अलवर में ट्रेन के आगे छलांग लगाकर 'सामूहिक आत्महत्या' का क्या है सच: ग्राउंड रिपोर्ट

  • 24 नवंबर 2018
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ग्राउंड रिपोर्टः अलवर में युवाओं के 'सामूहिक आत्‍महत्‍या' के दिन क्या हुआ था?

20 नवंबर को रात के साढे ग्यारह बजे छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाक़े कोंडा में एक फ़ोन बजा.

सशस्त्र सीमा बल के इस कैंप में जवान नेमचंद मीणा थोड़ी गहरी नींद में थे इसलिए उनसे कॉल मिस हो गई.

दूसरी कॉल पर आँख खुली और जो ख़बर सुनी तो सीधे कैंप अफ़सर के घर की तरफ़ भागे.

अलवर, राजस्थान से मँझले भाई का फ़ोन आया था, "हमारा भाई सत्यनारायण अब इस दुनिया में नहीं रहा. बाबूजी को घर पर नहीं बताया है लेकिन कुछ देर पहले उसका शव ट्रेन की पटरियों से बरामद हुआ है. बड़ी मुश्किल से पहचान हो सकी है."

छत्तीसगढ़ के इस इलाक़े में रात के वक़्त सुरक्षाबलों के सफ़र पर भी पाबंदी रहती है, इसलिए नेमचंद ने खुली आँखों से ही पौ फटने का इंतज़ार किया और चार बजे जबलपुर, आगरा और दौसा होते हुए 24 घंटे बाद घर पहुँचे.

उसी रात अलवर ज़िले के बहड़को गाँव में रहने वाले राजस्थान पुलिस के हेड-कांस्टेबल बाबूलाल मीणा के घर भी अलवर के एक निजी अस्पताल से फ़ोन आया, "आपका बेटा ऋतुराज गंभीर हालत में है, जल्दी पहुँचो."

बाबूलाल मीणा फ़ोन रख, पत्नी के साथ घर से निकले ही थे कि अलवर के ही एक पुलिस थाने से फ़ोन आया और उन्हें वहाँ पहुँचने के लिए कहा गया.

इसी तरह के फ़ोन दो और युवकों, मनोज मीणा और अभिषेक मीणा, के घर भी गए.

अगले डेढ़ घंटे बाद सत्यनारायण, ऋतुराज और मनोज मीणा के घरवाले उनके शवों के किनारे खड़े दहाड़ें मार रो रहे थे और अभिषेक के घर वाले, पुलिस के साथ, एक एंबुलेंस में गम्भीर रूप से घायल इस युवक को लेकर राजधानी जयपुर के रास्ते में थे.

Image caption अलवर का रेलवे स्टेशन

ट्रेन के आगे लगाई छलांग

दरअसल, 20 नवंबर की शाम इन चारों युवकों- जिनकी आयु 17 वर्ष से 24 वर्ष के बीच की थी- ने अलवर रेलवे स्टेशन से गुजरने वाली जयपुर-चंडीगढ़ एक्सप्रेस के सामने छलाँग लगा दी थी.

लेकिन उस रात ये अकेले नहीं थे और इनके दो और साथी राहुल और संतोष में इनके साथ थे.

इन सभी लोगों ने कथित तौर से आपस में एक-दूसरे को फोन कर पटरियों पर बुलाया था जहाँ वे अक्सर जाया करते थे.

हादसे के दूसरे दिन पुलिस से हुई पूछताछ में राहुल ने बताया, "सभी मस्ती कर रहे थे, वो लोग हंस भी रहे थे, इतनी सीरियस बात भी नहीं थी. वो बोल रहे थे हम तो मरेंगे, तू भी हमारे साथ मरेगा. मैं मना कर रहा था कि यार ऐसा नहीं करेंगे. एक ने कहा कि मुझे सिगरेट दे भाई, मैंने सिगरेट दी...उस समय दूसरी तरफ़ से ट्रेन आ रही थी. फिर वो चारों ट्रेन के सामने कूद गए."

यह पूछने पर कि आख़िर चारों ट्रेन के सामने क्यों कूदे, राहुल ने कहा, "वो लोग कह रहे थे कि यार ज़िन्दगी में नौकरी-वौकरी तो मिलेगी नहीं, इसलिए जीने से कोई फ़ायदा नहीं."

राहुल के इस बयान के तुरंत बाद देश में ये ख़बर आग की तरह फैली कि, "अलवर में तीन युवकों ने बेरोज़गारी के चलते आत्महत्या कर ली".

ख़बर फैलने की वजह भी पूरी तरह बेबुनियाद नहीं थी.

राहुल जैसे चश्मदीद ने मीडिया को बयान दिया था.

Image caption अभिषेक मीणा (फाइल फ़ोटो)

क्या है हक़ीक़त?

ट्रेन के सामने कथित तौर से छलाँग लगाने वाले सभी युवक अलवर में किराए के कमरों में रह कर पढ़ाई कर रहे थे और उनमें से कुछ परीक्षाओं में बैठ असफल भी रहे थे.

सबसे अहम बात ये कि राजस्थान में विधानसभा चुनाव सिर पर हैं और बेरोज़गारी और किसानों की नाराज़गी एक बड़ा मुद्दा रहा है.

लेकिन इस सब के बीच हक़ीक़त कुछ और ही नज़र आती है.

हादसे के दूसरे दिन जब हम सत्यनारायण मीणा के गाँव बुजपुरी पहुँचे तो वहाँ मातम मन रहा था. गाँव की औरतें और रिश्तेदारों के अलावा रुदालियाँ भी मौजूद थीं.

