राजस्थान विधानसभा चुनाव: 'पैराशूट उम्मीदवार' कैसे बनते हैं नेता

  • 25 नवंबर 2018
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राजस्थान के प्रशासनिक इतिहास में हरीश मीणा का नाम लिया जाता है. वे सबसे लंबे समय तक राजस्थान के डीजीपी या पुलिस प्रमुख रहे थे.

प्रदेश में ये दौर अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार का था और भाजपा की वसुंधरा राजे के सत्ता संभालते ही उन्हें इस पद से 'खिसका' दिया गया था.

प्रदेश में लोग हक्का-बक्का तब रह गए जब इन्हीं हरीश मीणा को वसुंधरा की भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के आम चुनावों के लिए दौसा की सुरक्षित सीट से टिकट थमा दिया.

यहाँ इनकी भिड़ंत अपने ही बड़े भाई और कांग्रेस के पूर्व मंत्री नमो नारायण मीणा से थी.

हरीश मीणा चुनाव जीते, लेकिन साढ़े चार साल में ही उन्होंने क़यासों को फिर हवा दे दी जब विधानसभा चुनाव के ठीक पहले वे अशोक गहलोत और सचिन पायलट की मौजूदगी में दोबारा कांग्रेस का दामन थाम बैठे.

ये सिर्फ़ एक मिसाल है और ऐसी दर्जनों का सामना राजस्थान की उस जनता को करना पड़ रहा है जिसे दो हफ़्ते के भीतर मतदान करना है.

प्रदेश की 200 विधानसभा सीटों के लिए 7 दिसंबर को मत डाले जाएँगे और कई सीटों पर दूसरी पार्टी के उम्मीदवारों ने पाला बदल रखा है.

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चुनाव से पहले बदली पार्टी

कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ने कुल मिलाकर 10 से भी ज़्यादा उम्मीदवार ऐसे उतारे हैं जिन्हें 'पैराशूट कैंडिडेट' बताया गया है. यानी चुनाव के ठीक पहले दूसरे खेमे में जा उतरने का निर्णय.

शुरुआत प्रदेश और केंद्र में सत्ताधारी भाजपा से करते हैं जिसने सात ऐसे उम्मीदवार उतारे हैं जिनमें से छह कांग्रेस छोड़ आए हैं और एक बहुजन समाज पार्टी से.

राज्य की राजनीति की बात हो तो इसमें नाथद्वारा से महेश प्रताप सिंह, झुंझुनू से राजेंद्र भामू और राजखेड़ा से अशोक शर्मा जैसे बड़े नाम भी हैं.

जयपुर में भाजपा कार्यालय के सामने मिले अमित शर्मा (नाम बदला हुआ) पिछले तीन चुनावों से भाजपा के वोटर हैं और सरकारी नौकर भी हैं.

उन्होंने कहा, "इस बार मैं शायद अपनी पार्टी को वोट इसलिए न डालूँ क्योंकि यहाँ भी वही हो रहा है जो कांग्रेस में 50 साल से होता आया है. आज पार्टी टूटेगी, कोई इधर जाएगा, कोई उधर. फिर सब एक छतरी के नीचे आकर कहेंगे, हमारे दिल हमेशा एक ही थे".

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी पिछले कई वर्षों में दोहराते रहे हैं कि पार्टी के लिए उसके कार्यकर्ता सबसे अहम हैं और वे दल-बदल की राजनीति में यक़ीन नहीं रखते.

जयपुर में कुछ हफ़्ते पहले एक दिलचस्प बात हुई जो शायद भाजपा अध्यक्ष तक भी पहुँची ही होगी.

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Image caption मानवेंद्र सिंह

कांग्रेस की पूर्व सरकार में मंत्री रहे रामकिशोर सैनी इसी महीने भाजपा में शामिल हो गए.

पिछले 28 वर्षों में सैनी ने भाजपा और कांग्रेस के अलावा बतौर निर्दलीय भी चुनाव लड़ा है और उनके भाजपा में फिर लौटने का विरोध ख़ुद पार्टी कार्यकर्ताओं ने पार्टी दफ़्तर के बाहर किया.

ख़बरों के मुताबिक़ एक व्यक्ति ने वहीं पर पेड़ से लटक कर फाँसी लगाने की भी नाकाम कोशिश की और उन्हें बाद में हिरासत में ले लिया गया.

मानवेन्द्र सिंह की एंट्री

प्रदेश में फ़िलहाल सत्ता से बाहर चल रही कांग्रेस की भी कथनी और करनी में फ़र्क़ साफ़ दिखता है.

पार्टी ने चार ऐसे लोगों की टिकट थमा रखा है जो दूसरे खेमे से आए हैं. ख़ास बात ये है कि भाजपा छोड़ने के तुरंत बाद ही हरीश मीणा और मानवेन्द्र सिंह- भाजपा के दिग्गज नेता और केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह के बेटे- जैसे लोगों को उम्मीदवार घोषित कर दिया गया.

मानवेन्द्र सिंह का दावा कि उन्होंने पार्टी इसलिए छोड़ी क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान अपने पिता के साथ हुए पार्टी के व्यवहार से आहत हैं.

ये गले के नीचे थोड़ी मुश्किल से उतरता है क्योंकि इसके लिए उन्हें इतने साल चुप रहने की क्या ज़रूरत पड़ी?

ज़ाहिर है, दोनों ही खेमों में ये 'पैराशूट कैंडिडेट' टिकट की बात पक्की कर के ही आए होंगे.

Image caption सचिन पायलट

'राजनीतिक दल आख़िरी मिनट तक मुकर सकते हैं'

जब राजस्थान में कांग्रेस प्रमुख सचिन पायलट से ये सवाल पूछा गया तो उन्होंने इसे "आलाकमान का निर्णय" बताकर टाल सा दिया. वैसे ख़ुद राहुल गांधी भी प्रचार के दौरान दोहरा चुके हैं, "बाहरी उम्मीदवारों से पहले, पार्टी के लोगों को प्राथमिकता दी जाएगी".

लेकिन कई दूसरे राज्यों की तरह और भारतीय राजनीति में रम से चुके इन 'पैराशूट उम्मीदवारों' के चलन ने 2018 के विधानसभा चुनावों में राजस्थान को नहीं छोड़ा है.

वरिष्ठ पत्रकार अजय सिंह के मुताबिक़ "ऐसा लगता है कि इस मसले पर बात करना बेमानी हो चुका है. आप कुछ भी लिख, कह या सुन लीजिए, भारतीय राजनीतिक पार्टियाँ आख़िरी मिनट तक जीत के लिए अपनी बात से मुकर सकती हैं".

ब्रिटेन के पूर्व मंत्री विंस्टन चर्चिल ने शायद ठीक ही कहा था, "राजनीति, जंग से भी ज़्यादा ख़तरनाक है...जंग में आपको एक ही बार मारा जा सकता है. राजनीति में कई दफ़ा."

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