अयोध्या राम मंदिर मुद्दे पर विश्व हिंदू परिषद पर भारी ​शिवसेना?: नज़रिया

  • 26 नवंबर 2018
अयोध्या, राम मंदिर, धर्म सभा, उद्धव ठाकरे, विश्व हिंदू परिषद इमेज कॉपीरइट SAMIRATMAJ MISHRA/BBC

अयोध्या में राम मंदिर बनाने की मांग को लेकर रविवार को हुआ विश्व हिंदू परिषद (विहिप) का शक्ति प्रदर्शन एक फुसफुसिया पटाखे जैसा निकला.

न वीएचपी दावे के मुताबिक दो लाख लोग इकट्ठे कर पाई और न ही वो बीजेपी के इस हिंदू विधानसभा क्षेत्र में कोई नया संदेश दे पाई.

विहिप-बीजेपी के लिए इससे भी ज़्यादा बुरा रहा उसकी प्रतिद्वंद्वी शिवसेना का वहां होना. शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने एक दिन पहले आकर सभी का ध्यान अपनी तरफ़ खींच लिया. जबकि उनके समर्थन में विहिप के 50 हजार समर्थकों के दसवें हिस्से के बराबर समर्थक आयोध्या आए थे.

विहिप के पुराने नारे ''राम लला हम आए हैं, मंदिर यहीं बनाएंगे'' के मुक़ाबले, ठाकरे का नया नारा ''हर हिंदू की यही पुकार, पहले मंदिर फिर सरकार'' लोगों की ज़ुबां पर ज़्यादा छा गया.

अयोध्या में उद्धव ठाकरे ने बीजेपी को राम मंदिर निर्माण की तारीख बताने की चेतावनी दे डाली. ये चेतावनी उस भीड़ को ज़्यादा रास आई होगी जो इस उम्मीद से राज्य के कोने-कोने से आई थी कि वीएचपी अब कुछ ठोस करेगी.

उद्धव ठाकरे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अप्रत्यक्ष हमला बोलते हुए कहा, ''केवल 56 इंच का सीना होना काफ़ी नहीं है, उसके अंदर एक दिल भी होना चाहिए, जिसमें एक मर्द जीता हो.''

शिवसेना और विहिप के बीच सिर्फ़ एक ही समान बिंदु है कि दोनों ही मंदिर के लिए क़ानून की मांग करती हैं. दोनों को ही इस मामले के सुप्रीम कोर्ट में आठ साल से लंबित होने से कोई फर्क नहीं पड़ता.

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कुछ ठोस नहीं आया

इससे पहले 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित ज़मीन को तीन हिस्सों में बांटने का फ़ैसला दिया था, दो हिस्से मंदिर के और एक मस्जिद का. दोनों पक्ष इसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट चले गए थे.

विहिप ने इस धर्म सभा के लिए कई जगहों से साधु संत बुलाए थे. इसमें लाखों लोगों के आने की उम्मीद थी. लेकिन, इसे तय समय से एक घंटा पहले ही ख़त्म करना पड़ा क्योंकि कई समर्थक सभा छोड़कर जाने लगे थे.

दरअसल, ये साफ़ था कि न तो साधु-संत और न ही आरएसएस, विहिप और अन्य हिंदुत्व संगठनों के पास कहने के लिए कुछ नया था. उन्होंने फिर से मंदिर बनाने के लिए क़ानून या अध्यादेश लाने की मांग पर ज़ोर दिया.

इस सभा की आयोजक विहिप ने एक औपचारिक प्रस्ताव तक पास करने की परवाह नहीं की जबकि आरएसएस के बड़े नेताओं (सह कार्यवाह) ने चेतावनी दी थी, ''मं​दिर निर्माण होने तक ना चैन से बैठेंगे न चैन से बैठने देंगे.''

हालांकि, उन्होंने ये साफ़ नहीं किया था कि वो किसे ये चुनोती दे रहे हैं.

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Image caption राम जन्म भूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपालदास

मोदी के लिए नरमी

विहिप, आरएसएस के साथ साधु संतों ने दोहराया कि मंदिर बनाने के लिए पूरी ज़मीन मिलनी चाहिए. सभा में कई वक्ताओं ने कहा कि ज़मीन को ​तीन हिस्सों में बांटने का हाई कोर्ट का आदेश स्वीकार्य नहीं था.

