भारत में किस तरह फैलती है फ़ेक न्यूज़: बीबीसी रिसर्च #BeyondFakeNews

  • 12 नवंबर 2018
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बीबीसी के एक नए रिसर्च में ये बात सामने आई है कि लोग 'राष्ट्र निर्माण' की भावना से राष्ट्रवादी संदेशों वाले फ़ेक न्यूज़ को साझा कर रहे हैं और राष्ट्रीय पहचान का प्रभाव ख़बरों से जुड़े तथ्यों की जांच की ज़रूरत पर भारी पड़ रहा है.

आम लोगों के नज़रिए से फ़ेक न्यूज़ के प्रसार का विश्लेषण करते हुए प्रकाशित हुए पहले अध्ययन में ये जानकारियाँ सामने आई हैं.

इस रिपोर्ट में ट्विटर पर मौजूद कई नेटवर्कों का भी अध्ययन किया गया और इसका भी विश्लेषण किया गया है कि इनक्रिप्टड मैसेज़िंग ऐप्स से लोग किस तरह संदेशों को फैला रहे हैं.

बीबीसी के लिए ये विश्लेषण करना तब संभव हुआ जब मोबाइल यूजर्स ने बीबीसी को अपने फोन का एक्सेस दिया.

बीबीसी के Beyond Fake News प्रोजेक्ट के तहत ये रिसर्च किया गया है, जो ग़लत सूचनाओं के ख़िलाफ़ एक अंतरराष्ट्रीय पहल है. आज इसे लॉन्च किया जा रहा है.

Image caption लखनऊ यूनिवर्सिटी में बीबीसी हिंदी आज दिनभर आपके साथ #BeyondFakeNews कार्यक्रम के ज़रिए जुड़ा रहेगा

रिपोर्ट में सामने आई मुख्य बातें

  • राष्ट्रवाद के नाम पर फैलाया जा रहा है फ़ेक न्यूज़- बीबीसी रिसर्च
  • बीबीसी ने भारत, कीनिया और नाइजीरिया में व्यापक रिसर्च किया है
  • ये रिपोर्ट विस्तार से समझाती है कि कैसे इनक्रिप्टड चैट ऐप्स में फ़ेक न्यूज़ फैल रही है
  • ख़बरों को साझा करने में भावनात्मक पहलू का बड़ा योगदान है
  • Beyond Fake news ग़लत सूचनाओं के फैलाव के ख़िलाफ़ एक अंतरराष्ट्रीय पहल है.

भारत में लोग उस तरह के संदेशों को शेयर करने में झिझक महसूस करते हैं जो उनके मुताबिक़ हिंसा पैदा कर सकते हैं लेकिन यही लोग राष्ट्रवादी संदेशों को शेयर करना अपना कर्तव्य समझते हैं.

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भारत की प्रगति, हिंदू शक्ति और हिंदुओं की खोई प्रतिष्ठा की दोबारा बहाली से जुड़े संदेश तथ्यों की जांच किए बिना बड़ी संख्या में शेयर किए जा रहे हैं. इस तरह के संदेशों को भेजते हुए लोगों को महसूस होता है कि वे राष्ट्र निर्माण का काम कर रहे हैं.

कीनिया और नाइजीरिया में भी फ़ेक न्यूज़ फैलाने के पीछे भी कहीं न कहीं लोगों में कर्तव्य की भावना है.

लेकिन इन दोनों देशों में ये संभावना ज़्यादा है कि लोग राष्ट्र निर्माण की भावना की बजाय ब्रेकिंग न्यूज़ को साझा करने की भावना ज़्यादा होती है ताकि कहीं अगर वो ख़बर सच हुई तो वह उनके नेटवर्क के लोगों को प्रभावित कर सकती है.

सूचनाओं को हर किसी तक पहुँचाने की भावना यहां दिखाई पड़ती है.

ये रिपोर्ट ये भी बताती है कि भारत में फ़ेक न्यूज़ और मोदी के समर्थन वाली राजनीतिक गतिविधियाँ कई जगह एक जैसी हैं.

