छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावः राज परिवारों का सत्ता पर कितना दखल

  • 4 नवंबर 2018
छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव 2018, छत्तीसगढ़, विधानसभा चुनाव 2018, सरगुजा स्टेट, महाराजा रामानुज शरण सिंहदेव इमेज कॉपीरइट Facebook
Image caption सरगुजा स्टेट के महाराजा रामानुज शरण सिंहदेव

अभी पखवाड़े भर पहले छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में एक 'राज दरबार' सजा था. दरबार में हज़ारों की संख्या में एक-एक कर लोग आ रहे थे और भेंट देकर जा रहे थे.

इस राज सिंहासन पर बैठे थे छत्तीसगढ़ विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव.

असल में सिंहदेव उस राज परिवार के मुखिया हैं जिसका साम्राज्य सरगुजा के इलाके में फैला हुआ था.

देश आज़ाद हुआ, रियासतों और ज़मींदारियों का भारत में विलय हुआ और राजा-रजवाड़ों के दिन ख़त्म हो गए. बची रह गईं पुरानी परंपराएं, जिनमें से कुछ अब तक कायम हैं. जिसे साल दो साल में कभी-कभार निभाया जाता है.

सिंहदेव कहते हैं, "प्राचीन परंपरा रही है जिसमें आम जनता से मिलना-जुलना होता है. इसमें पुराने दिनों जैसी कोई बात नहीं है."

टीएस सिंहदेव पिछले दस सालों से विधायक हैं और अब तीसरी बार विधानसभा चुनाव के लिए मैदान में हैं. छत्तीसगढ़ में पार्टी के अध्यक्ष भूपेश बघेल के अलावा जिन्हें मुख्यमंत्री पद का दावेदार माना जा रहा है, उनमें टीएस सिंहदेव भी शामिल हैं.

यह कहना ठीक होगा कि राज सिंहासन भले चला गया हो, लेकिन सत्ता को बरकरार रखने की कोशिश अब भी जारी है. सिंहदेव अब किसी भी दूसरे प्रत्याशी की तरह अंबिकापुर की गलियों में लोगों से मिल रहे हैं, उनसे राज्य में कांग्रेस की सरकार बनाने की अपील कर रहे हैं.

इमेज कॉपीरइट Facebook
Image caption बस्तर राजघराने के 22वें राजा हैं कमलचंद भंजदेव

रियासत की सियासत

आज़ादी के बाद भारत में राजा-महाराजा और ज़मींदारों के दिन भले लद गए हों, लेकिन छत्तीसगढ़ में अब भी सियासत की राजनीति इन रियासतों के आसपास ही घूमती है.

सरगुजा से लेकर बस्तर तक राजा-महाराजा आज भी राजनीति के केंद्र में बने हुए हैं.

आज़ाद भारत की चुनावी तस्वीर देखें तो पता चलता है कि छत्तीसगढ़ के कुछ एक राजाओं को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश राजा-महाराजाओं ने कांग्रेस पार्टी का ही हाथ थामा.

मध्यप्रांत की विधानसभा में पहली बार जो लोग चुन कर पहुंचे थे, उनमें बड़ी संख्या राजाओं की थी. बाद के दिनों में जनतंत्र की तरह ही लोकतंत्र में भी रियासतों का परिवारवाद विस्तार पाता चला गया.

राजनीतिक मामलों के जानकार डॉक्टर विक्रम सिंघल कहते हैं, "महज़ राज परिवार का होने के कारण राजनीति में भी किसी को खास महत्व मिला हो, ऐसा नहीं है. छत्तीसगढ़ में अधिकांश रियासत के शासकों ने अपनी मेहनत के बल-बूते राजनीति में जगह बनाई. हां, जनता में उसका प्रभाव तो था ही."

असल में छत्तीसगढ़ में आज़ादी के समय 14 रियासतें थीं और इसी तर्ज़ पर कई ज़मींदारियां. सिंहासन जाने के फ़ौरन बाद अधिकांश रियासतों के उत्तराधिकारियों ने अपना रुख राजनीति की ओर किया और वे इस क्षेत्र में भी सफल हुए.

