मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव 2018: शिवराज सिंह चौहान का गांव जैत और ये मुस्लिम परिवार

  • 14 नवंबर 2018
जैत गांव

'अल्लाह दे खाने को तो कौन जाए कमाने को.' मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के गांव जैत के कुछ युवा नर्मदा नदी के तट पर यही कहते हुए जमकर ठहाके लगाते हैं.

ये नदी में कुछ अंतराल पर डुबकी लगाते हैं और घाट पर आकर बैठ जाते हैं. बंटी विश्वकर्मा ने मुंह पोंछते हुए पूछा कहां से आए हैं? बंटी के सवाल का जवाब पास में बैठे सोमनाथ चौहान देते हुए कहते हैं, ''देखने आए होंगे मुख्यमंत्री जी का गाँव.''

तब तक बंटी विश्वकर्मा नर्मदा में एक और छलांग लगा देते हैं. कुछ दूर तक तैरने के बाद वापस आते हैं और कहते हैं, ''ख़ुद से ही देख लीजिए गांव. इसमें पूछकर क्या जानना है. सब तो दिख ही रहा है. मेरा हाल पूछना चाहते हैं तो जान लीजिए कि नोटबंदी के बाद से गांव आ गया.''

पास में ही दो युवा घाट पर बैठ अपनी चड्डी-बनियान धो रहे हैं. इस बीच सोमनाथ चौहान एक और डुबकी लगाते हुए कहते हैं कि मुख्यमंत्री भी गांव आते हैं तो नदी में नहाते हैं.

सोमनाथ ने बताया कि शिवराज सिंह चौहान तैरकर नदी के दूसरे छोर पर चले जाते हैं.

मुख्यमंत्री का गांव

जैत गांव के एक तरफ़ पहाड़ है दूसरी तरफ़ नर्मदा नदी. भोपाल से 70 किलोमीटर दूर शाहगंज और यहां से 18 किलोमीटर की दूरी पर जैत है. शाहगंज से ढाई किलोमीटर की एक कच्ची सड़क जैत जाती है. सड़क दोनों तरफ़ से धान के खेतों से घिरी हुई है. जैत बुधनी विधानसभा क्षेत्र में है और यहीं से शिवराज सिंह चौहान विधायक बनते हैं.

अगर आपके मन में भारत के बाक़ी गांवों की तस्वीर है तो इस गांव को भी उसी कसौटी पर देखिए. अगर आप सोचते हैं कि मुख्यमंत्री का गांव है और मुलायम सिंह के गांव सैफई की तस्वीर मन में लिए हुए हैं तो भारी निराशा होगी.

जैत में पहुंचते ही शिवराज सिंह चौहान का घर सबसे पहले दिखता है. घर की दीवार पर चौहान की एक धूल खाती तस्वीर लगी हुई है. चौहान के चाचा के कुछ परिवार के लोग इस घर में रहते हैं. घर के नौकरों ने बताया कि अभी घर पर कोई नहीं है क्योंकि सभी बुधनी विधानसभा क्षेत्र में चुनाव प्रचार के लिए निकले हैं. चौहान का सारा परिवार भोपाल में रहता है.

बस नर्मदा मइया आबाद रहें

जैत में नर्मदा के घाट पर एक छोटी सी दुकान है. इस दुकान में पूजा-पाठ का सामान मिलता है. 85 साल की लक्ष्मी बाई दुकान पर बैठी हैं.

लक्ष्मी बताती हैं कि मुख्यमंत्री चाहे जितनी भीड़ में रहें वो उनका पांव छूना नहीं भूलते हैं. ये कहते हुए उनके चेहरे पर जो मुस्कान आती है, वो उम्र के विस्तार पर भारी पड़ जाती है. भले दिन भर में उनकी दुकान से किसी ने नारियल नहीं ख़रीदा हो लेकिन मुख्यमंत्री के पांव छूने का भाव उन्हें संतोष से भर देता है.

जैत प्रेमचंद की कहानियों का गांव है.

सोमनाथ चौहान और बंटी विश्वकर्मा जैसे कई किरदार हैं जिनकी दुनिया में ख़ुशी इस बात पर निर्भर नहीं करती है कि उनके गांव का व्यक्ति पूरे प्रदेश पर शासन करता है. दोनों कहते हैं, बस नर्मदा मइया आबाद रहें.

इस गांव में तीन घर मुसलमानों के भी हैं. सोमनाथ अपने साथ उनके घर ले जाते हैं. बाहर से ही आवाज़ देते हैं, ''बड़की भाभी, ओ बड़की भाभी...बाहर तो निकलो. देखो कौन आया है. थोड़ा कंघी करके आना और मुंह पर घुंघट मत डालना.''

सईदा ख़ान बर्तन धो रही हैं. वो बिना देखे कहती हैं, 'तुम्हीं बात कर लो.'

सोमनाथ कहते हैं, ''अरी, आओ भाभी. दिल्ली से आए हैं.''

तब तक सोमनाथ सईदा ख़ान के बच्चे जिशान को गोद में उठाते हुए घर में घुस जाते हैं और खड़ी चारपाई को नीचे डाल देते हैं. घर की दीवार पर जिशान की एक तस्वीर शिवराज सिंह चौहान के साथ टंगी है.

मुफ़्त में ऑपरेशन

सोमनाथ पूछते हैं ये कौन हैं बेटा? जिशान कहता है, ''दादाजी.''

सोमनाथ तब तक घर की सारी महिलाओं को चारपाई पर बिठा देते हैं और कहते हैं पूछिए जो पूछना है.

