तो दिल्ली के 500 करोड़ रुपये के पटाखों का क्या होगा?

  • 1 नवंबर 2018
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'अरे वो देख... आसमान में छतरी वाला रॉकेट. तेरे भाई की शादी होगी न... तो यही वाला रॉकेट जलाएंगे.'

दिवाली की रात आसमान को देखकर ऐसे सपने पालने वाले लोगों को अब कवि की कल्पना के भरोसे रहना होगा. सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के मुताबिक़, दिल्ली-एनसीआर में सिर्फ़ ग्रीन पटाखे ही बेचे जा सकेंगे. हालांकि देश के दूसरे हिस्सों में पहले से बने गैर-ग्रीन पटाखे इस साल बेचे जा सकेंगे.

मगर जिन ग्रीन पटाखों को बेचने या जलाने की इजाज़त दी गई है, वो बाज़ार में उपलब्ध ही नहीं हैं. बाज़ार की इस हक़ीक़त से पटाखा कारोबारी और आम लोग भी निराश हैं.

सुप्रीम कोर्ट में इस केस को लड़ने वाली वकील पूजा धर ने बीबीसी हिंदी से बात की.

पूजा धर कहती हैं, ''पटाखा उत्पादकों और हमने कोर्ट में याचिका दायर की थी. पटाखा उत्पादकों ने ये माना था कि दो या तीन ही उत्पाद हैं जो ग्रीन पटाखे की कैटेगिरी में आते हैं. क़रीब 60 फ़ीसदी पटाखों में बेरियम सॉल्ट होता है, जो पूरी तरह बैन है. दिल्ली में बस इन्हीं दो या तीन ग्रीन पटाखों की किस्मों को बेचा जा सकेगा. बाकी जगहों पर आप नॉन बेरिएम पटाखे बेच सकते हैं. लेकिन स्टॉक में 60 फ़ीसदी बेरियम पटाखे हैं तो वो नहीं बेचे जा सकेंग. इस साल के लिए बाकी शहरों में 40 फ़ीसदी बेरियम के पटाखों को बेचने की छूट दी गई है.''

कॉन्फ़ेडरेशन ऑफ़ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT ) के प्रवीण खंडेलवाल ने एक बयान में कहा, ''दिल्ली-एनसीआर में 500 करोड़ रुपये के पटाखों का स्टॉक मौजूद है. कोर्ट के आदेश से ये पटाखे रद्दी की टोकरी में चले जाएंगे. कारोबारियों का काफ़ी नुकसान होगा.''

पटाखों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का इस साल पहला फ़ैसला 23 अक्टूबर को आया था. ये फ़ैसला तीन बच्चों की तरफ़ से कोर्ट में दायर याचिका में सुनाया गया था. फ़ैसले को लेकर केस के दोनों तरफ के पक्ष दोबारा कोर्ट गए, लेकिन कोर्ट ने ग्रीन पटाखों के इस्तेमाल और वक़्त की सीमा को लेकर अपने फ़ैसले को और स्पष्टीकरण के साथ दोहराया.

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सुप्रीम कोर्ट के आदेश की ख़ास बातें

संभव है कि सभी लोग ग्रीन पटाखे क्या होते क्या हैं, यही न जानते हों.

दरअसल ग्रीन पटाखे सामान्य पटाखों की तरह ही दिखते, जलते और आवाज़ करते हैं. बस इनसे प्रदूषण कम होता है.

लेकिन इनके जलाने से प्रदूषण क़रीब 40 से 50 फ़ीसदी कम होता है. पूजा धर कोर्ट के फ़ैसले की ख़ास बातें बताती हैं,

  • अब किसी भी ऐसे पटाखे का निर्माण नहीं होगा, जो ग्रीन नहीं हैं
  • बेरियम युक्त पटाखे भी नहीं बेचे जा सकेंगे
  • दक्षिण भारत में सुबह 4 से 5 और रात को 8 से 9 का समय दिया गया है
  • दो घंटे से ज़्यादा कहीं भी नहीं जलाए पाएंगे पटाखे
  • राज्य इस बारे में जारी कर सकते हैं नोटिफ़िकेशन
  • गुरु परब के लिए भी सुबह चार से पांच का दिया गया वक़्त

पूजा धर कहती हैं, ''ये पटाखे सिर्फ़ वही बेच पाएंगे जिनके पास लाइसेंस है. अगर कोई नियमों का पालन नहीं कर रहा है तो पुलिस को एक्शन लेना होगा. इसकी ज़िम्मेदारी एसएचओ को दी गई है.''

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Image caption डॉक्टर स्मार्ट घोष सुपर ग्रीन पटाखे के साथ

लेकिन ऐसा नहीं है कि पटाखों के शौक के लिए ग्रीन पटाखों के भरोसे ही रहा जा सकता है. पंजाब के कुछ वैज्ञानिक सुपर ग्रीन पटाखे बनाने का दावा करते हैं.

पंजाब के मोहाली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च के वैज्ञानिकों ने ग्रीन पटाखों को लेकर रिसर्च की है.

ग्रीन पटाखों के बारे में बीबीसी से डॉक्टर सम्राट घोष ने कहा, ''हमने कुछ पटाखे बनाए हैं जो सुपर ग्रीन पटाखे हैं. हमारे पटाखे इको फ्रेंडली है. इन पटाखों को बनाने की प्रक्रिया भी वातावरण को नुकसान नहीं पहुंचाती है. कई बार पटाखे ग्रीन तो बनाए जाते हैं, लेकिन उन्हें बनाने में भी एक तरह का प्रदूषण होता है.''

हालांकि ये पटाखे अभी बाज़ार में उपलब्ध नहीं हैं.

