छत्तीसगढ़ चुनाव: क्या कांग्रेस वाकई नक्सलियों का समर्थन करती है?

  • 11 नवंबर 2018
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''जो अर्बन माओवादी हैं, वो शहरों में, एयर कंडीशन वाले घरों में रहते हैं. साफ़-सुथरे दिखते हैं. अपना एक रुतबा बनाते हैं. उनके बच्चे विदेशों में पढ़ते हैं. अच्छी-अच्छी गाड़ियों में घूमते हैं. लेकिन वहाँ बैठे-बैठे रिमोट सिस्टम से हमारे इन आदिवासी बच्चों की ज़िंदगी तबाह करने का ये काम करते हैं.''

ये भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी के हालिया भाषण का एक हिस्सा है.

उन्होंने शुक्रवार को बस्तर संभाग के मुख्यालय जगदलपुर में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस पर माओवादियों से मिले होने की बात कही.

उन्होंने ये भी कहा कि कांग्रेस पार्टी 'माओवादियों के शहरी नेटवर्क' से मिली हुई है.

एक दिन बाद बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने भी रायपुर में पार्टी का घोषणा-पत्र जारी करते हुए उन्हीं आरोपों को दोहराया.

इसके बाद कांग्रेस और बीजेपी के बीच सोशल मीडिया पर 'वाक युद्ध' छिड़ गया और दोनों तरफ से तीखी बयानबाज़ी की गई.

कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने ट्वीट कर प्रधानमंत्री मोदी से पूछा "क्या आप अब भी उस बयान पर क़ायम हैं जब आपने नक्सलियों को 'अपने लोग' कहा था? क्या उस बयान पर भी क़ायम हैं जब मुख्यमंत्री रमन सिंह ने नक्सलियों को धरती पुत्र कह कर संबोधित किया था. क्या आपको मालूम है कि नक्सलियों ने कांग्रेस पार्टी के 25 बड़े नेताओं की हत्या कर दी?"

सुरजेवाला का कहना था कि मोदी ने ये बयान 20 मई, 2010 में तब दिया था जब वो गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे.

वहीं, रमन सिंह ने ये बयान साल 2015 में दिया था. वो भी ये कहते हुए कि 'नक्सली धरती माता के सपूत हैं' और उनका मुख्यधारा में 'बच्चों की तरह' स्वागत होगा.

कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में सबसे ज़्यादा नुक़सान उनकी ही पार्टी और उनके ही नेताओं को उठाना पड़ा है.

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कांग्रेस पर हमलावर नक्सली

  • साल 2013 में सुकमा ज़िले की दर्भा घाटी में माओवादियों ने कांग्रेस के नेताओं के क़ाफ़िले पर हमला किया था. इस हमले में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सलवा जुडुम के जन्मदाता कहे जाने वाले महेंद्र करमा सहित कांग्रेस के 25 अन्य नेता मारे गए थे. इनमें देश के पूर्व गृहमंत्री विद्या चरण शुक्ल और छतीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष नंद कुमार पटेल भी शामिल थे.
  • इसके अलावा भी कांग्रेस को लेकर माओवादियों द्वारा समय-समय पर जो बयान जारी किये जाते रहे हैं उनमें सोनिया गाँधी, मनमोहन सिंह और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम पर निशाना साधा जाता रहा है.
  • माओवादी कांग्रेस को भाजपा से भी बड़ा दुश्मन इसलिए मानते आये हैं क्योंकि वो पी. चिदंबरम ही थे जिन्होंने गृहमंत्री रहते हुए सबसे बड़ा नक्सल विरोधी अभियान 'आपरेशन ग्रीन हंट' शुरू किया था.
  • माओवादी पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के उस बयान से भी ख़फ़ा बताए जाते हैं जिनमें उन्होंने कहा था कि "माओवादी भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा हैं."
  • इस अभियान के तहत नक्सल प्रभावित राज्यों में बड़े पैमाने पर केंद्रीय अर्ध-सैनिक बलों को तैनात किया गया था. इस अभियान के दौरान सुरक्षा बलों पर कई फ़र्जी मुठभेड़ों के आरोप भी लगे. नतीजा, चिदंबरम और सोनिया गाँधी के साथ-साथ तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नाम माओवादियों की 'हिट-लिस्ट' में शामिल हो गए.
  • इतना ही नहीं, माओवादियों ने पर्चे जारी करके खुलेआम कहा था कि कांग्रेस की सरकार ने पूंजीपतियों के साथ मिलकर आदिवासी बहुल इलाकों में खनिज संपदाओं की लूट मचा रखी है.
  • साल 2013 की दर्भा घाटी की घटना से पहले भी माओवादियों ने बस्तर में कई कांग्रेस के नेताओं पर हमला किया था और कई नेताओं की हत्या भी की थी.
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'बस्तर में इतनी सीटें कैसे जीत रही है बीजेपी?'

