल रहे विवादों के बीच आरबीआई का मामला मोदी सरकार के लिए इससे बुरे वक़्त में नहीं शुरु हो सकता था.

इसपर कांग्रेस भी मोदी सरकार की चुटकी लेने से बाज़ नहीं आ रही जिसके वक़्त में कहा जाता है बैंको के बुरे क़र्ज़ यानी एनपीए में भारी बढ़ोतरी हुई थी.

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इस बीच तमाम विवादों को लेकर कांग्रेस पार्टी केंद्र सरकार पर हमलावर है. पार्टी नेता मनीष तिवारी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेस के दौरान कहा:

"लगता है मुल्क में सरकार है?

सरकार के अंदर सिविल वॉर है

जनता पर तेल की मार है

लोगों का हाल बेहाल है

संस्थाओं पर प्रहार है"

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