इमेज कॉपीरइट Facebook
Image caption सरगुजा के राजघराने से ताल्लुक़ रखने वाले त्रिभुवनेश्वर सिंह देव

विधायक और फिर मुख्यमंत्री

सारंगढ़ को ही लें. 1952 में हुए पहले चुनाव में सारंगढ़ के राजा नरेशचंद्र सिंह पहली बार विधायक बने और तीन बार की विधायकी के दौरान उन्हें एक बार 3 से 25 मार्च 1969 तक 13 दिनों के लिए अविभाजित मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनने का अवसर भी मिला.

राजा नरेशचंद्र की पत्नी रानी ललिता देवी 1968 के उपचुनाव में पुसौर से विधायक चुनी गई थीं. मध्यप्रदेश में निर्विरोध चुन कर जाने वाली संभवतः वे अकेली महिला रही हैं.

बाद में इस परिवार की बेटियों ने राजनीति का रुख किया. कमला देवी, रजनीगंधा और पुष्पा देवी सिंह ने चुनाव लड़ा और विधायक और सांसद बनीं.

छत्तीसगढ़ में नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव के पिता एमएस सिंहदेव अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव रहने के बाद योजना आयोग के उपाध्यक्ष भी रहे. इसी तरह देवेंद्र कुमारी सिंहदेव विधायक और सिंचाई मंत्री बनीं. बाद के सालों में अंबिकापुर की सीट आरक्षित हो गई तो राज परिवार चुनावी राजनीति से अलग हो गया.

लेकिन 2008 में जब यह सीट फिर से सामान्य हुई तो टीएस सिंहदेव मैदान में उतरे. टीएस सिंहदेव ने भाजपा के अनुराग सिंहदेव को 980 वोटों से हराया और 2013 के चुनाव में फिर से उन्होंने अनुराग सिंहदेव को 19,558 वोटों से मात दी.

सिंहदेव को इस जीत के बाद विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया गया. इस साल होने वाले चुनाव में टीएस सिंहदेव का मुकाबला, फिर से अनुराग सिंहदेव से ही है.

सरगुजा के ही राजपरिवार से जुड़े कोरिया रियासत के रामचंद्र सिंहदेव सत्ता की राजनीति से दूर सत्यजीत रे की संगत में फोटोग्राफी का काम कर रहे थे और दूसरे व्यवसाय संभाल रहे थे.

1967 में वे पहली बार चुनाव मैदान में उतरे और उन्हें 16 विभागों का मंत्री बनाया गया.

अपनी सादगी के लिए दुनिया भर में चर्चित रामचंद्र सिंहदेव छह बार चुनाव जीत कर विधायक और मंत्री बनते रहे. वे छत्तीसगढ़ के पहले वित्त मंत्री भी थे.

इसी साल जुलाई में उनका निधन हो गया जिसके बाद अब उनकी भतीजी अंबिका सिंहदेव कांग्रेस पार्टी की टिकट से विधानसभा चुनाव लड़ रही हैं.

इमेज कॉपीरइट Facebook
Image caption दिलीप सिंह जूदेव का ताल्लुक जशपुर राजघराने से था

घर वापसी के नेता जूदेव

जशपुर राजघराने के विजयभूषण सिंहदेव 1952 व 1957 में जशपुर से विधायक और 1962 में रायगढ़ से सांसद बने. बाद में इस इलाके की कमान कथित धर्मांतरण के ख़िलाफ़ घर वापसी का कार्यक्रम चलाने वाले दिलीप सिंह जूदेव ने संभाली.

जूदेव पहली बार 1988 में उस समय चर्चा में आये, जब उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के ख़िलाफ़ विधानसभा के उपचुनाव के लिए मैदान में उतारा गया. अर्जुन सिंह भले चुनाव जीत गए थे, लेकिन जिस तरह से उन्हें जूदेव ने चुनौती दी थी, उसी का परिणाम था कि हारने के बाद भी जूदेव का विजय जुलूस निकाला गया था.

जूदेव ने 1989 में जांजगीर से लोकसभा का चुनाव लड़ा और सांसद बने लेकिन 1991 में वे चुनाव हार गए. 1992 में भाजपा ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य बनाया. वे केंद्र में मंत्री बने और 2003 में छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे लेकिन कैमरे पर 'पैसा खुदा तो नहीं लेकिन खुदा से कम भी नहीं' कह कर कथित रुप से रिश्वत लेते पकड़े जाने के बाद उन्हें हाशिये पर बैठा दिया गया. 17 नवंबर 2003 को उन्हें मंत्री पद से भी इस्तीफा देना पड़ा.

2009 में वे बिलासपुर से सांसद भी चुने गए. 14 अगस्त 2013 को उनके निधन के बाद जूदेव राजपरिवार से रणविजय सिंह जूदेव को भाजपा ने राज्यसभा का सांसद बनाया, वहीं दिलीप सिंह जूदेव के बेटे युद्धवीर सिंह जूदेव चंद्रपुर से दो बार के विधायक रहे हैं.

इस बार के चुनाव में युद्धवीर सिंह जूदेव की पत्नी संयोगिता सिंह को भाजपा ने चंद्रपुर से अपना प्रत्याशी घोषित किया है.

इसी तरह खैरागढ़ के राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह पहले विधायक बने और फिर सांसद भी. रानी पद्मावती भी चुन कर विधानसभा पहुंची. परिवार के उत्तराधिकारी शिवेंद्र बहादुर सिंह लोकसभा के प्रत्याशी बने तो उनकी पत्नी गीतादेवी सिंह कई बार विधायक बनीं. परिवार की रश्मिदेवी सिंह भी राजनीति के मैदान में उतरीं.

इस परिवार के देवव्रत सिंह तीन बार विधायक और फिर सांसद चुने गए. पिछले साल कांग्रेस से इस्तीफा देने के बाद वे इस चुनाव में जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ की टिकट पर खैरागढ़ से चुनाव मैदान में हैं.

इमेज कॉपीरइट Alok Putul/BBC
Image caption कोरिया राजघराने के रामचंद्र सिंहदेव छत्तीसगढ़ के पहले वित्तमंत्री थे

राजतंत्र की जड़ें

इसी तरह बस्तर में देवताओं की तरह मान्य राजा प्रवीरचंद सिंहदेव 1957 में पहली बार विधायक बने, लेकिन पुलिस की गोली से उनकी मौत के बाद इस परिवार का राजनीति से रिश्ता टूट गया.

पिछले चुनाव के समय इस परिवार के कमल चंद भंजदेव ने भाजपा का हाथ थामा. बाद में सरकार ने उन्हें युवा आयोग का अध्यक्ष भी बनाया.

माना जा रहा था कि इस बार जगदलपुर से पार्टी उन्हें अपना उम्मीदवार बनाएगी. लेकिन पार्टी ने उन्हें विधानसभा का टिकट नहीं दिया है.

धर्मजयगढ़, कवर्धा, सक्ती, चंद्रपुर, बिलाईगढ़, सराईपाली, बसना, बिंद्रानवागढ़, छुरा और फिंगेसर जैसी रियासतों या ज़मींदारियों से भी राज परिवार के सदस्यों ने राजनीति में हाथ आजमाया और उसमें वे सफल भी रहे. लेकिन कई इलाकों में धीरे-धीरे राज परिवारों का सत्ता पर दखल कमज़ोर पड़ता गया है.

बस्तर के आदिवासी नेता और कोंटा से सीपीआई के उम्मीदवार मनीष कुंजाम का मानना है कि लोकतांत्रिक देश होने के बाद भी हमारे भीतर राजतंत्र के गुण अब तक बचे हुए हैं.

कुंजाम कहते हैं, "हमारे भीतर अभी भी सामंती संस्कार बचे हुए हैं. राजा-महाराजा की तरह होने की आकांक्षा हमारे भीतर कहीं गहरे तक बची हुई है. बड़ी-बड़ी गाड़ियों में, भीड़-भाड़ और भारी-भरकम सुरक्षा व्यवस्था के साथ चलना, यही दर्शाता है."

ये भी पढ़ें:-

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार