सबरीमला मामले में महिलाओं को कौन बांट रहा है? | नज़रिया

  • 19 नवंबर 2018
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सिर्फ़ कुछ महिलाओं के विरोध के कारण सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर फिर से प्रतिबंध बहाल कर देना चाहिए, ये पीछे ले जाना वाला और भ्रामक तर्क है.

सबरीमला में 'परंपरा' की सुरक्षा के लिए हो रही हिंसा के समर्थन में जो कारण दिए जाते हैं, उनमें सबसे क्रूर ये है कि अभिजात्य वर्ग की महिलाएं हिंदू धर्म के ख़िलाफ़ साज़िश रच रही हैं.

लेकिन, मुझे हैरानी नहीं है. केरल में ये भ्रम लगातार बना हुआ है कि वहां मातृसत्तामक समाज है और महिलाओं को समान अधिकारों की आज़ादी है.

यह बात तब भी कही जाती है जब इस ख़ूबसूरत लेकिन भ्रामक तस्वीर को तोड़ने वाले ढेरों प्रमाण सामने आए हैं.

एक बहुत अच्छा शोध है, जो घरेलू और ​यौन हिंसा, स्वतंत्र आय के स्रोतों तक पहुंच और मानसिक स्वास्थ्य जैसे विकास के ग़ैर-परंपरागत संकेतकों में लैंगिक असमानता के ज़बरदस्त अंतर को दिखाता है.

उदाहरण के लिए, एक अध्ययन दिखाता है कि शिक्षा का स्तर बढ़ने के साथ-साथ घरेलू​ हिंसा और दहेज के मामले भी बढ़ रहे हैं. यह भी ध्यान देने लायक है कि केरल में कार्यबल में महिलाओं का योगदान महज 24.8 प्रतिशत है. जबकि वहां 92 प्रतिशत महिलाएं शिक्षित हैं जो पूरे देश में सबसे ज़्यादा हैं.

केरल में रहने वाले किसी व्यक्ति के तौर पर मैं इस बात की गवाही दे सकती हूं कि यहां भी महिलाओं के प्रति द्वेष का भाव उतना ही ज़्यादा है जितना दूसरी जगहों पर है.

बल्कि हक़ीक़त ये है कि यहां महिला अधिकारों की बात करने वालों की संख्या भी अपेक्षाकृत कम है. वो राज्य में सत्ता के क़रीब भी नहीं हैं और उन पर हमले भी किए जाते हैं. ये बात किसी से छुपी नहीं है.

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अभिजात् वर्ग से जोड़ने की साजिश

लेकिन आलोचक हमेशा अपनी सुविधानुसार तथ्य चुनते हैं. यहां तक कि अपनी बात को और पुख़्ता बनाने के लिए वो स्थानीय टेलीविजन पर कुछ ऐसी विशेषाधिकार प्राप्त महिला प्रवक्ता बैठा देते हैं, जो परंपरा के नाम पर कोर्ट के फ़ैसले का विरोध करती हैं.

यहां भी साफ़ तौर पर दोहरा रवैया अपनाया जाता है.

इन चर्चाओं में, केरल और अन्य जगहों की जो महिलाएं सार्वजनिक रूप से अदालत के फ़ैसले का समर्थन करती हैं उन पर 'अभिजात्य वर्ग' का ठप्पा लगा दिया जाता है. साथ ही कहा जाता है कि वंचित महिलाओं और भक्तों के लिए उनका चिंता करना बहुत शहरी है. यानी कि ये सिर्फ़ एक दिखावा है.

वहीं, जो महिला प्रवक्ता फ़ैसले का विरोध करती हैं और ताक़त और विशेषाधिकार का आनंद उठाती हैं उन्हें केरल की सामान्य महिलाओं के क़रीब बताया जाता है.

एक तरह से इस मसले को वर्ग में बांटकर महिला बनाम महिला करने की कोशिश होती है. जो महिलाएं अधिकारों की बात करती हैं उसे दिखावा या शहरी चोंचला बताकर सामान्य महिलाओं से दूर किया जाता है.

वहीं, विरोध करने वाली महिलाओं को परंपराओं से जुड़ा हुआ और सामान्य महिलाओं के करीब दिखाया जाता है. इससे वो महिलाएं अधिकारों के आंदोलन से नहीं जुड़ पातीं जो पक्ष या विपक्ष में नहीं बंटी हुई हैं.

अभिजात्य वर्ग से हों या नहीं लेकिन समान अधिकारों की बात करने वाली सभी महिलाओं को इस नियम का विरोध करना चाहिए जो कहता है कि अयप्पा स्वामी भगवान का ब्रह्मचर्य बचाए रखने के लिए सबरीमला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की उम्र वाली महिलाओं को प्रवेश से रोका जाए.

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रेप के लिए भी यही तर्क

महिलाओं के प्रवेश का विरोध करने वाले तर्क देते हैं कि महिलाओं की उपस्थिति पुरुष भक्तों में 'यौन ऊर्जा' उत्पन्न करेगी. क्या ये उसी तरह की बात नहीं जो रेप या यौन हिंसा की पीड़िता के लिए कही जाती है कि उसके कपड़ों और हाव-भाव ने ही हमलावर को उकसाया होगा?

अगर ऐसी धारणा परंपरा के रूप में पेश की जा रही है तो एक लोकतांत्रिक समाज में हर किसी के लिए ये ज़रूरी है कि वो इसका पुरजोर विरोध करे.

सवाल ये उठता है कि आख़िर इसी परंपरा का इतना बचाव क्यों किया जा रहा है जबकि 20वीं सदी की शुरुआत में समाज सुधार आंदोलनों में कई दमनकारी प्रथाओं को ख़त्म किया जा चुका है.

आख़िरकार, यह तर्क देना कि इस परंपरा और विश्वास को महिलाएं ही आगे बढ़ा रही हैं, ये एक भ्रांति है.

इतिहास में कभी भी कोई कारण सिर्फ़ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं हुआ है क्योंकि उसके बचाव में भीड़ हिंसा पर उतर आई है.

अगर हम मताधिकार आंदोलन को देखें तो यह देखकर हैरानी हो सकती है कि किस तरह महिलाएं ही अमरीका में महिलाओं को मताधिकार दिए जाने वाले संगठनों से जुड़ी हुई थीं. लेकिन, उसके बावजूद भी महिलाओं को मताधिकार दिया गया.

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मंदिर में भेदभाव क्यों

हाल के महीनों में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने कई औपनिवेशिक युग के कानूनों को ख़त्म किया है. जिनमें 157 साल पुराना क़ानून भी है जो समलैंगिक संबंधों को अपराध ठहराता था.

सबरीमला के संदर्भ में उसी अदालत ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया, अगर भगवान ख़ुद स्त्री और पुरुष में अंतर नहीं करते तो फिर मंदिरों में ये अंतर क्यों होता है?

सबरीमला मंदिर में लगे प्रतिबंध को हटाते हुए अदालत ने अपने फैसले में ये साफ किया कि ''धर्म के पालन का अधिकार महिला और पुरुष दोनों को है.''

अगर भारत का सुप्रीम कोर्ट ये मानता है, तो हम क्यों नहीं?

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इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)

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