पाकिस्तान से आई औरत, जिसने कश्मीर में मचाया धमाल

  • 24 नवंबर 2018
कश्मीर की सरपंच इमेज कॉपीरइट Majid Jahangir/BBC

उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा ज़िले के पुंगरा गांव में तेज़ बारिश के बीच जब मैं दिलशादा बेग़म के घर पहुंचा, तो वो अपनी छोटी सी किराने की दुकान पर बैठी मिलीं.

दुकान के आसपास कई लोग थे, जिनको वो बता रही थीं कि मुझसे पूछे बग़ैर मेरे सरपंच बनने की ख़बर इंटरनेट पर डाल दी गई है.

दिलशादा बेग़म दुकान के आसपास बैठे इन लोगों को ये भी बता रही थीं कि उनके बारे में जो लोग ख़बर करना चाहते हैं, वो आएं और जानें कि मैं क्यों सरपंच बन गई और इन चुनावों में क्यों हिस्सा लिया?पाकिस्तान से आई औरत ने कश्मीर में मचाया धमाल

जम्मू और कश्मीर में जारी पंचायत चुनावों में निर्विरोध जीतने वाले उम्मीदवारों में दिलशादा बेग़म भी एक हैं.

26 साल की दिलशादा साल 2012 में पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से अपने पति मोहम्मद यूसुफ़ बट के साथ भारत प्रशासित कश्मीर आई थीं.

दिलशादा की शादी 2002 में मुज़फ़्फ़राबाद में यूसुफ़ के साथ हुई थी.

सीमा पार हथियारों की ट्रेनिंग

यूसुफ़ बट साल 1997 में हथियारों की ट्रेनिंग लेने सीमा पार कर पाकिस्तान चले गए थे.

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दिलशादा ने बताया कि उनके पति मुज़फ़्फ़राबाद में गैस एजेंसी और किराने की दुकान चलाते थे.

"जब साल 2011 में भारत सरकार ने कहा कि जितने भी कश्मीरी नौजवान सीमा पार हथियारों की ट्रेनिंग करने गए हैं, वो सब सरकार कि रिहैबिलिटेशन पॉलिसी के तहत अपने घर वापस लौट सकते हैं तो मेरे पति ने कहा कि हम भी अपने घर वापस लौटेंगे. हम फिर 2012 में नेपाल के रास्ते कश्मीर पहुंचे. यहां पहुंचने पर पुलिस ने मेरे पति को पांच दिन तक हिरासत में रखा."

पांच बच्चों की माँ दिलशादा ने बताया, "साल 1992 में मेरे पिता भारत प्रशासित कश्मीर से पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर चले गए थे और तब से हम वहीं रहते थे."

उन्होंने कहा, "मेरे माता-पिता दोनों ही कुपवाड़ा ज़िले के टंगडार के हैं. मेरी पैदाइश भी वहीं की है. जब मैं तीन महीने की थी तब अब्बा मुज़फ़्फ़राबाद जाकर बस गए."

पंचायत चुनाव

परिवार चलाने के लिए दिलशादा गांव में पति के साथ किराने की दुकान चलाती हैं.

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दिलशादा बताती हैं, "सात महीने पहले मुज़फ़्फ़राबाद में अब्बा की मौत हो गई. लेकिन सरकार ने मायके जाने की इज़ाजत नहीं दी. अब सात साल होने को हैं, घरवालों को देखे हुए. हमारी क्या ग़लती है? हमारी समझ में नहीं आ रहा है कि हमारे साथ ऐसा क्यों किया जा रहा है. अगर हम वीज़ा के लिए अप्लाई करते हैं तो हमें वो दिया जाए."

पंचायत चुनाव में खड़ा होने पर वो कहती हैं, "हम अपनी पहचान बनाना चाहते हैं, क्योंकि हमारी कोई पहचान नहीं है. पंचायत चुनाव में आने की सबसे बड़ी वजह ये थी कि मेरी जैसी महिलाओं की कोई पहचान ही नहीं है."

"इस चुनाव के ज़रिए मैं अपनी पहचान बनाना चाहती हूँ कि हम कौन हैं और क्या हैं? हमें न यहां कोई पूछने वाला है और न ही वहां. हमारी पहचान ख़त्म हो गई है. ये क़दम उठाने का मक़सद यही है कि सरकार हमारे लिए कुछ करेगी."

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जब दिलशादा ने सरपंच के लिए फ़ॉर्म भरा तो उनके मुक़ाबले में एक और उम्मीदवार ने पर्चा भरा. वो कहती हैं कि जब उस उम्मीदवार ने सुना कि मैं खड़ी हो रही हूँ तो उन्होंने अपना पर्चा वापस ले लिया.

आरिफ़ा की कहानी

दिलशादा बेग़म अपनी तरह की अकेली महिला नहीं है. आरिफ़ा बेग़म की कहानी भी उनसे मिलती-जुलती है.

उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा ज़िले के खुमार्याल में भी पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से आईं 35 वर्षीया आरिफ़ा बेग़म सरपंच के पद के लिए निर्विरोध चुनी गई हैं.

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आरिफ़ा बेग़म के पति गुलाम मोहम्मद मीर भी साल 2010 की सरकारी रिहैबिलिटेशन पॉलिसी के तहत कश्मीर वापस लौटे हैं.

मीर भी कुछ साल पहले हथियारों की ट्रेनिंग लेने पाकिस्तान गए थे और वहीं उन्होंने आरिफ़ा से शादी की थी.

मीर 2001 में सीमा पार कर पाकिस्तान गए थे और 2010 तक वहां रहे. मीर ने आरिफ़ा के साथ मुज़फ़्फ़राबाद में ही शादी की थी.

आरिफ़ा बेग़म से बीबीसी ने बात करने की कोशिश तो की, लेकिन उन्होंने बात करने से इनकार कर दिया.

क्या कहता है प्रशासन

कुपवाड़ा ज़िले के मवार के रिटर्निंग ऑफ़िसर अर्शीद हुसैन ने बताया, "वो पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की हैं या नहीं, इस बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता हूँ. उनके पास वो सारे कागज़ात थे, जो उनके नामांकन फ़ॉर्म भरने के लिए काफ़ी थे. और साथ ही उनका नाम वोटर लिस्ट में भी है. उनके पास आधार कार्ड और दूसरे ज़रूरी कागज़ात भी थे."

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Image caption अपने बच्चों के साथ दिलशादा

इस चुनाव क्षेत्र के विधायक इंजीनियर रशीद ने बीबीसी को बताया, "मेरे ख्याल से ये कोई नई बात नहीं है. वो जो बच्ची हैं, हमारे सरहद पार वाले कश्मीर की हैं. हिंदुस्तान का भी दावा है कि वो कश्मीर हमारा है और पाकिस्तान का भी दावा है कि ये कश्मीर हमारा है."

"सरहद के उस पार का या सरहद के इस पार का, कोई भी किसी जगह से चुनाव लड़े तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए. हम तो यही चाहेंगे कि जम्मू और कश्मीर के लोगों को जीने दिया जाए. वो उस पार वाले कश्मीर की हैं. ये एक अच्छी बात है कि वो चुनाव में हिस्सा ले रही हैं."

कुपवाड़ा के कलक्टर ख़ालिद जहांगीर ने बीबीसी से कहा, "हमें अभी समय नहीं मिला है कि हम इस बात की जाँच करें कि ये महिला कहां की हैं."

साल 2010 में तत्कालीन मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने घोषणा की थी कि जो भी नौजवान सीमा पार हथियारों की ट्रेनिंग लेने गए हैं, वो सरकार की रिहैबिलिटेशन पॉलिसी के तहत वापस आ सकते हैं. इस सरकारी घोषणा के बाद अभी तक क़रीब चार सौ से अधिक परिवार पाकिस्तान से वापस कश्मीर लौटे हैं.

जम्मू और कश्मीर में 17 नवंबर 2018 से नौ चरणों में पंचायत चुनाव शुरू हो गए हैं.

क़ानून के मुताबिक़ जम्मू और कश्मीर के नागरिक ही जम्मू और कश्मीर में वोट दे सकते हैं या फिर चुनाव में हिस्सा ले सकते हैं.

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