फे़क न्यूज़ पर बीबीसी रिसर्च को समझने के लिए इसे ज़रूर पढ़ें

  • 21 नवंबर 2018
बियॉन्ड फ़ेक न्यूज़

बीबीसी ने फ़ेक न्यूज़ के फैलाव को समझने के लिए गहन अध्ययन किया है. 110 पेज की इस पूरी रिसर्च को ठीक से समझाने की कोशिश के तहत सवाल-जवाब की शक्ल में हम कुछ जानकारियां आप तक पहुंचाना चाहते हैं. फ़ेक न्यूज़ पर बीबीसी की पूरी रिपोर्ट आप यहां पढ़ सकते हैं और उसे डाउनलोड भी कर सकते हैं.

1. इस शोध के लिए क्या तरीके अपनाए गए हैं?

इस शोध के लिए कई तरीके अपनाए गए जिनमें ये शामिल थे:-

  • अंग्रेज़ी और दूसरी भारतीय भाषाओं के 47,543 लेखों को देखा गया
  • ट्विटर के 16 हज़ार अकाउंटों के आपसी रिश्तों का विश्लेषण किया गया
  • फ़ेसबुक के नेटवर्क का विश्लेषण करने के लिए 3200 एफ़बी पेजों के विज्ञापन के सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया
  • जो संदेश जमा किए गए उनका सेमियोटिक तरीके से विश्लेषण किया गया
  • 40 लोगों के घरों पर उनका औसतन तीन घंटे लंबा इंटरव्यू किया गया

2.'सैंपल साइज़' सिर्फ़ 40 है. भारत जैसे बड़े और विविधता वाले देश के बारे में हम ऐसे नतीजे कैसे निकाल सकते हैं?

• अगर ये संख्या पर आधारित अध्ययन (जैसे कि सर्वे) होता तो कोई अर्थपूर्ण नतीजा निकालने के लिए 40 का सैंपल साइज़ बहुत छोटा होता, लेकिन ये एक Qualitative (गुणात्मक) अध्ययन है, और इसमें 'ग्राउंडेड थ्योरी' विश्लेषण तकनीक का इस्तेमाल किया गया है.

• ऐसे गुणात्मक अध्ययन जिनमें ग्राउंडेड तकनीक का इस्तेमाल होता है, उनमें 30 से 50 के बीच के सैंपल साइज़ को बेहतर माना जाता है. इसे समझने के लिए क्लिक करके और पढें. गुणात्मक अध्ययन के लिए सैंपल साइज़ क्या हो, इस पर अकादमियों में होने वाली चर्चा, यहां क्लिक करके पढें.

गौर करने की बात है कि हमने हर व्यक्ति से तीन घंटे की बातचीत दर्ज की. 40 लोगों से तीन घंटे बात करने का मतलब ये है कि हमारे पास 120 घंटे की रिकॉर्डेड जानकारी है, इन 40 लोगों की बातचीत का लिखित विवरण (Transcript) 2000 पेज का है. ऐसे में डाटा वाकई समृद्ध और व्यापक था.

जैसा कि हमने रिसर्च रिपोर्ट में साफ़ तौर पर कहा है, ये प्रोजेक्ट शोध के लिहाज़ से शुरुआती है, हमने ये भी कहा है कि ये रिपोर्ट 'चर्चा की शुरुआत' के तौर पर पेश की गई है, ये आखिरी नतीजा नहीं है. कोई भी अध्ययन आखिरी नतीजा नहीं दे सकता है. अगला क़दम शोध करने वाले दूसरे लोगों को उठाना है जो इस प्रोजेक्ट के कुछ नतीजों को लेकर, दूसरी तमाम तकनीकों का इस्तेमाल करते हुए इसे आगे बढ़ाएं, इसकी पुष्टि करें, बारीकी से पड़ताल करें या फिर नतीजों को ख़ारिज कर दें.

Image caption प्रतीकात्मक तस्वीर

3.हमने Qualitative Approach को ही क्यों चुना?

