राजस्थान का सट्टा बाज़ार, जहां लगती है जीत हार की बाज़ी

  • 27 नवंबर 2018
राजस्थान में कांग्रेस या बीजेपी इमेज कॉपीरइट Getty Images

राजस्थान के बियाबान रेगिस्तान में बसा ये क़स्बा वैसे तो उनींदा-सा नज़र आता है. लेकिन फलौदी में दाख़िल होते ही उसकी जीवंतता और जीवटता के दर्शन हो जाते हैं.

क़स्बे की पुरानी इमारतें वास्तुकला में उसकी समृद्धि की गवाही देती नज़र आती हैं. 15वीं सदी में बने हमीर सिंह के महल के अलावा ये गांव कई मंदिरो के लिए भी जाना जाता है.

साथ ही ये प्रवासी पक्षी कुर्जा के लिए भी जाना जाता है जो सर्दी के दिनों में यहां से नज़दीक खिचन नाम के एक गांव में मौसम का मज़ा लेने आती हैं.

राजधानी जयपुर के पश्चिम में मौजूद फलौदी चुनावी सट्टे की वजह से भी सुर्ख़ियों में रहता है. इस वक़्त सट्टे की वजह से यहां के बाज़ार में ख़ूब गहमागहमी रहती है.

और यहां के सट्टा बाज़ार की बात करें तो शुरुआती दौर में ये कांग्रेस की बढ़त बता रहा था. मगर जानकार कहते हैं कि उम्मीदवारों की घोषणा के बाद अब नए सिरे से मुनादी की जाएगी.

क़स्बे के मुख्य बाज़ार में बने चौक में सुबह 11 बजे से लोग जमा होने शुरू होते हैं और देर रात तक मजमा लगा रहता है.

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'चुनावी आकलन सही साबित होता है'

यह मजमा ऐसा दृश्य प्रस्तुत करता है मानो चुनावी विश्लेषकों का कोई हुजूम समीक्षा कर रहा हो. सट्टा ग़ैर-क़ानूनी है, लेकिन सामाजिक तौर पर इसे ग़लत नहीं माना जाता.

इसलिए सब कुछ ज़ुबानी और एक दूसरे के भरोसे पर चलता है. इस क़स्बे की आबादी कोई पचास हज़ार है.

क़स्बे में सट्टे के कारोबार के एक जानकार ने बताया कि कुल 20-22 लोग सट्टे के कारोबारी हैं जो सट्टे का आयोजन करते हैं. इसके बाद कुछ सट्टा लगाने वाले होते हैं. वो बताते हैं कि इस सट्टे के कारोबार में दलाल, लगाइवाल (सट्टा लगाने वाला) और खाइवाल (सट्टे पर पैसे लगाने वाला) तीन कड़ियां होती हैं.

फलौदी में सट्टे के जानकार कहते हैं कि सट्टा बाज़ार का चुनावी आकलन क़रीब-क़रीब सही साबित होता है.

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इसके लिए सट्टेबाज़ अख़बारों और टीवी चैनल की ख़बरों पर नज़र रखते हैं. इसके साथ वो अलग-अलग इलाक़ों में फ़ोन कर लोगों की नब्ज़ टटोलते हैं और राजनीतिक दलों के आंतरिक समीकरणों को देखकर आकलन करते हैं.

यहाँ चार तरह का सट्टा लगता है. इनमें बारिश, क्रिकेट, चुनाव और अंकों का सट्टा शामिल है.

फलौदी के पंडित रामदयाल बोहरा ने बीबीसी से बताया कि फलौदी में सट्टे का कारोबार कोई नया नहीं है. आज़ादी से पहले यहां रुई की तेज़ी या मंदी पर सट्टा लगता था.

उनका दावा है कि यहां चुनावी सट्टा देश में पहले चुनावों के साथ ही शुरू हो गया था.

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भौगोलिक स्थिति

फलौदी थार मरुस्थल में जटिल भौगोलिक स्थिति वाले स्थान पर बसा है. गर्मी की तपिश में अधिकतम और सर्दी में न्यूनतम तापमान के कारण भी फलौदी ख़बरों में रहता है.

मौसम विज्ञानी इसके तापमान पर नज़र रखते हैं, जबकि क़स्बे के सट्टेबाज़ सियासी तापक्रम पर निगाह रखते हैं.

फलौदी के कुछ लोगों ने बीबीसी से कहा कि उन्हें यह ठीक नहीं लगता कि कोई सिर्फ़ सट्टे की वजह से उनके क़स्बे को जाने.

वो कहते हैं कि फलौदी को नमक उत्पादन के कारण सॉल्ट सिटी भी कहा जाता है. रियासती काल में यहाँ रेगिस्तान से गुज़रने वाले क़ाफ़िले और कारवां रुकते थे.

इसलिए फलौदी के बाशिंदों में कारोबारी निपुणता भी है. क़स्बे के अनेक लोग मुंबई ,चेन्नई और कोलकता जैसे बड़े शहरों में आबाद हैं और उद्योग व्यापार जगत में अच्छा नाम कमा रहे हैं. कुछ विदेशों में भी हैं.

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फलौदी सीट पर नहीं लगेगा सट्टा

कोई 50 से 60 साल पुराने फलौदी में सूर्योदय से पहले बाज़ार में ताज़ा फल-सब्ज़ी बिकने आती है और मंडी लगती है.

मगर दिन शुरू होने के बाद धीरे-धीरे सट्टे के कारोबारी जमा होने लगते हैं. अगर किसी पार्टी या उम्मीदवार के लिए ज़्यादा रुपयों का सट्टा लगे तो इसका मतलब है उसकी हालत पतली है.

कम पैसे की बोली लगे तो जीत की संभावना प्रबल समझी जाती है. इस बार सट्टेबाज़ विधानसभा की फलौदी सीट पर सट्टा नहीं करेंगे, क्योंकि वहां का एक स्थानीय व्यक्ति कांग्रेस से प्रत्याशी हैं.

सट्टेबाज़ों के मुताबिक़, निष्पक्षता बनाए रखने के लिए फलौदी की सीट पर सात दिसबंर तक कोई सट्टा नहीं लगाएगा.

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फलौदी के एक स्थानीय व्यक्ति ने कहा कि सट्टा यहाँ ऐसा चस्का है कि कुछ और नहीं तो चप्पल उछाल कर भी सट्टा लग जायेगा कि चपल उल्टी गिरेगी या सीधे मुंह.

बताया जाता है कि कभी फलौदी का नाम फलवृद्धिका था. क़स्बे में मौजूद क़िला इसके प्रभावी अतीत की गाथा बयान करता है.

इसी क़िले में वीरानी ओढ़े बैठे एक महल के बारे में स्थानीय लोग कहते है कि कभी मुग़ल बादशाह हुमायूं ने संकट के समय इसमें पनाह ली थी.

अब फलौदी नूतन और पुरातन का समागम है, जहां ये क़स्बा न उदासी लेता है न उबासी.

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