बड़े भाई नेमचंद का हाल बुरा था और बस यही कह रहे थे कि, "मेरा तो एटीएम कार्ड तक उसके पास रहता था, फिर भला क्यों जान देता वो बेरोज़गारी और तंगी की वजह से."

उन्होंने कहा, "लोग बोलते हैं नौकरी की वजह से आत्महत्या की है लेकिन ये नहीं हो सकता. मैंने नौकरी का दबाव कभी नहीं डाला. साठ हज़ार रुपए की मोटरसाइकिल ख़रीदवाई थी उसे. उसमें से एक 17 साल का लड़का था, अब इस उम्र में नौकरी का कहाँ और किसे पता होता है."

Image caption नेमचंद मीणा

कैसी है पारिवारिक हालत?

सत्यनारायण के परिवार के पास कई बीघे की खेती है और गाँव के सम्पन्न लोगों में उनकी गिनती होती है.

उनके घर से पौन घंटे की दूरी पर है 17 साल के ऋतुराज मीणा का घर जो बीए प्रथम वर्ष के छात्र थे.

बहड़को नाम के इस गाँव का सबसे आलीशान घर ऋतुराज का है जिसके सामने उनके तीन बीघा खेत हैं.

पाँच बेडरूम वाले इस बंगले के बाहर लॉन है जहाँ ऋतुराज का पालतू लैब्रडोर कुत्ता नम आँखों से भीगा मिला.

ऋतुराज के एकमात्र बड़े भाई की मानसिक हालत बचपन से बिगड़ी रही है और सिर्फ़ एक बहन है जिसकी शादी होनी है. पिता बाबूलाल मीणा राजस्थान पुलिस में हैं लेकिन 12 साल पहले ड्यूटी पर हुए एक एक्सिडेंट में दोनो घुटने गँवा चुके हैं.

उन्होंने बताया, "उस दिन हमारी बात भी हुई थी, मैंने पूछा पैसे की कोई ज़रूरत तो नहीं. उसने कहा बिलकुल नहीं मैं दो दिन बाद घर आ रहा हूँ. उसको सिर्फ़ अच्छा खाने और अच्छा पहनने का शौक़ था. मैं ख़ुद उसे 70 हज़ार रुपए का आइफ़ोन दिलाकर आया था. उसके कमरे का किराया 6 हज़ार रुपए था. आप ही बताइए वो बेरोज़गारी के नाम पर आत्महत्या क्यों करेगा भला?"

दो और युवक मनोज और अभिषेक भी इसी इलाक़े के रहने वाले हैं और कमोबेश सभी सम्पन्न परिवारों से निकलकर अलवर में पढ़ाई करने गए थे.

जिन युवकों की मौत हुई वे राजस्थान के मीणा समुदाय से थे जो अलवर और संवाई माधोपुर इलाक़े में ख़ासी बड़ी तादाद में हैं.

मीणा समुदाय को सरकारी नौकरियों में आरक्षण भी मिला हुआ है.

Image caption ऋतुराज के घर पर विलाप करती महिलाएं

फिर आत्महत्या की वजह क्या?

सवाल ये उठ रहा है कि इन युवकों की चलती ट्रेन के सामने आ जाने की वजह अगर बेरोज़गारी नहीं तो फिर क्या हो सकती है.

बीबीसी ने अलवर ज़िले के पुलिस अधीक्षक राजेंद्र सिंह से बात की तो उन्होंने 'बेरोज़गारी की वजह से आत्महत्या करने' वाली बात को ख़ारिज कर दिया.

राजेंद्र सिंह ने कहा, "ये बात सही है और जाँच में ये सामने भी आया है कि ये लोग आपस में आत्महत्या करने की बात कर रहे थे. लेकिन फ़िलहाल ये नहीं कहा जा सकता कि बेरोज़गारी उसकी वजह थी. हम लोग इनके कॉल रिकार्ड्स वग़ैरह की भी जाँच कर रहे हैं और मामले की तह तक ज़रूर पहुँचेंगे".

लेकिन अपने आप में अनोखी इस "सामूहिक आत्महत्या" की घटना के पीछे की असल वजह बताने वाला, अभिषेक मीणा, गम्भीर हालत में जयपुर के एक अस्पताल में भर्ती थे लेकिन शुक्रवार की रात को उनकी भी मौत हो गई. इसके साथ ही 'सामूहिक आत्महत्या' की यह गुत्थी और उलझ गई है.

राहुल और संतोष मीणा के जवाबों से पुलिस अभी संतुष्ट नहीं दिख रही है. दोनों फ़िलहाल किसी अज्ञात लोकेशन पर हैं और उनके मोबाइल फ़ोन बंद हैं.

अलवर के एक थाने में सत्यनारायण और ऋतुराज मीणा के ख़िलाफ़ मारपीट का एक मामला भी दर्ज है. दोनों के परिजनों के मुताबिक़ उन्हें इसकी जानकारी बिलकुल नहीं थी.

सभी के परिवारों ने दबे स्वर में ही सही, लेकिन ग़लत संगत होने की आशंका ज़रूर जताई है.

ऋतुराज के पिता बाबूलाल मीणा ने खुल कर कहा, "भोला था मेरा बेटा और ग़लत संगत खा गई उसे."

Image caption बाबूलाल मीणा

अभिषेक मीणा के एक रिश्तेदार ने नाम न लेने की शर्त पर बताया, "अलवर जाकर पढ़ने के बजाय ग़लत संगत में पड़ गया था वो. इसलिए परीक्षाओं की तैयारी के लिए उसे जयपुर भेजा गया था".

ज़ाहिर है इस तरह की बातों के बीच ये कहना शायद थोड़ी जल्दबाज़ी होगी कि तीनों युवकों ने आत्महत्या बेरोज़गारी की वजह से की.

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