इस शोध में हमारा मक़सद ऐसे मुद्दे को सही तरीके से समझना है जो हमारी राय में जटिल है. भारत के मामले में इसे लेकर पर्याप्त अध्ययन नहीं हुआ है और हम इस मुद्दे को सही तरीके से बयान करने की कोशिश कर रहे हैं. जैसा कि हमने रिपोर्ट में कहा है कि शुरुआत में हमारी दिलचस्पी फ़ेक न्यूज़ के पीछे के मनोविज्ञान को गहराई में समझने की है, जबकि अब तक सारी चर्चा टेक्नॉलोजी पर केंद्रित रही है.

ख़ास कर ये जानने की कोशिश है कि नागरिकों के लिए 'फ़ेक न्यूज़' शब्द के मायने क्या हैं. जब बड़े सर्वेक्षण या Quantitative Study होती है तो आम नागरिक फ़ेक न्यूज़ को लेकर चिंता ज़ाहिर करते हैं, हम यह समझना चाहते थे कि अगर लोग चिंतित हैं तो फिर बिना जाने-परखे ग़लत या भ्रामक जानकारी को आगे क्यों बढ़ाते हैं?

इस मक़सद को देखते हुए कि हमने शोध के एक ऐसे क्षेत्र में ज़्यादा जानकारी जुटाने और गहराई से पड़ताल करने की कोशिश की है जिनकी ज़्यादा छानबीन नहीं हुई है.

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Image caption बीबीसी न्यूज़ जैसी दिखने वाली नकली वेबसाइट जिसमें ब्रिटनी स्पीयर्स से जुड़ी ग़लत ख़बर चलाई गई

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4. क्या 40 लोगों की 'राय' 130 करोड़ लोगों के देश की प्रतिनिधि बन सकती है?

इस शोध में हम यह पता लगाने की कोशिश नहीं कर रहे थे कि फ़ेक न्यूज़ के बारे में देश के नागरिकों की क्या राय है. हमारा मकसद ये पता करना करना था कि फ़ेक न्यूज़ फैलाने वालों के दिमाग़ में क्या चलता है. हम उन फ़ैक्टरों को समझना चाहते हैं जो फ़ेक न्यूज़ को शेयर करने/ फैलाने में असर डालते हैं. लोगों से बातचीत करके और तब डाटा विश्लेषण करके हम उनके मनोविज्ञान को समझने की कोशिश करते हैं, वो जिस तरह का बर्ताव करते हैं, वैसा वो क्यों करते हैं और तमाम कारण जो उनके जीवन पर असर डालते हैं.

हमने लोगों की कही हुई बात पर तुरंत यक़ीन नहीं कर लिया. आम लोग 'सेंडर प्राइमेसी' और 'सोर्स एग्नोस्टिसिज़्म' जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं करते. ये शब्द विश्लेषण के नतीजे के तौर पर सामने आए हैं.

इसलिए हम पूरे भरोसे के साथ कह सकते हैं कि जो तस्वीर हमने बनाई है वो ख़ासी वास्तविक तस्वीर है कि किस तरह के मनोवैज्ञानिक फ़ैक्टर (उदाहरण के लिए शेयर करने की प्रेरणा, लोगों की पहचान, मान्यताएं आदि) तकनीकी फ़ैक्टरों (उदाहरण के लिए प्लेटफ़ॉर्म) पर हावी होते हैं, और किस तरह संदेश का कंटेंट फ़ेक न्यूज़ के प्रसार में योगदान देता है.

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5. फ़ेक न्यूज़ के फैलाव में भूमिका निभाने वाले अलग-अलग फ़ैक्टरों के बारे में जो नतीजे निकाले गए हैं वे वास्तविकता के कितने क़रीब हैं?

हम काफ़ी पुख्ता विश्वास के साथ कह सकते हैं कि हम लोगों के मनोविज्ञान (मसलन, फ़ॉर्वड या शेयर करने के पीछे की वजह), टेक्नॉलोजी (फ़ेसबुक, ट्विटर या व्हाट्सऐप जैसे प्लेटफ़ॉर्मों की ख़ासियतें) और संदेश के प्रकार (सूचनात्मक, भावनात्मक वगैरह) के आपसी रिश्तों को समझ पाए हैं, और यह जान पाए हैं कि ये फ़ैक्टर फ़ेक न्यूज़ के फैलने में क्या भूमिका अदा करते हैं.

हमें विश्वास है कि भविष्य में इस मुद्दे को समझने के लिए जो भी रिसर्च होंगे उनके नतीजे, हमने जो तस्वीर सामने रखी है उससे बहुत अलग नहीं होंगे.

यह रिसर्च हमें नहीं बता सकती इनमें से कौन सा फ़ैक्टर कितना असर डालेगा, कौन फ़ैक्टर अधिक प्रभावी होगा और कौन कम. या यह भी नहीं बताया जा सकता कि अलग-अलग समूहों में इन फ़ैक्टरों की क्या भूमिका होगी, लेकिन इतना ज़रूर है कि ये फ़ैक्टर अहम भूमिकाअदा करेंगे.

महिलाओं, युवाओं या इस तरह के अलग-अलग वर्गों में अगर शोध किया जाए तो नतीजे थोड़े-बहुत अलग हो सकते हैं, लेकिन सभी फ़ैक्टर लागू ज़रूर होंगे. बहुत सारे मामलों में पूरी तस्वीर को समझने के लिए, ख़ास तौर पर टेक्नोलॉजी की भूमिका को समझने के लिए Quantitative study मसलन बड़े पैमाने पर सर्वेक्षण करने होंगे. भविष्य में जो Quantitative अध्ययन होंगे उनमें इस शोध के नतीजों से मदद मिलेगी.

6. सैंपलिंग और लोगों के चुनने में क्या एहतियात बरती गई?

सबसे पहले यह बात ध्यान देने वाली है कि यह Qualitative शोध, मार्केट रिसर्च सोसाइटी ऑफ़ इंडिया की आचार संहिता के अनुसार हुआ है. यह भारत में मार्केट रिसर्च की निगरानी करने वाली संस्था है. इस प्रॉजेक्ट में कई और पक्ष शामिल थे. जवाब देने वालों को काफ़ी देखने-परखने के बाद इस अध्ययन के लिए चुना गया. हमारे अध्ययन के साझीदार 'थर्ड आई' को इस क्षेत्र का ख़ासा अनुभव है. साथ ही, उनसे यह सुनिश्चित कराया गया कि वह उच्चतम मानकों के साथ अध्ययन करें. इसके लिए अपनाए गए क़दम कुछ इस तरह से हैं:-

  • इसके लिए स्क्रीनर को निर्देश थे कि स्त्री, पुरुष और उम्र के अलावा और सामाजिक-आर्थिक स्तर को भी जांचा जाए. इसमें एनसीसीएस की मानक प्रक्रिया अपनाई गई जिसे बीएआरसी ने विकसित किया है.
  • साथ ही स्क्रीनर को यह भी चेक करना था कि लोग क्या ख़बरें पढ़ते हैं और वह किस प्लेटफ़ॉर्म (व्हाट्सऐप, फ़ेसबुक मैसेंजर, ट्विटर वगैरह) पर इसे किस तरह शेयर करते हैं.
  • साथ ही स्क्रीनर को कर्टिस-ब्राइसन पैमाने पर लोगों के सामाजिक-राजनीतिक झुकाव की पहचान करने को कहा गया था.
  • स्क्रीनर ने जवाब देने वालों से उनके राजनीतिक जुड़ाव, संबंध या सदस्यता के बारे में कोई सवाल नहीं पूछा था.
  • इसके अलावा जवाब देने वालों ने शोध शुरू होने से पहले, स्क्रीनर को जो सूचनाएं दीं उनकी सच्चाई को जांचने के लिए दो स्तर के 'बैकचेक्स' थे. इन बैकचेक्स में व्यक्तिगत तौर पर मिलना और टेलीफ़ोन पर इंटरव्यू लेना शामिल था
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हमने यह सुनिश्चित किया कि हमारे पास महिला-पुरुष की बराबर संख्या हो जिसमें लगभग हर आयु का प्रतिनिधित्व हो. साथ ही हर सामाजिक-आर्थिक स्थिति के लोगों के अलावा वामपंथ-दक्षिणपंथ विचारधारा के लोग भी इसमें शामिल हों.