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कोर्ट के फ़ैसले का बाज़ार और लोगों पर असर?

दिल्ली के चांदनी चौक समेत कई अहम इलाकों में पटाखे बेचने वाली दुकानों पर ताला लग गया है.

दिवाली जैसे त्योहारों से पहले कारोबारी महीनों पहले ही पटाखों का स्टॉक कर लेते हैं.

खंडेलवाल के मुताबिक़, ''पर्यावरण की चिंता जायज़ है, लेकिन ग्रीन पटाखे एकदम नया विचार हैं. इसकी परिभाषा भी लोगों को नहीं मालूम है. बाज़ार में ये बिल्कुल उपलब्ध नहीं हैं. लेकिन पुराने पटाखे भरे हुए हैं. लाखों लोगों की रोज़ी रोटी इन पटाखों से चल रही है. ग्रीन पटाखों के लिए वक़्त दिए जाने की ज़रूरत थी.''

बीबीसी ने दिल्ली में पटाखा बेचने वाले दुकानदारों से बात की.

एक पटाखा कारोबारी ने कहा, ''इस फ़ैसले का बुरा असर पड़ रहा है. किसी को मालूम नहीं है कि ग्रीन पटाखे क्या होते हैं. पूरा माल ख़राब हो गया है.''

विनय की भी दिल्ली के चांदनी चौक में पटाखे की दुकान है. वो कहते हैं, ''पटाखे बैन करने हैं या नहीं, कोर्ट को ये फ़ैसला पहले करना चाहिए था. अब हमारा सारा माल भरा हुआ है. उसका क्या करें, ग्रीन पटाखों की परिभाषा तक लोगों को नहीं मालूम. पटाखे सिर्फ एक दिन दिवाली पर जलाए जाते हैं. प्रदूषण सारे साल होता है.''

एक पटाखे के दुकानदार ने सरकार से नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए कहा, ''हिंदुओं का त्योहार ख़राब कर रही है सरकार.''

कुछ लोग पटाखों को लेकर कोर्ट के फ़ैसले का स्वागत करते हैं. उनके मुताबिक़, पटाखों से हुए प्रदूषण से पशुओं को भी दिक्कत होती है और बच्चों को भी.

हालांकि जब हमने लोगों से पूछा तो ज़्यादातर लोग ग्रीन पटाखों के बारे में नहीं जानते हैं.

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ग्रीन पटाखों की ख़ास बातें

'ग्रीन पटाखे' राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) की खोज हैं.

नीरी ने ग्रीन पटाखों पर जनवरी में केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन के उस बयान के बाद शोध शुरू किया था जिसमें उन्होंने इसकी ज़रूरत की बात कही थी.

नीरी के चीफ़ साइंटिस्ट डॉक्टर साधना रायलू ने बीबीसी से कहा था, "इनसे जो हानिकारक गैसें निकलेंगी, वो कम निकलेंगी. 40 से 50 फ़ीसदी तक कम. ऐसा भी नहीं है कि इससे प्रदूषण बिल्कुल भी नहीं होगा. पर हां ये कम हानिकारक पटाखे होंगे."

डॉक्टर साधना ने बताया था, ''सामान्य पटाखों के जलाने से भारी मात्रा में नाइट्रोजन और सल्फ़र गैस निकलती है, लेकिन उनके शोध का लक्ष्य इनकी मात्रा को कम करना था.''

ग्रीन पटाखों में इस्तेमाल होने वाले मसाले बहुत हद तक सामान्य पटाखों से अलग होते हैं. नीरी ने कुछ ऐसे फ़ॉर्मूले बनाए हैं जो हानिकारक गैस कम पैदा करेंगे.

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कैसे-कैसे ग्रीन पटाखे?

डॉक्टर साधना ने बताया था कि उनके संस्थान ने ऐसे फॉर्मूले तैयार किए हैं जिनके जलने के बाद पानी बनेगा और हानिकारक गैस उसमें घुल जाएगी.

इन ग्रीन पटाखों की बेहद ख़ास बात है जो सामान्य पटाखों से उन्हें अलग करती है. नीरी ने चार तरह के ग्रीन पटाखे बनाए हैं.

पानी पैदा करने वाले पटाखेः ये पटाखे जलने के बाद पानी के कण पैदा करेंगे जिसमें सल्फ़र और नाइट्रोजन के कण घुल जाएंगे. नीरी ने इन्हें सेफ़ वाटर रिलीज़र का नाम दिया है. पानी प्रदूषण को कम करने का बेहतर तरीका माना जाता है. पिछले साल दिल्ली के कई इलाक़ों में प्रदूषण का स्तर बढ़ने पर पानी के छिड़काव की बात कही जा रही थी.

सल्फ़र और नाइट्रोजन कम पैदा करने वाले पटाखेः नीरी ने इन पटाखों को STAR क्रैकर का नाम दिया है, यानी सेफ़ थर्माइट क्रैकर. इनमें ऑक्सीडाइज़िंग एजेंट का उपयोग होता है जिससे जलने के बाद सल्फ़र और नाइट्रोजन कम मात्रा में पैदा होते हैं. इसके लिए ख़ास तरह के केमिकल का इस्तेमाल होता है.

कम एल्यूमीनियम का इस्तेमालः इस पटाखे में सामान्य पटाखों की तुलना में 50 से 60 फ़ीसदी तक कम एल्यूमीनियम का इस्तेमाल होता है. इसे संस्थान ने सेफ़ मिनिमल एल्यूमीनियम यानी SAFAL का नाम दिया है.

अरोमा क्रैकर्सः इन पटाखों को जलाने से न सिर्फ़ हानिकारक गैस कम पैदा होगी बल्कि ये बेहतर खुशबू भी बिखेरेंगे.

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