सईदा कहती हैं, ''भैयाजी (शिवराज सिंह चौहान) ने दो झुग्गी दे दी. मैं बीमार पड़ी तो मुफ़्त में ऑपरेशन हो गया. मेरे ससुर का भी मुफ़्त में ऑपरेशन भोपाल में हुआ था. औऱ क्या चाहिए.''

सातवीं में पढ़ने वाली सना ख़ान बीच में सईदा को रोकते हुए कहती हैं, ''क्यों नहीं चाहिए. जब दादाजी (शिवराज सिंह चौहान) गांव आने वाले होते हैं तभी गांव की सफ़ाई होती है. देखो जाकर कितनी गंदगी फैली रहती है.'' सना ये बात ग़ुस्से में कहती हैं, लेकिन उनकी बात पर सारे लोग ज़ोर से हंसने लगते हैं.

इस गांव में मस्जिद भी है? इस पर सईदा कहती हैं, ''नहीं मस्जिद नहीं है. पास की गांव में है इसलिए कोई दिक़्क़त नहीं है.''

गांव के ज़्यादातर लोग कहते हैं कि शिवराज सिंह ने बहुत काम कराया है. लेकिन जब पूछेंगे कि कोई काम दिख नहीं रहा है तो उनका जवाब होता है- बिजली, सड़क स्कूल सब तो है.

सोमनाथ से पूछा कि गांव में बिजली कब आई थी? उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया- 87 में ही सर.

स्कूल भी पहले से ही है. शहर से गांव को जोड़ने वाली सड़क भी अब बन रही है. बंटी कहते हैं, ''ऐसा कुछ नहीं हुआ. जो इस गांव में है वो कौन गांव में नहीं है. कोई अस्पताल नहीं है. देखिए वही एक कमरे का स्वास्थ्य केंद्र है. एक नर्स रहती हैं. वो अकेले क्या कर लेंगी.''

गांव की आबादी क़रीब बारह सौ है. कइयों के टूटे-फूटे घर हैं. बंटी कहते हैं कि लोग इसी में ख़ुश हैं कि खाने-पीने की दिक़्क़त नहीं है क्योंकि नर्मदा मइया का आशीर्वाद है.

सोमनाथ भी कहते हैं कि गांव में पढ़ने-लिखने का बहुत माहौल नहीं है और बेरोज़गारी काफ़ी है.

शिवराज सिंह चौहान किराड़ जाति के हैं. ये जाति एमपी में ओबीसी कैटिगरी में आती है. इस गांव में किराड़, लोहार, मोची, केवट जाति के लोग सबसे ज़्यादा हैं.

बंटी कहते हैं, ''सोमनाथ भले मुख्यमंत्री की जाति का है लेकिन हमलोग में कोई जातीय भेदभाव नहीं है. सभी लोग एक साथ मज़े में रहते हैं.''

गांव की सरपंच बत्तीबाई हैं. क़रीब 50 साल की बत्तीबाई दलित महिला हैं. सोमनाथ सरपंच के घर ले जाते हैं और बाहर से ही आवाज़ देते हैं. ''बुआ, ओ बुआ. कहां हो...अभी खाना खा रही हो. अरे टाइम से खा लिया कर. चल खा के जल्दी आ.''

Image caption सरपंच बत्तीबाई

बत्तीबाई भी कहती हैं, ''शिवराज ने बहुत काम कराया है. सबको तीर्थ करा दिया. बेटी बारहवीं पास करती है तो एक लाख रुपए देता है. घर बना दिया. बहुत अच्छा है.''

जैत के लोग बिहार के किसी हाशिए के गांव की तरह ही है. मध्यम कद, फटी एड़ियां, देह पर गंदी पुरानी बनियान और गमछा. नदी में कपड़े धोती महिलाएं, मौत का इंतजार करते बुज़ुर्ग और कान में हेडफ़ोन लगाए न जाने गूगल पर क्या खोजते युवा. दिन हो या दोपहर या शाम नर्मदा में डुबकी लगाते लोग.

जैत की सबसे ख़ूबसूरत बात यह है कि यहां जाति और धर्म के नाम पर कोई लकीर नहीं है.

जैत से निकलते ही शिवराज सिंह चौहान को बुधनी में टक्कर दे रहे कांग्रेस के अरुण यादव मिल गए. अरुण यादव कांग्रेस के बड़े नेता हैं और उनके पिता सुभाष यादव भी कांग्रेस के कद्दावर नेता थे. 1993 में अर्जुन सिंह सुभाष यादव को ही मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे, लेकिन दिग्विजय सिंह ने बाजी मार ली थी.

अरुण यादव ने कहा, ''शिवराज सिंह के काम का आकलन करना है तो उनके गांव ही चले जाइए. उनको पता चला कि वहीं से आ रहा हूं तो हंसने लगे और बोले कि अब बताइए इन्होंने किया क्या है?

मैंने कहा, लोगों ने बताया कि पहले भोपाल से शाहगंज आने में चार घंटे लगते थे अब एक घंटा ही लग रहा है. अरुण यादव झेंप जाते हैं और कहते हैं कि इसका ख़ामियाजा भुगत तो रहे हैं. यादव ने कहा कि एक बात याद रखिएगा, शिवराज सिंह चौहान ने लोगों को अपने ऊपर निर्भर बना दिया है न कि आत्मनिर्भर.

शायद इसी निर्भरता को जैत में नर्मदा घाट पर बैठे युवा कह रहे थे कि अल्लाह दे खाने को तो कौन जाए कमाने को.

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