• लोगों की वामपंथी-दक्षिणपंथी विचारधारा का आकलन करते हुए हमने उनसे यह नहीं पूछा कि वह किस राजनीतिक दल का समर्थन करते हैं या किसे वोट देते हैं.

• बल्कि हमने ऐसे सवालों का एक स्थानीय संस्करण तैयार किया जो जाने-माने शोधकर्ताओं जॉन कर्टिस और कैरोलाइन ब्राइसन ने बनाया है. लोगों के आर्थिक और सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर विचार के बाद उन्होंने यह तैयार किया. जिसे क्लिक कर यहां पढ़ा जा सकता है: (यहां यह साफ़ कर दिया जाना चाहिए कि हमें नहीं मालूम है कि जवाब देने वाले किस राजनीतिक पार्टी को वोट देते हैं. हमारी इसमें कोई रुचि भी नहीं थी.)

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• Qualitative शोध या किसी भी अध्ययन में एक सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि जवाब देने वाला, यह अनुमान न लगा ले कि शोधकर्ता क्या सुनना चाहते हैं. इसी वजह से हमने तीन घंटे का घर में इंटरव्यू करने का तरीक़ा अपनाया. इस इंटरव्यू ने उन्हें अपनी ज़िंदगी के बार में विस्तार से बताने का मौका दिया. इसमें किसी भी समय वह यह अनुमान नहीं लगा पाए कि शोधकर्ता क्या जवाब चाहते हैं, ख़ास तौर पर इंटरव्यू करते समय शोधकर्ताओं के दिमाग़ में भी कोई जवाब नहीं था.

• शोधकर्ताओं के दिमाग़ में कोई जवाब नहीं थे क्योंकि वह 'ग्राउंडेड थ्योरी' नाम की विश्लेषणात्मक तकनीक का इस्तेमाल कर रहे थे. इस तकनीक में परिकल्पना पर आधारित डाटा को नहीं लिया जाता और बाद में विश्लेषण के आधार पर इसे विकसित किया जाता है. इसीलिए शोधकर्ता इंटरव्यू के दौरान किसी ख़ास तरह के जवाब की तलाश में नहीं होते हैं. इंटरव्यू करने वाला भी नहीं जानता कि शोध करने वाले को क्या जवाब चाहिए.

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7. इस शोध की सीमाएं क्या हैं?

हर शोध की सीमाएं होती हैं, इसकी भी है. इसमें ग्रामीण इलाकों में लोगों से बातचीत नहीं की गई है, ग्रामीण इलाकों में डिजिटल टेक्नोलॉजी और सोशल मीडिया का असर अपेक्षाकृत कम है. हमें विश्वास है कि इस रिसर्च के नतीजे ग्रामीण इलाकों पर भी लागू होंगे, यह कहना मुश्किल है कि वे किस हद तक लागू होंगे.

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8. नेटवर्क मैप में फ़ेक न्यूज़ के स्रोत में किसी को शामिल करने के लिए क्या मापदंड अपनाए गए?

  • इस शोध में किसी के भी स्रोत के ऊपर 'फ़ेक न्यूज़ का स्रोत' होने का लेबल नहीं लगाया गया है या किसी को 'फ़ेक न्यूज़ बनाने वाला' नहीं कहा गया है. इस शोध में उन कुछ ट्विटर हैंडलों की सूची ज़रूर दी गई है 'जिनके बारे में मालूम है कि उन्होंने कभी फ़ेक न्यूज़ प्रकाशित किया है'. यह लिस्ट फ़ैक्ट चेक करने वाली तीन साइटों--boomlive.in, factchecker.in और altnews.in से मिली जानकारी के आधार पर तैयार की गई है. यह सूची बीबीसी के रिसर्चरों के निर्णय के आधार पर नहीं बनाई गई है.
  • ऑल्ट न्यूज़ अपने मानदंड को लेकर बेहद साफ़ है, जिसके बारे में उनकी साइट पर पढ़ा जा सकता है. बूमलाइव.इन फ़ैक्ट चैकर्स के सत्यापित अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क आईएफ़सीएन से प्रमाणित है

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