दंतेवाड़ा की मौजूदा विधायक और महेंद्र करमा की विधवा पत्ना देवती करमा ने बीबीसी से कहा कि प्रदेश में पिछले 15 सालों से भारतीय जनता पार्टी सरकार बनाती आ रही है.

देवती ने कहा, "उनसे (बीजेपी से) पूछिए कैसे इतनी सीटें जीतते रहे हैं वो लोग बस्तर में? साल 2013 से पहले यहाँ की 12 विधानसभा सीटों में से 11 भाजपा की झोली में थीं. 2013 में करमा जी की हत्या के बाद लोगों ने सुहानुभूति से कांग्रेस को वोट दिया. वोट देने वाले आम लोग थे. जंगलों में तो बहिष्कार करवाकर वोट ही पड़ने नहीं दिए गए.''

हालांकि भाजपा के नेताओं का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी सिर्फ़ कांग्रेस के नेता राज बब्बर के उस बयान की आलोचना कर रहे थे जिसमें उन्होंने माओवादियों को क्रांतिकारी कहा था.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने कांग्रेस पर 'अर्बन नक्सल' यानी माओवादियों के शहरी नेटवर्क को समर्थन देने का आरोप भी लगाया है.

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Image caption सामाजिक कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज को भीमा-कोरेगांव हिंसा सिलसिले में हिरासत में लिया गया.

तो आख़िर वो कौन लोग हैं जिन्हें 'अर्बन नक्सल' या 'शहरी नक्सल' कहा जाता है?

इस सवाल का जवाब सलवा जुडुम की तर्ज़ पर बने संगठन 'अग्नि' यानी 'एक्शन ग्रुप फ़ॉर नेशनल इंटेग्रिटी' ने दिया.

वो उन तमाम सामाजिक या मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर 'अर्बन नक्सल' होने का आरोप लगाता है जो पुलिस या सरकार के दमन का शिकार होते हैं.

इनमें बेला भाटिया, सोनी सोरी, कमल शुक्ला और संजय यादव जैसे सामाजिक कार्यकर्ता, क़ानून के जानकार और पत्रकार शामिल हैं.

अग्नि के सदस्यों ने सामाजिक कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ सड़कों पर जुलूस भी निकाले और उनके पुतले भी जलाए.

इनमे नंदिनी सुंदर भी हैं जिन्होंने कई बार सरकारी दमन के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है.

अग्नि से ही ताल्लुक़ रखने वाले फ़ारूक़ अली कहते हैं कि उनका संगठन हर उस शख़्स का विरोध करता रहेगा जो नक्सलियों की मदद करते हैं.

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Image caption 'अग्नि' के सदस्य फ़ारूक अली

'नक्सलियों की मदद करने वाले अर्बन नक्सल'

अली के अनुसार "जो लोग नक्सली होने के आरोप में पकडे गए हैं, उनको क़ानूनी सहायता देने वाले भी अर्बन नक्सल हैं. बेला भाटिया और नंदिनी सुन्दर का हम खुलकर विरोध करते रहेंगे. ये लोग सुरक्षा बलों और पुलिस के मनोबल को तोड़ने का काम कर रहे हैं."

अगर शहरी इलाकों को छोड़ दिया जाए तो बस्तर संभाग में ज़्यादातर इलाक़े ऐसे हैं जहाँ माओवादियों की समानांतर सरकार चलती है.

ये वो इलाक़े हैं जो बाक़ी के राज्य से पूरी तरह कटे हुए हैं. सुरक्षाबलों और माओवादियों के बीच चल रहे युद्ध की वजह से सुदूर अंचलों में रहने वाले आदिवासी बुरी तरह पिस रहे हैं.

ऐसे में चुनावों के दौरान नक्सलवाद को लेकर राजनीतिक दलों के बीच आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर स्थानीय लोगों के बीच भी बहस का मुद्दा बनता जा रहा है.

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