ट्विटर पर मौजूद नेटवर्कों के डेटा एनालिसिस से बीबीसी को ये जानकारी मिली है कि भारत में वामपंथी झुकाव वाले फ़ेक न्यूज के स्रोत आपस में उस तरह नहीं जुड़े हुए हैं, जिस तरह दक्षिणपंथी झुकाव वाले फ़ेक न्यूज़ के स्रोत में तालमेल है. इसी कारण दक्षिणपंथी झुकाव वाले फ़ेक न्यूज़ ज़्यादा प्रभावशाली ढंग से फैलते हैं.

भारत, कीनिया और नाइजीरिया में आम लोग अनजाने में ये उम्मीद करते हुए संदेशों को आगे बढ़ाते हैं कि उन ख़बरों की सत्यता की जांच कोई और कर लेगा.

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जहां एक ओर भारत में फ़ेक न्यूज़ के प्रसार में राष्ट्रवाद अहम है तो वहीं कीनिया और नाइजीरिया में ये रिसर्च कुछ और ही तस्वीर पेश करती है.

कीनिया और नाइजीरिया में जो फ़ेक न्यूज़ प्रसारित की जाती हैं उनमें राष्ट्रीय चिंताएं और आकांक्षाएं दिखती हैं.

कीनिया में वॉट्सऐप पर शेयर होने वाले फ़ेक न्यूज़ में आर्थिक घोटालों और तकनीकी योगदान से जुड़ी झूठी ख़बरें एक तिहाई होती हैं. वहीं, नाइजीरिया में आतंकवाद और सेना से जुड़ी ख़बरें ज़्यादा शेयर होती हैं.

कीनिया और नाइजीरिया का मामला अलग

कीनिया और नाइजीरिया में लोग मुख्य धारा के मीडिया स्रोतों और फ़ेक न्यूज़ के नामी स्रोतों का एक बराबर इस्तेमाल करते हैं. हालांकि, लोगों में असली ख़बर को जानने की इच्छा भारत की अपेक्षा कहीं ज़्यादा है.

अफ़्रीकी बाज़ारों में लोग ये नहीं चाहते कि कोई ख़बर उनसे छूट जाए. वहां हर ख़बर की जानकारी रखना सामाजिक साख का विषय है.

इन्हीं वजहों से कई बार प्राइवेट नेटवर्क्स में फ़ेक न्यूज़ भी फैल जाते हैं भले ही लोगों की मंशा सच जानने की होती है.

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बीबीसी वर्ल्ड सर्विस में ऑडियंस रिसर्च विभाग के प्रमुख डॉक्टर शांतनु चक्रवर्ती कहते हैं, "इस रिसर्च में यही सवाल है कि आम लोग फ़ेक न्यूज़ को क्यों शेयर कर रहे हैं जबकि वे फ़ेक न्यूज़ के फैलाव को लेकर चिंतित होने का दावा करते हैं. ये रिपोर्ट इन-डेप्थ क्वॉलिटेटिव और इथनोग्राफ़ी की तकनीकों के साथ-साथ डिजिटल नेटवर्क एनालिसिस और बिग डेटा तकनीक की मदद से भारत, कीनिया और नाइजीरिया में कई तरह से फ़ेक न्यूज़ को समझने का प्रयास करती है. इन देशों में फ़ेक न्यूज़ के तकनीक केंद्रित सामाजिक स्वरूप को समझने के लिए ये पहला प्रोजेक्ट है. मैं उम्मीद करता हूं कि इस रिसर्च में सामने आई जानकारियां फ़ेक न्यूज़ पर होने वाली चर्चाओं में गहराई और समझ पैदा करेगी और शोधार्थी, विश्लेषक, पत्रकार इन जानकारियों का इस्तेमाल कर पाएंगे. "

वहीं, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ग्रुप के निदेशक जेमी एंगस कहते हैं, "मीडिया में ज़्यादातर चर्चा पश्चिमी देशों में 'फ़ेक न्यूज़' पर ही हुई है, ये रिसर्च इस बात का मज़बूत सबूत है कि बाक़ी दुनिया में कई गंभीर समस्याएं खड़ी हो रही हैं, जहां सोशल मीडिया पर ख़बरें शेयर करते समय राष्ट्र-निर्माण का विचार सच पर हावी हो रहा है. बीबीसी की Beyond Fake news पहल ग़लत सूचनाओं के फैलाव से निपटने में हमारी प्रतिबद्धता की ओर एक अहम क़दम है. इस काम के लिए ये रिसर्च महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराता है."

रिसर्च में सामने आए अन्य निष्कर्ष

फ़ेसबुक

नाइजीरिया और कीनिया में फ़ेसबुक यूज़र समाचार के फ़र्ज़ी और सच्चे स्रोतों का बराबर ही इस्तेमाल करते हैं और इस बात की ज़्यादा परवाह नहीं करते कि कौन सा स्रोत भरोसेमंद है और कौन सा फ़र्ज़ी. शोध दिखाता है कि भारत में एक बार फिर मामला अलग है.

एक तरह की सोच वाले लोग फ़ेसबुक पर या तो विश्वसनीय स्रोतों से ज्यादा जुड़े हैं या फिर जाने-पहचाने फ़र्ज़ी स्रोतों से. ऐसा बहुत कम है कि लोग दोनों के साथ जुड़े हों. हमारे रिसर्च में ये भी पता चला कि जिन लोगों की रुचि फ़ेक न्यूज़ के जाने-पहचाने स्रोतों में है, उनकी राजनीति और राजनीतिक दलों में भी ज़्यादा दिलचस्पी होती है.

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पीढ़ियों का फ़र्क

कीनिया और नाइजीरिया में युवा अपने से उम्रदराज़ लोगों की तुलना में क़बायली और धार्मिक निष्ठाओं पर कम ध्यान देते हैं और फ़ेक न्यूज़ शेयर करते समय भी अपनी इन पहचानों से कम ही प्रेरित होते हैं. लेकिन भारत में शोध दिखाता है कि यहां के युवा ख़ुद को राष्ट्रवादी पहचानों से जोड़ते हैं और इन्हीं पहचानों को ध्यान में रखते हुए ही कोई चीज़ शेयर करते हैं. पुरानी पीढ़ी में भी इसी तरह का पैटर्न देखा गया है.

शब्दों से ज़्यादा तस्वीरें

ये शोध दिखाता है कि लेखों की तुलना में तस्वीरों और मीम्स के ज़रिए बड़ी संख्या में फ़ेक न्यूज़ शेयर किए जाते हैं. शोध यह भी विस्तार से बताता है कि कैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की प्रकृति और बहुत सारी उपलब्ध ऑनलाइन जानकारियों से निपटने की चुनौती फ़ेक न्यूज़ को जन्म देती है, जो विज़ुअल मीडिया के ज़रिए और फैलती है.

यह रिपोर्ट उसी दिन आई है जब फ़ेसबुक, गूगल और ट्विटर अपने-अपने प्लेटफॉर्म पर फ़ेक न्यूज़ के प्रभाव पर चर्चा करने के लिए इकट्ठा हुए हैं.

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ये दिल्ली में बीबीसी Beyond Fake News Conference में आज इस पर चर्चा करेंगे, जिसका बीबीसी न्यूज़ वर्ल्ड पर 16.30 GMT (भारतीय समयानुसार रात दस बजे) पर प्रसारण होगा.

संपादकों के लिए

फ़ेक न्यूज़ के 'एंड टू एंड' रूप को समझने के लिए कई तरह की प्रक्रियाएं अपनाई गईं. भारत में क्वालिटेटिव/इथनोग्राफ़िक के लिए 'थर्ड आई' और अफ़्रीका में 'फ़्लेमिंगो' इस प्रोजेक्ट के रिसर्च पार्टनर थे. बिग डेटा/नेटवर्क एनालिसिस के लिए सिन्थेसिस को शामिल किया गया.

