गांधी की कहानी लिखने वाला गांधी के गुजरात में पढ़ा क्यों नहीं सकता?

  • 4 नवंबर 2018
रामचंद्र गुहा इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption रामचंद्र गुहा

तीन साल पहले रामचंद्र गुहा ने एक इंटरव्यू में कहा था कि भारत 'पहले से कहीं ज़्यादा असहिष्णु देश' बन रहा है. रामचंद्र गुहा का नाम भारत के सबसे ज़्यादा सम्मानित इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों में गिना जाता है.

50 साल के एक मुसलमान को भीड़ ने पीट-पीटकर इसलिए मार डाला क्योंकि कथित तौर पर ऐसी अफ़वाहें थीं कि उसके परिवार ने अपने घर पर गाय का मांस रखा है. बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी ने देश के कई हिस्सों मे गोमांस पर पाबंदी लगा दी.हाल ही में देश के दो मुखर तर्कवादियों की हत्या कर दी गई.

गुहा ने अपने इंटरव्यू में कहा था, "यह समझना ज़रूरी है कि आज़ाद भारत में कभी ऐसा कोई स्वर्णिम दौर नहीं रहा जब समाज पूरी तरह सहिष्णु हो और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कोई पाबंदी न हो. हमेशा कुछ न कुछ पाबंदियां रही हैं, नेताओं और सरकारों की चुप्पियां रही ही हैं. लेकिन इतना निश्चित है कि अब हम ज़्यादा हिंसक हो रहे हैं. अब ज़्यादा हिंसा हो रही है."

इमेज कॉपीरइट Reuters

गुहा ने क्यों किया इनका?

बमुश्किल 15 दिन पहले उन्होंने एलान किया था कि वो अहमदाबाद विश्वविद्यालय में मानविकी के प्रोफ़ेसर के तौर पर काम शुरू करेंगे. जाने-माने इतिहासकार पैट्रिक फ़्रेंच (नोबेल पुरस्कार विजेता साहित्यकार वीएस नायपॉल की जीवनी लिखने वाले) भी अहमदाबाद यूनिवर्सिटी में शीर्ष पद पर काबिज हैं.

इस एलान के तक़रीबन 15 दिनों बाद बीते गुरुवार को गुहा ने ट्वीट करके बताया कि वो नया पद ग्रहण नहीं कर पाएंगे. इसके पीछे उन्होंने अपने 'नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों' को वजह बताया.

गुहा ने ट्विटर पर लिखा:

''अपने नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों की वजह से मैं अहमदाबाद यूनिवर्सिटी नहीं जाऊंगा. मैं यूनिवर्सिटी को शुभकामनाएं देता हूं. इसके पास बेहतरीन फ़ैकल्टी और शानदार वाइस चांसलर हैं. मैं दुआ करता हूं कि गांधी की आत्मा इस गुजरात में एक दिन फिर जी उठे.''

गुहा ने ये नहीं बताया कि उन्होंने अपना फ़ैसला क्यों बदला. कॉलेज प्रशासन ने अब तक पत्रकारों के सवालों का जवाब नहीं दिया है.

हैरत की बात नहीं है कि इस पूरे घटनाक्रम से कई लोगों में नाराज़गी है.

वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने ट्वीट किया, "मैं बहुत निराश हूं लेकिन मुझे आश्चर्य क्यों नहीं हो रहा है? क्या ये उसी महात्मा गांधी का गुजरात हैं जहां उनके जीवनीकार के लिए अकादमिक जगत में कोई जगह नहीं है."

एक दूसरे वरिष्ठ पत्रकार ने लिखा:

हालात ऐसे हो गए हैं कि आधुनिक भारत का एक बेहतरीन इतिहासकार अब वहां नहीं पढ़ा सकता जहां वो चाहता है.

इसके जवाब में गुहा ने लिखा:

या फिर ऐसे कहें कि गांधी का जीवनीकार गांधी के बारे में गांधी के ही शहर में नहीं पढ़ा सकता.

हिंदू दक्षिणपंथियों का विरोध?

अब ऐसा लगता है कि गुहा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृहराज्य और बीजेपी का गढ़ माने जाने वाले गुजरात में हिंदू दक्षिणपंथियों के इशारों पर परेशान किया जा रहा है.

