सबरीमला मुद्दे से मिले फ़ायदे को वोट बैंक में बदल सकेगी भाजपा?

  • 22 नवंबर 2018
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सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी अयोध्या के राम मंदिर बनाने के मुद्दे को लेकर नब्बे के दशक में केंद्र में आई थी. हालांकि वो अपने इस वायदे को पूरा नहीं कर पाई, लेकिन ये बहस का अलग मुद्दा है.

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि मंदिर के मुद्दे ने पार्टी को उत्तर भारत में प्रचंड समर्थन हासिल करने में काफी मदद की और कुछ साल बाद ही पार्टी गठबंधन सरकार बनाने में कामयाब हुई.

लेकिन ऐसा लगता है कि काफी हद तक उत्तर भारत की पार्टी रही भाजपा को केरल के सबरीमला मंदिर में अयोध्या जैसा ही एक नया मुद्दा मिल गया है.

दो साल पहले, केरल जैसे राज्य में भाजपा को ऐसी राजनीतिक पार्टी माना जाता था जिसके साथ खुले तौर पर जुड़ने में कई लोग शर्मिंदा महसूस करते होंगे. यहां लोगों ने पिछले चार दशकों के दौरान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और कांग्रेस को सत्ता में देखा है.

लेकिन बीते दो महीनों के दौरान हालात ने नाटकीय रूप से करवट बदली है और अब शायद ही कुछ ही लोग होंगे जो कहेंगे कि केरल में भाजपा का अस्तित्व नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के फ़ैसले ने 10 से 50 साल की महिलाओं (माहवारी होने की उम्र की महिलाओं) के सबरीमला के अयप्पा स्वामी मंदिर में प्रवेश करने से लगी रोक हटा ली थी. इसी के साथ भाजपा को परंपरा के समर्थन में 'हिंदुओं को एकजुट करने का मौका' मिल गया.

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साल में एक बार आने वाले महत्वपूर्ण 64-दिवसीय मंडला-मक्करविलक्कू तीर्थाटन के लिए 17 नवंबर को सबरीमाला मंदिर के कपाट खुले. इसके बाद से ही भाजपा और सीपीएम और लेफ़्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) के नेतृत्व वाली सरकार के बीच तनाव लगातार बना हुआ है.

मंडला-मक्करविलक्कू, तीन शब्दों को जोड़ कर बना एक शब्द है जिसका अर्थ है पवित्र समय (मंडला), जो मलयालम कैलेंडर के एक ख़ास महीने में आता है (मकर) और जब दिए जलाए जाते हैं (विलक्कू). इस तीर्थ यात्रा के आख़िरी दिन दिए जलाए जाते हैं.

सीपीएम के ढुलमुल रवैये से मिला भाजपा का फ़ायदा

बीते दिनों भाजपा परिवार के सदस्य कुछ ऐसी घटनाओं में शामिल रहे जिस कारण उन्हें हिरासत में लिया गया और राज्य में राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ी.

हिंदुत्ववादी संगठन से जुड़े एक नेता की गिरफ़्तारी के बाद यहां विरोध प्रदर्शन शुरू हुए और मंदिर खुलने के पहले दिन राज्य में हड़ताल की अपील की गई. इसके बाद एक भाजपा नेता को हिरासत में लिए जाने के बाद विरोध में लोगों ने सड़कों पर चक्काजाम कर दिया.

आश्चर्यजनक बात ये थी कि राज्य के छोटे शहरों में भी 200 से 300 लोग विरोध प्रदर्शन के लिए एकजुट हो रहे थे जबकि उनके सहयोगियों को नियमों के उल्लंघन के आरोप में जेल में बंद कर दिया गया था.

ये नियम इसी साल अक्तूबर में बने थे ताकि मंदिर में आ रही 50 साल की कम उम्र की महिलाओं के साथ हो रही हिंसा को रोका जा सके. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अक्तूबर में पहली बाद मंदिर के कपाट खोले गए थे.

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राजनीतिक विश्लेषक जो स्कारिया ने बीबीसी हिंदी को बताया, "बड़ी संख्या में लोग मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का खुल कर विरोध कर रहे हैं और इस पर ऐसा लग रहा है कि सीपीएम ढुलमुल नज़रिया अपना रही है."

इसी साल अक्तूबर में राज्यभर में बीजेपी के समर्थन से हो रहे विरोध प्रदर्शनों में समाज के सभी तबकों से महिलाओं से हिस्सा लिया था.

इतिहासकार और फेमिनिस्ट जे देविका कहती हैं कि उन्हें महिलाओं के मंदिर में प्रवेश के ख़िलाफ "रुढ़िवादी महिलाओं" का सामने आना आश्चर्य की बात नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट ने 10 से 50 साल की सभी महिलाओं को पेरियार के जंगलों को बीच मौजूद स्वामी अयप्पा के इस मंदिर में जाने की अनुमति दे दी है. लेकिन ये महिलाएं मंदिर में प्रवेश करने के लिए 50 साल की उम्र तक इंतज़ार करने के लिए तैयार हैं.

तिरुवनंतपुरम में सेंटर फॉर डेवेलपमेन्ट स्टडीज़ में सहायक प्रोफ़ैसर देविका कहती हैं, "राजनीतिक रूप से भाजपा तो बढ़ी ही है, लेकिन इससे भी महत्वपू्र्ण है कि इसका विकास सामाजिक रूप में भी हुआ है. यहां व्यापक स्तर पर रुढ़िवाद पसरा था जिसका वामपंथी और दक्षिणपंथी साझा तौर पर इस्तेमाल कर रहे थे. अब तक, वामपंथियों ने यहां राजनीतिक रूप से प्रगतिशील और सामाजिक रूप से प्रतिगामी (पीछे हटने वाले) होने का फ़ायदा उठाया है."

ये बात सभी जानते हैं कि 1957 में भारत में पहली बार कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार के मुख्यमंत्री ई.एम.एस. नंबूदरीपाद ईश्वर में विश्वास नहीं करने वालों में से थे लेकिन अपनी पत्नी के साथ वो हमेशा ही मंदिर जाया करते थे.

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'सामाजिक रूढ़िवाद का इस्तेमाल'

ऐसा लगता है कि छह दशक के बाद यह प्रचलन आज भी नहीं बदला. ऐसा नहीं है कि वामपंथी अब तक इससे अनजान थे. देविका कहती हैं कि जिन फेमिनिस्टों ने वामपंथियों को इसके बारे में चेतावनी दी थी, उन्हें झिड़क दिया गया था.

वे कहती हैं, "दक्षिणपंथी सक्रिय रूप से सामाजिक रूढ़िवाद को इस्तेमाल कर रहे हैं और स्पष्ट तौर पर ये वामपंथियों से अधिक दक्षिणपंथियों पर कहीं अधिक फिट बैठता है. इसलिए वो इसका फ़ायदा उठा रहे हैं."

देविका कहती हैं, "और वास्तव में वामपंथी इससे निपटने में इतने चतुर नहीं हैं."

कहा जाए तो केरल सरकार के पास 28 सितंबर के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को लागू करने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं था. सुप्रीम कोर्ट ने 10 से 50 साल की सभी महिलाओं (माहवारी होने की उम्र की महिलाओं) को मंदिर में प्रवेश करने की इजाज़त दी थी.

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केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने बार-बार कहा है कि राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को लेकर समीक्षा याचिका दायर नहीं करेगी, यहां तक कि कोर्ट के आदेश को लागू करने के लिए समय की मांग भी नहीं करेगी क्योंकि सरकार ने ही हलफ़नामा दायर किया था कि वो सबरीमला मंदिर में हर उम्र की महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में है.

एशियानेट टेलीविज़न नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ़ और राजनीतिक विश्लेषक एम.जी. राधाकृष्णन कहते हैं, "सरकार कम से कम (कोर्ट के फ़ैसले का विरोध कर रहे) विभिन्न संगठनों से बात कर सकती थी. वो इससे और अधिक कुशलता से निपट सकती थी."

"वो केरल की पुलेयार महासभा (सबसे बड़ा दलित सगंठन) के एक वर्ग को को बातचीत में शामिल कर सकती थी जो भाजपा से अलग हो गया था. उनके पास भाजपा का मुक़ाबला करने के लिए कोई राजनीतिक रणनीति नहीं थी."