बिग डेटा/ मशीन लर्निंग: मीडिया में अंग्रेज़ी और स्थानीय भाषाओं में पिछले दो सालों में फ़ेक न्यूज़ पर आई ख़बरों की बारीक़ी से पड़ताल. भारत में 47000; दोनों अफ़्रीकी मार्केट्स में 8,000.

ऑटो इथनॉग्राफ़ी: सात दिनों में उन संदेशों का संग्रह तैयार करना, जिसे रिसर्च में शामिल लोगों ने शेयर किया.

सेमिऑटिक एनालिसिस: इकट्ठे किए गए फ़ेक न्यूज़ संदेशों के चिह्नों, प्रतीकों और स्वरूप को समझना.

इन डेप्थ इन होम क्वालिटेटिव/इथनॉग्राफ़ी: भारत में 10 शहरों में 40 लोगों का 120 से ज्यादा घंटे तक विस्तार से साक्षात्कार, नाइजीरया के 3 और कीनिया के 2 शहरों में 40 लोगों का 100 घंटो तक साक्षात्कार.

नेटवर्क एनालिसिस: 16,000 ट्विटर प्रोफ़ाइल (370,999 रिलेशनशिप, भारत); 3,200 फ़ेसबुक पेज (भारत); 3,000 पेज (अफ़्रीकी बाज़ारों में).

बड़ी टेक कंपनियों के पैनल की चर्चा बीबीसी वर्ल्ड न्यूज़ पर 16.30 GMT (भारतीय समयानुसार रात दस बजे) पर प्रसारित की जाएगी और वीकेंड पर पुनर्प्रसारण होगा.

बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ग्रुप पूरी दुनिया में अंग्रेज़ी और 41 दूसरी भाषाओं में कार्यक्रम का प्रसारण करता है.

ये कार्यक्रम टीवी, रेडियो और डिजिटल माध्यमों से प्रसारित होते हैं. हर हफ़्ते पूरी दुनिया में क़रीब 26.9 करोड़ लोग इन कार्यक्रमों को देखते-सुनते और पढ़ते हैं.

बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के तहत आने वाले बीबीसी लर्निंग इंग्लिश दुनिया भर में लोगों को अंग्रेज़ी भाषा सिखाती है. बीबीसी को पूरी दुनिया में हर हफ़्ते 34.6 करोड़ से ज़्यादा लोग देखते-सुनते और पढ़ते हैं.

बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ग्रुप पूरी दुनिया में अंग्रेज़ी और 41 दूसरी भाषाओं में कार्यक्रम का प्रसारण करता है. ये कार्यक्रम टीवी, रेडियो और डिजिटल माध्यमों से प्रसारित होते हैं. हर हफ़्ते पूरी दुनिया में क़रीब 26.9 करोड़ लोग इन कार्यक्रमों को देखते-सुनते और पढ़ते हैं. बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के तहत आने वाले बीबीसी लर्निंग इंग्लिश दुनिया भर में लोगों को अंग्रेज़ी भाषा सिखाती है. बीबीसी के इंटरनेशनल न्यूज़ सर्विस को पूरी दुनिया में हर हफ़्ते 34.6 करोड़ से ज़्यादा लोग देखते-सुनते और पढ़ते हैं.

इसके इंटरनेशनल न्यूज़ सर्विस में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस, बीबीसी वर्ल्ड न्यूज़ टेलीविज़न चैनल और बीबीसी.कॉम/न्यूज़, बीबीसी वर्ल्ड न्यूज़ और बीबीसी.कॉम आते हैं. बीबीसी वर्ल्ड न्यूज़ और बीबीसी.कॉम बीबीसी के कमर्शियल इंटरनेशनल प्लेटफॉर्म हैं, जो 24 घंटे चलते हैं. ये चैनल बीबीसी ग्लोबल न्यूज़ लिमिटेड के अधीन हैं, जो इनका संचालन करती है. बीबीसी का वर्ल्ड न्यूज़ टेलीविज़न 200 से ज़्यादा देशों में उपलब्ध है. इसे दुनिया भर में 45.4 करोड़ घरों और होटलों के 30 लाख कमरों में देखा जा सकता है.


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