प्रभाकरन ने उन्हीं को मरवा डाला जिन्होंने उन्हें बुलेटप्रूफ़ जैकेट दी

  • 26 नवंबर 2018
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प्रभाकरन कुछ लोगों के लिए स्वतंत्रता सेनानी थे, तो कुछ लोगों के लिए क्रूर चरमपंथी.

जिस शख़्स को एक राष्ट्राध्यक्ष और एक पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या, श्रीलंका के एक और राष्ट्रपति की हत्या का प्रयास, सैकड़ों राजनीतिक हत्याओं, पच्चीसियों आत्मघाती हमलों, हज़ारों लोगों और सैनिकों की मौत का ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है, उसके लिए एक बात तो आँख मूंद कर कही जा सकती है कि वो निहायत ही ख़तरनाक व्यक्ति था जिसमें जीवट की कमी नहीं थी.

ओसामा बिन लादेन के आदेश पर न्यूयॉर्क का वर्ल्ड ट्रेड सेंटर गिराए जाने से पहले प्रभाकरन के लोगों ने कोलंबो के भीड़ भरे इलाक़े में इसी नाम की उतनी ही प्रतीकात्मक इमारत नेस्तनाबूद की थी.

लेकिन ओसामा की तरह प्रभाकरन एक अमीर माँ बाप की संतान नहीं थे और न ही उन्होंने इस तरह के दुस्साहसी कामों को अंजाम देने के लिए किसी दूसरे देश की शरण ली थी. न ही ऐसे काम करने के लिए उन्हें किसी धर्म से प्रेरणा मिली थी. उनका एकमात्र धर्म था तमिल राष्ट्रवाद.

एक दशक के भीतर उन्होंने एलटीटीई को मामूली हथियारों के 50 से कम लोगों के समूह से 10 हज़ार लोगों के प्रशिक्षित संगठन में तब्दील कर दिया था जो एक देश की सेना तक से टक्कर ले सकता था.

वो दो भारतीयों को अपना प्रेरणास्रोत मानते थे - एक थे 1931 में फांसी पर झूलने वाले भगत सिंह और दूसरे थे आज़ाद हिंद फ़ौज बनाने वाले सुभाष चंद्र बोस.

काले पैर वाला शख़्स

साल 1972 में जब वो एक पेड़ के नीचे कुछ लोगों को बम बनाते देख रहे थे तो एक बम में विस्फोट हो गया था और प्रभाकरन बाल-बाल बचे थे.

इस दुर्घटना में उनका दांया पैर जलकर काला पड़ गया था. तभी से उनका नाम 'करिकलन' पड़ गया था जिसका अर्थ होता है काले पैर वाला शख़्स.

चॉकलेट और केकड़ों को उबाल कर खाने के शौक़ीन प्रभाकरन ने अपने अनुयायियों के सिगरेट और शराब पीने और यौन संबंध स्थापित करने पर पाबंदी लगा दी थी.

उनके निज़ाम में एलटीटीई सैनिकों को प्रेम संबंध बनाने की मनाही थी. ग़द्दारी की सिर्फ़ एक ही सज़ा थी, मौत.

उन्होंने अपने दो पुरुष और महिला अंगरक्षकों को सिर्फ़ इसलिए मौत के घाट उतारने का आदेश दिया था क्योंकि उन्होंने संबंध बनाने की जुर्रत की थी.

दिलचस्प बात ये है कि जब अपने ऊपर बात आई तो प्रभाकरन ने ये नियम तोड़ा और मतिवत्थनी इराम्बू से विवाह किया.

कहा जाता है कि उन्होंने प्रभाकरन का पहली बार ध्यान उस समय खींचा था जब होली के त्योहार के दौरान उन्होंने रंगों से भरी एक बाल्टी प्रभाकरन के ऊपर उड़ेल दी थी.

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Image caption बालासिंघम के साथ प्रभाकरन

प्रभाकरन का संवाददाता सम्मेलन

अप्रैल, 2002 में उन्होंने 12 साल बाद एक संवाददाता सम्मेलन किया था जिसमें प्रभाकरन की जीवनी 'इनसाइड एन एल्यूसिव माइंड प्रभाकरन' के लेखक एमआर नारायणस्वामी भी थे.

नारायणस्वामी कहते हैं, "हमने लिट्टे के कैंप में रात बिताई. सुबह उठकर कुएं के पानी से नहाए. मैंने 32 साल के अपने पत्रकार जीवन में इतनी सिक्योरिटी इससे पहले कभी नहीं देखी. उन्होंने हम सब पत्रकारों को एक-एक करके कमरे में बुलाया. हमारे पेन, काग़ज़, पेंसिल और नोटबुक को उन्होंने बहुत बारीकी से देखा. बल्कि नोटबुक और पेन तो उन्होंने ले ही लिए."

"हम सबकी उन्होंने अलग-अलग तस्वीर खींची और कैमरामैन से कहा कि वह अपने कैमरों को वहां रखे एक तराज़ू पर रखें ताकि उनका वज़न ले सकें. बाद में हमें पता चला कि उन्हें हर कैमरे का ओरिजनल वज़न पता था. वो ये देखना चाह रहे थे कि किसी कैमरे में कोई ऐसी चीज़ तो नहीं लगी है, जिसकी वजह से उसका वज़न बढ़ा हुआ है. उन्होंने बाक़ायदा हमारे हाथों को दबा-दबाकर देखा कि कहीं इनके मसल्स तो नहीं हैं. कहीं ये प्रशिक्षित लोग तो नहीं हैं, जो पत्रकारों के रूप में वहां आए हैं."

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साइनाइड कैप्सूल

प्रभाकरन का पहला हथियार था गुलेल जिससे वह चिड़ियों, गिरगिटों और गिलहरियों को मारा करते थे. उसके बाद उनके पास एक एयरगन आ गई थी जिस पर अभ्यास करते-करते उन्होंने अपना निशाना ग़ज़ब का बना लिया था.

प्रभाकरन के जीवनी लेखक नारायणस्वामी कहते हैं, "कभी-कभी प्रभाकरन अपनी क़मीज़ के भीतर रिवॉल्वर रखकर धीरे-धीरे चला करते थे और अचानक तेज़ी से मुड़कर एक काल्पनिक दुश्मन पर निशाना लगाया करते थे. बाद में एलटीटीई ने आदेश दिया था कि उसके सभी लड़ाकों के पास चमड़े का होल्सटर होना चाहिए. इसका आइडिया प्रभाकरन को हॉलीवुड फ़िल्मों से मिला था."

उनका हुक्म था कि एलटीटीई का हर लड़ाका अपने गले में साइनाइड कैप्सूल पहनकर चले और पकड़े जाने की स्थिति में उसे खाकर अपनी जान दे दे. उनकी गर्दन में भी काले धागे से एक साइनाइड कैप्सूल टंगा रहता था जिसे वह अक्सर अपनी क़मीज़ की जेब में एक आईडेंटिटी कार्ड की तरह डाल लेते थे.

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Image caption नॉर्वे के विदेश मंत्री जान पीटरसन से हाथ मिलाते प्रभाकरन, साथ में बालासिंघम (तस्वीर 11 नवंबर, 2004 की है)

भरोसे की कसौटी

प्रभाकरन को खाना बनाने का शौक़ था. अपने चेन्नई प्रवास के दौरान शाम को प्रभाकरन अपने साथियों के साथ सब्ज़ियां काटते थे. उनका प्रिय भोजन था चिकन करी. लेकिन मुश्किल के दिनों में वह ब्रेड और जैम से भी काम चला सकते थे. वह साफ़ पानी के बारे में हमेशा सतर्क रहते थे और कभी भी बिना उबाले पानी नहीं पीते थे.

बैठकों के दौरान वह सिर्फ़ सोडा पिया करते थे और वह भी तब जब बोतल उनके सामने खोली जाए. साल 1987 में जब प्रभाकरन जाफ़ना में इरोस के दफ़्तर गए तो उसके प्रमुख बालाकुमार ने उन्हें पीने के लिए कोक ऑफ़र की. उनका साथी एक ट्रे में कोक की तीन बोतलें और बॉटल ओपनर लेकर आया.

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एलटीटीई संस्थापक प्रभाकरन पर रेहान फ़ज़ल की विवेचना

प्रभाकरन ने एक बोतल खोली और बालाकुमार की तरफ़ बढ़ाई. बालाकुमार ने जब तक कोक का एक घूँट नहीं ले लिया तब तक प्रभाकरन ने अपने लिए बोतल नहीं खोली. नारायणस्वामी कहते हैं एक बार उन्होंने अपने एक दोस्त से कहा था, "मैं चाय तभी पीता हूँ अगर उसे मैंने स्वयं या फिर मेरी पत्नी ने बनाया हो."

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सफ़ाई का जुनून

वह रोज़ अपनी दाढ़ी बनाते थे. जैसे-जैसे एलटीटीई का सितारा परवान चढ़ा, प्रभाकरन का सफ़ाई के प्रति जुनून भी बढ़ता गया. वह जब भी किसी सोफ़े पर बैठते, तो सबसे पहले उसके हत्थे पर लगी गर्द साफ़ करते थे. उनको मकड़ी के जालों से नफ़रत थी. देखते ही वह उन्हें साफ़ करने के आदेश देते थे.

सुव्यवस्था को वह इतनी गंभीरता से लेते थे कि एलटीटीई के चेन्नई दफ़्तर में सभी कमरों और आधा दर्जन मोटर साइकिलों की चाबियाँ एक निश्चित स्थान पर टंगी रहती थीं. उनके साथियों को निर्देश थे कि टॉयलेट्स हर हालत में साफ़-सुथरे रहने चाहिए.

प्रभाकरन एक बार चेन्नई में तमिल नेता नेदुमारन के घर ठहरे थे. एक दिन नेदुमारन ने देखा कि वह कुछ कपड़े धो रहे हैं, जो उनके अपने नहीं हैं. उन्होंने पूछा कि यह आप क्या कर रहे हैं? प्रभाकरन का जवाब था, "मैं आज ख़ाली हूं. इसलिए सोचा कि अपने साथियों के कपड़े धो दिए जाएं."

चेन्नई के एक मशहूर पत्रकार सदानंद मेनन का कहना है कि उन्होंने प्रभाकरन से ज़्यादा शांत इंसान नहीं देखा. भारत में सीएनएन की पूर्व ब्यूरो प्रमुख अनीता प्रताप का भी यही मानना है.

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Image caption प्रभाकरन को भारत लाने के लिए भारत ने श्रीलंका की अनुमति से भारतीय वायुसेना के दो हेलिकॉप्टर जाफ़ना भेजे थे. उसमें भारतीय विदेश सेवा के वरिष्ठ अधिकारी हरदीप पुरी भी गए थे

फ़ोटोग्राफ़िक याद्दाश्त

एक बार प्रभाकरन का इंटरव्यू लेने के बाद उन्होंने लिखा था, "मुझे तो वह बेइंतहा साधारण इंसान लगे. हल्के नीले रंग की क़मीज़ और सिलेटी पैंट पहने प्रभाकरन को बहुत आसानी से एक तमिल व्यापारी समझने की ग़लती की जा सकती थी."

जब भी वह पत्रकारों को इंटरव्यू देते, तो अपने सामने एक कलाई घड़ी रखते थे और जैसे ही तय किया गया समय समाप्त होता, वह इशारा करते थे कि बातचीत बंद कर दी जाए. उनकी याद्दाश्त फ़ोटोग्राफ़िक थी. जिससे वह एक बार मिल लेते थे, उसे कभी नहीं भूलते थे.

साल 1986 में जब भारत-श्रीलंका समझौते पर मंत्रणा हो रही थी तो प्रभाकरन को भारत लाने के लिए भारत ने श्रीलंका की अनुमति से भारतीय वायुसेना के दो हेलिकॉप्टर जाफ़ना भेजे थे. उसमें भारतीय विदेश सेवा के वरिष्ठ अधिकारी हरदीप पुरी भी गए थे. वो आजकल नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल में शहरी विकास मंत्री हैं.

एक एलटीटीई सदस्य ने हरदीप पुरी के कान में फुसफुसाया, "आप हमारे राष्ट्रीय ख़ज़ाने को साथ ले जा रहे हैं." पुरी ने तुरंत जवाब दिया, "मैं आपको वचन देता हूं कि हम जिस जगह से प्रभाकरन को ले जा रहे हैं, उसी जगह उन्हें छोड़कर जाएंगे, चाहे बातचीत का परिणाम कुछ भी हो."

चपाती और पिस्तौल

चेन्नई हवाई अड्डे के वीआईपी लाउंज में हरदीप पुरी ने यह सोचकर चिकन करी और चावल का ऑर्डर किया कि ये चीज़ें प्रभाकरन को पसंद आएंगी. लेकिन प्रभाकरन ने कहा कि वह चपाती खाएंगे, चावल नहीं क्योंकि इसको खाने से पिस्तौल का ट्रिगर दबाने वाली उंगली पर असर पड़ता है.

दिल्ली पहुंचने पर उन्हें अशोक होटल में ठहराया गया. 25 जुलाई को हरदीप पुरी ने उन्हें समझौते की शर्तें पढ़कर सुनाईं, जिसका प्रभाकरन के साथी बालासिंघम ने उनके लिए तमिल में अनुवाद किया. इसे सुनते ही प्रभाकरन ने ऐलान किया कि ये शर्तें उन्हें मान्य नहीं हैं और वह तमिल ईलम की मांग नहीं छोड़ेंगे.

प्रभाकरन ने मांग की कि बातचीत में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमजीआर को भी शामिल किया जाए. राजीव गांधी ने उनकी मांग मान ली. एमजीआर तुरंत दिल्ली पहुंचे. राजीव गांधी ने अपने अफ़सरों पर दबाव बनाया कि प्रभाकरन को समझौते के लिए किसी भी तरह से मनाया जाए.

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श्रीलंका के इस शहर में क्यों ठहरी है ज़िंदगी?

उनका कहना था, "वह ज़िद्दी ज़रूर हैं, लेकिन इस समझौते में उनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है." प्रभाकरन और उनके प्रतिनिधिमंडल को किसी पत्रकार से नहीं मिलने दिया गया. उनको यह आभास हुआ कि उनसे ज़बरदस्ती समझौते पर दस्तख़त कराए जा रहे हैं. बहुत मुश्किल से उन्हें राजीव गांधी से मिलने के लिए तैयार करवाया गया.

तमिलनाडु के एक मंत्री और उनके साथी बालासिंघम उनके साथ गए. प्रभाकरन ने कहा श्रीलंका सरकार पर विश्वास नहीं किया जा सकता. राजीव गांधी ने कहा कि वह तमिलों के हित के लिए काम कर रहे हैं. अंतत : प्रभाकरन भारत-श्रीलंका समझौते को एक मौक़ा देने के लिए तैयार हो गए.

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बुलेटप्रूफ़ जैकेट

नारायणस्वामी बताते हैं कि राजीव गांधी इससे बहुत ख़ुश हुए. उन्होंने तुरंत प्रभाकरन के लिए खाना मंगवाया. जब वह उनके घर से निकलने लगे तो राजीव ने राहुल गांधी को बुलाया और उनसे अपनी बुलेटप्रूफ़ जैकेट लाने के लिए कहा. उन्होंने वह जैकेट प्रभाकरन को देते हुए मुस्कराते हुए कहा, "आप अपना ख़्य़ाल रखिएगा."

राजीव गांधी के मंत्रिमंडल के एक सदस्य ने उनसे कहा कि प्रभाकरन को तब तक भारत में रखा जाए, जब तक एलटीटीई के लोग हथियार नहीं डाल देते. राजीव गांधी ने इसे अस्वीकार कर दिया और कहा, "प्रभाकरन ने मुझे अपनी ज़ुबान दी है. मैं उन पर विश्वास करता हूं."

प्रभाकरन ने वह वचन कभी पूरा नहीं किया और अंतत: राजीव गांधी की हत्या करने का आदेश दे दिया. जाफ़ना वापस लौटने से पहले प्रभाकरन ने मद्रास में लेफ़्टिनेंट जनरल देपिंदर सिंह से मुलाक़ात की थी.

देपिंदर सिंह बताते है, "मेरे प्रति सम्मान दिखाने के लिए प्रभाकरन कमरे के बाहर अपनी रबड़ की चप्पलें उतार कर अंदर आए. वो मुझे थोड़े परेशान दिखाई दिए. उन्होंने मुझसे साफ़ कहा कि वो अब भारतीय विदेश मंत्रालय और रॉ पर कभी विश्वास नहीं करेंगें. मैंने उनसे पूछा कि आप कब अपने हथियार हमें सौंपेंगे (मैंने जानबूझ कर हथियार डालने शब्द का प्रयोग नहीं किया), प्रभाकरन ने कहा कि वो अपनी सबसे भारी मशीनगन मेरे सामने पेश करेंगे. प्रभाकरन ने ये वादा कभी पूरा नहीं किया. कुछ दिनों बाद जब एलटीटीई के छापामारों ने भारतीय सैनिकों के सामने हथियार डाले तो प्रभाकरन मौजूद नहीं थे."

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दुखद अंत

अपनी ज़िंदगी की आख़िरी लड़ाई में प्रभाकरन चारों तरफ़ से श्रीलंकाई सैनिकों से घिर गए थे. एक गोली उनके माथे को चीरती हुई चली गई थी, जिसने उनके कपाल को क्षत-विक्षत कर दिया था. इसके अलावा उनके शरीर पर चोट का एक भी निशान नहीं था. प्रभाकरन का शरीर उसी जगह पड़ा था, जहाँ कुछ घंटे पहले उनकी मौत हुई थी.

इलाक़े में फैली गंदगी के बावजूद उनकी वर्दी बिल्कुल साफ़ और बेदाग़ थी. उनकी कमर पर एक बेल्ट लगी थी जिससे एक होलस्टर्ड पिस्तौल लटकी थी. साथ में थे छह न इस्तेमाल किए हुए कारतूस. उनके सीने पर धातु का एक कार्ड लगा था, जिस पर नंबर लिखा था 001.

उनके पास मिले छोटे बैग में अंगूर की महक वाला हैंड लोशन भी मिला था जिसे सिंगापुर से ख़रीदा गया था. पास ही मधुमेह के इलाज की कुछ गोलियाँ भी पड़ी हुई थीं.

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जब विदेशी धरती पर मारे गए सैकड़ों भारतीय सैनिक

प्रभाकरन पर एक और किताब लिखने वाले मेजर जनरल राज मेहता कहते हैं, "अपनी अंतिम लड़ाई में प्रभाकरन मोलाएतुवू क्षेत्र में तीन तरफ़ से घिर गए थे. चौथी तरफ़ समुद्र था जहाँ श्रीलंका की सेना ने अपना जाल बिछा रखा था. कहने का मतलब ये कि बचने की गुंजाइश थी ही नहीं. श्रीलंकाई सेना रेडियो पर उनकी बातचीत सुन रही थी. उन्हें प्रभाकरन की लोकेशन का पूरा अंदाज़ा था. उन्होंने उनको बिल्कुल 'बैक टू द वॉल' कर दिया था."

प्रभाकरन की मौत के बाद श्रीलंका के राष्ट्रपति राजपक्षे ने वहाँ की संसद में ऐलान किया था, "आज के बाद श्रीलंका में कोई अल्पसंख्यक नहीं होगा. अब से यहाँ सिर्फ़ दो क़िस्म के लोग रहा करेंगे. एक जो अपने देश को प्यार करते हैं और दूसरे वो जिन्हें उस धरती से कोई प्यार नहीं है जहाँ उनका जन्म हुआ."

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श्रीलंका में भारतीय फ़ौज की दास्तां

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