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'अलग लकीर पर होता है मतदान'

किसी भी विश्लेषक को इसमें शक नहीं है कि भाजपा को केरल में सबरीमला मंदिर के मुद्दे से फ़ायदा पहुंचा है. लेकिन, क्या यह मुद्दा पार्टी के वोट बैंक में भी तब्दील होगा?

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक बी.आर.पी. भास्कर कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि भाजपा को इससे वैसी मदद मिलेगी जैसा वो सोचती है. उन्हें लगता है कि यहां वो त्रिपुरा की तरह कुछ कर सकते हैं. लेकिन, ऐसा यहां नहीं हो सकेगा क्योंकि केरल में आंदोलन से हट कर मतदान अलग लकीर पर होता है."

2011 में 8.98 फ़ीसदी की तुलना में 2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का वोट शेयर 15.20 फ़ीसदी हो गया है. पार्टी ने विधानसभा में एक सीट भी जीती. हिंदुओं को एकजुट करने की उसकी कोशिश नाकाम हुई क्योंकि उसने जाति को अपना आधार बनाया जो राजनीति के पटल पर विपरीत दिशा में मौजूद गुटों को साथ लाने के समान था.

एम.जी. राधाकृष्णन कहते हैं, "ऐसा लगता है कि केरल में धर्मनिरपेक्षता को बचाने के लिए हिंदू जाति व्यवस्था मदद कर रही है."

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पार्टी के चेहरे यानी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चलाए गए बड़े अभियान के बाद पार्टी ने यहां एक सीट से अपना खाता खोला. हालांकि इसमें भी पार्टी के वरिष्ठ नेता ओ. राजगोपाल के लिए सहानुभूति फैक्टर का योगदान अधिक था जो पहले कई बार हार चुके थे.

यह सर्वविदित है कि केरल में राजनीतिक पार्टियों की सामाजिक उपस्थिति बहुत संकीर्ण है. और कई जाति समूह खुल कर भाजपा के समर्थन में आए हैं.

एम.जी. राधाकृष्णन कहते हैं, "भाजपा को निश्चित रूप से फ़ायदा पहुंचा है. लोगों का रुझान कांग्रेस हट कर से भाजपा की तरफ हुआ है. लेकिन इनमें से कितने लोग भाजपा के लिए वोट करेंगे यह तय करना मुश्किल है. लेकिन, राजनीतिक बदलाव इसी तरह होते हैं. और ऐसा हुआ तो कांग्रेस हार सकती है."

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वोटर किसके पक्ष में जाएगा?

लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि आने वाले वक्त में यहां राजनीति दिलचस्प हो सकती है.

बी.आर.पी. भास्कर कहते हैं कि अगस्त में आई बाढ़ से राज्य कठिन परिस्थितियों में पहुंच गया था. वो कहते हैं, "उस दौरान सभी अपनी जाति भूल कर एक साथ काम करने के लिए आगे आए. ऐसा महसूस हुआ कि केरल में एक बार फिर नवचेतना जागृत हुई. इसके बाद सबरीमला मामला आया. लेकिन इन सभी सामाजिक विकास की बातों के के बीच - जिनपर केरल गर्व करता आया था - यह दिखने लगा कि एक मजबूत धार्मिक भावना भी कहीं मौजूद थी."

लेकिन इस रुझान के बावजूद यहां ये देखने को मिलता है कि उत्तर भारतीय राज्यों के विपरीत, भगवान राम को लेकर दक्षिण भारतीय राज्यों में अधिक खिंचाव नहीं है. इसी नाम के रथ पर सवार हो सर नब्बे के दशक में भाजपा सत्ता के दरवाज़े तक पहुंची थी.

भाजपा के एक नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा, "हम पार्टी के नए सदस्य बनाने के लिए नहीं निकले हैं. लेकिन, इसका नतीजा अब केवल चुनाव में दिखेगा."

राज्य में विधानसभा चुनाव तीन साल बाद होने हैं और लोकसभा चुनाव छह महीने बाद हैं. सवाल यह है कि क्या बीते पांच दिनों के दौरान बनी स्थिति को भाजपा बरकरार रखने में कामयाब होगी?

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