बीजेपी की छात्र शाखा के एक नेता ने अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि वो अहमदाबाद यूनिवर्सिटी के अधिकारियों से मिले थे और उनसे कहा था कि वो नहीं चाहते कि गुहा यूनिवर्सिटी में पढ़ाएं.

उन्होंने कहा, "हमने कहा कि हम अपने शैक्षणिक संस्थानों में बुद्धिजीवियों को चाहते हैं, देशद्रोहियों को नहीं." छात्र नेता ने ये भी कहा कि उन्होंने यूनिवर्सिटी प्रशासन के सामने गुहा की किताब से 'देश विरोधी अंश' पढ़कर भी सुनाया.

इमेज कॉपीरइट MANSI THAPLIYAL

छात्र नेता की शिक़ायत में ये भी कहा गया है कि गुहा के लेखन में "अलगावादी भावनाओं को उकसाने, व्यक्तिवादी स्वतंत्रचा के नाम पर अलगाव, आतंकवादियों की आज़ादी और जम्मू-कश्मीर को भारतीय संघ से अलग करने" की बातें हैं.

छात्र नेताओं ने गुहा को 'कम्युनिस्ट' भी बताया है.

इन शिक़ायतों से ये तो बिल्कुल साफ़ है कि इन छात्रों ने गुहा की किताबें नहीं पढ़ी हैं.

गुहा बहुआयामी व्यक्तित्व वाले शख़्स हैं. उन्होंने अर्थशास्त्र की पढ़ाई की है. पारिस्थितिकी तंत्र, क्रिकेट और आज़ादी के बाद के भारत पर ऐसी किताबें लिखी हैं जिनकी ख़ूब तारीफ़ हुई है. हाल ही में उन्होंने महात्मा गांधी की असाधारण जीवनी लिखी है जो दो हिस्सों में है. उन्होंने स्टैनफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में पढ़ाया है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption गुहा ने हाल ही में गांधी की जीवनी लिखी है

भारतीय शास्त्रीय संगीत के शौक़ीन गुहा 'बीटल्स के 'हे जूड' को अपने पसंदीदा गानों में से एक बताते हैं. 'प्रॉस्पेक्ट' पत्रिका ने उन्हें दुनिया के सबसे प्रभावशाली विचारकों की सूची में शामिल किया था.

गुहा नरेंद्र मोदी, बीजेपी और दक्षिणपंथियों के हिंदू राष्ट्रवादी राजनीति के मुखर आलोचक रहे हैं. वो कांग्रेस की परिवारवाद वाली राजनीति के भी मुखर आलोचक रहे हैं. उन्हें भारतीय समाचार चैनलों पर अक्सर तमाम विषयों पर बहस और चर्चा करते देखा जा सकता है.

इससे पहले दक्षिणपंथी हिंदू समूहों ने एके रामानुजन की लिखी रामायण को दिल्ली यूनिवर्सिटी के पाठ्यक्रम से हटाने की मांग की थी.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

उन्होंने एक अख़बार को 'हिंदू आतंकवाद' पर एक लेख छापने पर क़ानूनी नोटिस भेजा था. इन्हीं समूहों ने एक प्रकाशक को मशहूर अमरीकी लेखक वेंडी डॉगिनर की किताब की प्रतियां नष्ट करने और उसे वापस लेने पर मजबूर किया था.

भारत में किसी पार्टी का रिकॉर्ड उदारवादी विचारों की रक्षा करने का नहीं रहा है, लेकिन कइयों का मानना है कि मोदी सरकार में उदारवादी मूल्य दिन पर दिन क्षीण हो रहे हैं.

आलोचकों का कहना है कि आज एक नए तरह का असहिष्णु माहौल हावी है जिसमें विरोध और असहमति को 'राष्ट्र-विरोधी' करार दिया जाता है. इन सबकी वजह से अविश्वास और नफ़रत का माहौल बन रहा है. ये बेहद चिंताजनक है कि एक विद्वान को उसका काम करने से रोका जा रहा है, उसे तंग किया जा रहा है.

ये भी पढ़ें:-

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आपयहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए