नज़रिया: ...तो अतिपिछड़ों को अब न्याय नहीं दिलाएगी सरकार

  • 24 नवंबर 2018
ओबीसी रिज़र्वेशन के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन इमेज कॉपीरइट Getty Images

सब कुछ बहुत शानदार तरीके से शुरू हुआ. 2 अक्टूबर, 2017 यानी गांधी जयंती यानी आख़िरी आदमी तक न्याय पहुंचाने के वचन को दोहराने का दिन.

वंचितों का भला करने का सरकार का घोषित इरादा और देश के शिखर पर एक ऐसे प्रधानमंत्री जो बार-बार कहते हैं कि वे पिछड़ी मां के बेटे हैं. ओबीसी हैं, वंचितों के हमदर्द हैं.

इसी दिन अर्थात 2 अक्टूबर, 2017 को केंद्र सरकार ने एक अधिसूचना जारी करके एक आयोग बनाने की घोषणा की. सरकार ने उसे तीन काम सौंपे.

एक, ओबीसी के अंदर विभिन्न जातियों और समुदायों को आरक्षण का लाभ कितने असमान तरीके से मिला, इसकी जांच करना. दो, ओबीसी के बंटवारे के लिए तरीका, आधार और मानदंड तय करना; और तीन, ओबीसी को उपवर्गों में बांटने के लिए उनकी पहचान करना.

इस आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए 12 हफ्ते का समय दिया गया. इससे पता चलता है कि सरकार इस काम को कितनी तेजी से पूरा करना चाहती थी. इस आयोग की अध्यक्षता पूर्व न्यायाधीश जी. रोहिणी को सौंपी गई. (पढ़िए सरकार का फैसला)

क्यों महत्वपूर्ण है रोहिणी आयोग?

इस आयोग का गठन किसी प्रशासनिक आदेश के तहत न करके संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत किया गया.

ये बात कितनी महत्वपूर्ण है इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि अब तक इस अनुच्छेद के तहत दो ही आयोग बने हैं. उनमें से एक आयोग का नाम मंडल कमीशन है, जिसकी रिपोर्ट के आधार पर देश की 52 फीसदी आबादी को केंद्र सरकार की नौकरियों और उच्च शिक्षा में 27 फीसदी आरक्षण दिया जाता है.

इससे पहले इसी अनुच्छेद के तहत पहला पिछड़ा वर्ग आयोग यानी काका कालेलकर आयोग बना था.

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रोहिणी आयोग को बनाने के पीछे तर्क यह है कि ओबीसी एक बड़ा वर्ग है जिसके अंदर हजारों जातियां हैं. वे जातियां सामाजिक विकास के क्रम में अलग-अलग स्थान पर हैं. इनमें से कुछ जातियां आरक्षण के प्रावधानों का इस्तेमाल करने के लिए बेहतर स्थिति में है. जबकि कुछ जातियां आरक्षण के लाभ से वंचित रह जाती हैं.

इसी तर्क के आधार पर देश के सात राज्य पिछड़ी जातियों को एक से ज्यादा समूहों में बांटकर आरक्षण लागू करते हैं. इन राज्यों में बिहार, हरियाणा, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और पुदुच्चेरी शामिल है.

इस वजह से जब केंद्र सरकार ने ओबीसी की केंद्रीय सूची में बंटवारे की पहल की तो अतिपिछड़ी जातियों में यह उम्मीद जगी कि केंद्र सरकार की नौकरियों और उच्च शिक्षा में उनके लिए मौके खुलेंगे.

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समय बढ़ायापर रिपोर्ट नहीं आई

आयोग के गठन के 13 महीने बाद अब वे उम्मीदें चकनाचूर हो चुकी हैं. केंद्रीय कैबिनेट ने 22 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई बैठक में ये फ़ैसला किया कि इस आयोग को अपना काम पूरा करने के लिए और समय दिया जाए.

अब उसे 31 मई, 2019 से पहले अपनी रिपोर्ट देनी है. नरेंद्र मोदी सरकार का कार्यकाल 26 मई, 2019 को खत्म हो रहा है.

यानी वर्तमान सरकार ने रोहिणी आयोग की रिपोर्ट और उस पर फ़ैसला करने के दायित्व को अगली सरकार के लिए टाल दिया है.

इस आयोग का कार्यकाल दरअसल चौथी बार बढ़ाया गया. यह आश्चर्यजनक है क्योंकि जिस आयोग से उम्मीद थी कि वह अपना काम 12 हफ्ते में पूरा कर लेगा, वह आयोग 13 महीने में भी अपनी रिपोर्ट नहीं दे पाया.

ऐसा क्यों हुआ होगा इसका सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है क्योंकि जब भी इस आयोग का कार्यकाल बढ़ाया गया तो इसके लिए हर बार यही कारण बताया गया कि आयोग को और जानकारियां चाहिए, और आंकड़े चाहिए, और बैठकें करनी हैं.

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Image caption गुजरात के ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर

दोधारी तलवार है ओबीसी का बंटवारा

क्या आयोग के गठन के समय सरकार को इस बात का अंदाजा नहीं था कि ओबीसी के वर्गीकरण के लिए आंकड़ों की जरूरत होगी? सवाल ये भी है कि क्या अगले छह महीने में आयोग के पास आंकड़े आ जाएंगे?

जातिवार जनगणना के आंकड़ों के बिना ये आयोग कैसे तय करेगा कि कोई जाति अपनी संख्या के अनुपात में ज्यादा सरकारी नौकरियां हासिल कर चुकी हैं और कौन सी जातियां ऐसी हैं, जो वंचित रह गई हैं?

सरकार ने राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में मान लिया है कि सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना 2011 (एसईसीसी2011) के आंकड़ों की जांच करने के लिए जिस कमेटी का गठन होना था, वह कमेटी बन ही नहीं पाई.

इस कमेटी के अध्यक्ष नीति आयोग के तत्कालीन उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया पढ़ाने के लिए कोलंबिया यूनिवर्सिटी लौट चुके हैं. इसलिए तय है कि इस जनगणना की रिपोर्ट नहीं आएगी और रोहिणी कमीशन को आगे भी बिना आंकड़ों के ही काम करना पड़ेगा.

ये तो वे बातें हैं, जो हम जानते हैं. जो बात हम नहीं जानते वो यह कि जब सरकार एक साल पहले इतने उत्साह से ओबीसी का बंटवारा करने चली थी, तो उसके पांव अचानक ठिठक क्यों गए?

दरअसल ओबीसी का बंटवारा राजनीतिक तौर पर दोधारी तलवार है. जिन राज्यों में ये बंटवारा पहले से है, वहां इसे लेकर राजनीति स्थिर हो चुकी है.

मिसाल के तौर पर बिहार में मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने 1978 में जब पिछड़ी जातियों को आरक्षण देने का फैसला किया तो उन्हें दो वर्गों में बांटकर ही इसे लागू किया. इसलिए बिहार में अब यह कोई मुद्दा नहीं है.

लालू प्रसाद और राबड़ी देवी ने अपने कार्यकाल में अति पिछड़ों का आरक्षण और बढ़ा दिया क्योंकि झारखंड के अलग होने के बाद अनुसूचित जाति का आरक्षण घटकर एक फीसदी ही रह गया है.

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Image caption कर्पूरी ठाकुर

लेकिन इसी तरह का बंटवारा जब राजनाथ सिंह सरकार ने उत्तर प्रदेश में करने की कोशिश की तो राजनीतिक भूचाल आ गया और उनकी कैबिनेट में ही विद्रोह हो गया. उनकी सरकार के एक मंत्री अशोक यादव इसके ख़िलाफ़ कोर्ट चले गए. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट तक ये केस लड़ा और बंटवारे का फ़ैसला निरस्त हो गया.

जब कभी राजनीतिक मकसद से ओबीसी का बंटवारा करने की कोशिश होगी, उसके राजनीतिक परिणाम होंगे और पक्ष और विपक्ष में गोलबंदी होगी.

अगर ऐसा बंटवारा न्याय और ज़्यादा जरूरतमंदों को हिस्सा देने के मकसद से किया जाए, तभी तमाम तबकों की सहमति मिल पाती है. सात राज्यों में लागू पिछड़ी जातियों का विभाजन इसका प्रमाण है.

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ओबीसी का बंटवारा करने के लिए आयोग बनाने के बाद मुमकिन है कि बीजेपी को ये लगा हो कि ओबीसी की प्रभावशाली जातियां इससे नाराज हो जाएंगी. ये जातियां बीजेपी की भी वोटर हैं.

यहां तक कि बिहार और यूपी के अलावा बाकी राज्यों में यादव जाति बीजेपी के खिलाफ नहीं है. बिहार और यूपी में भी यादवों का एक हिस्सा बीजेपी को वोट करता है और बीजेपी के पास इस जाति के कई नेता हैं.

कुर्मी या सुनार या कुशवाहा या लोध या कुछ राज्यों में पिछड़ी जाति में शामिल जाटों को अगर अलग कटेगरी में डाल दिया जाए तो उनका राजनीतिक व्यवहार किस तरह से बदलेगा, इसे लेकर सिर्फ अनुमान लगाया जा सकता है. बीजेपी को शायद ये लगा हो कि ये जातियां इस बंटवारे को पसंद नहीं करेंगी.

कारण चाहे जो भी हो, अति पिछड़ों को न्याय दिलाने का बीजेपी का उत्साह अब खत्म हो चुका है. सामाजिक क्षेत्र में उसकी एक बड़ी पहल अब विश्राम कर रही है.

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(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)

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