महत्वपूर्ण बात यह है कि अयोध्या में सबसे सम्मानित माने जाने वाले रामजन्म भूमि न्यास के प्रमुख महंत नृत्य गोपाल दास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर नरम दिखे. उन्होंने कोई मांग रखने की बजाए प्रधानमंत्री से अपील की, ''मोदी जी को चाहिए कि जनभावनाओं को देखते हुए जल्द से जद श्री राम जन्मभूमि पर मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करें.''

चित्रकूट स्थित हिंदू सभा के प्रमुख महंत रामभद्रचार्य ने भीड़ को यह समझाने की कोशिश की कि नरेंद्र मोदी राम मंदिर बनाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे. उन्होंने दावा किया कि मोदी कैबिनेट के एक शीर्ष मंत्री ने उन्हें गोपनीय सूचना दी थी कि केंद्र सरकार संसद के अगले सत्र में मंदिर के लिए कुछ ठोस करेगी.

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एक और संत स्वामी हंस देवाचार्य ने प्रधानमंत्री मोदी की यह कहकर तारीफ़ की, ''मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि अच्छे दिन आए हैं. एक बात जान लो कि केंद्र में अगर कोई और सरकार और प्रांत में कोई और सरकार होती तो क्या हम सब यहां होते? क्या आप यहां होते? हम सब जेल में होते?... इससे पता चलता है कि अच्छे दिन आ गए हैं.''

लेकिन, ये स्पष्ट था कि धर्म सभा से दूरी बनाए रखने की बीजेपी की तमाम दिखावटी कोशिशों के बाजजूद पार्टी और उसके हिंदुत्वादी सहयोगियों के बीच मजबूत गठजोड़ साफ़ दिखाई दे रहा था.

यह साफ़ था कि आयोजन को यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्र सरकार दोनों की सहमति प्राप्त थी. कुछ भगवाधारी नेताओं द्वारा दी गई चेतावनी और धमकियां उनके संबंधित संगठनों का मात्र दिखावा था जो स्पष्ट रूप से संघ परिवार से जुड़े हुए हैं.

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उद्धव ठाकरे पर सवाल

वैसे शिवसेना इस रैली से मोदी को निशाने पर लेने का अपना मक़सद पूरा कर पाई. यहां तक कि उद्धव ठाकरे ने उन्हें कुम्भकरण तक कह डाला जो पिछले साढ़े चार सालों से सो रहा था.

लेकिन, ठाकरे के आलोचक मानते हैं कि यही सवाल ठाकरे से भी पूछा जाना चाहिए. एक आलोचक पूछते हैं, ''अगर ठाकरे नरेंद्र मोदी पर साढ़े चार साल से सोते रहने का आरोप लगाते हैं तो इतने सालों से वो ख़ुद (बीजेपी के सहयोगी के तौर पर) क्या कर रहे थे.''

हालांकि, हक़ीक़त ये है कि बीजेपी और शिवसेना दोनों ही राम मंदिर का मामला तब उठा रहे हैं जब कुछ ही महीने बाद आम चुनाव होने हैं.

यहां तक कि पिछले चाढ़े चार सालों में केंद्र सरकार हो या कोई हिंदुत्वावादी संगठन किसी ने भी सुप्रीम कोर्ट से इस मामले पर जल्द सुनवाई करने की अपील नहीं की. यह अनुरोध अक्टूबर में किया गया जब मुख्य न्यायाधीश ने इसे प्राथमिकता पर सुनने से इनकार कर दिया और अगली सुनवाई जनवरी में नई तारीख दे दी.

कई लोगों का मानना है कि विहिप की धर्म सभा सिर्फ़ हिंदुत्ववादी ताक़तों की संतुष्टि के लिए नहीं थी बल्कि इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण उद्देश्य सुप्रीम कोर्ट को ये संदेश देना था कि मंदिर के लिए हिंदू बैचेन हो रहे हैं. यही कारण है कि कई हिंदू संगठन बाबरी मस्जिद जैसे हालात दोहराने की चेतावनी दे रहे थे.

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इस हंगामे की शुरुआत सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले की सुनवाई को प्राथमिकता देने से इंकार करने के बाद हुई. शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने आनन-फानन में अयोध्या दौरे की घोषणा कर दी.

इसके साथ ही विश्व हिंदू परिषद ने भी यहां एक बड़े कार्यक्रम की घोषणा कर दी. हालांकि, उत्तर प्रदेश सरकार ने ठाकरे को जनसभा करने की अनुमति नहीं दी थी लेकिन फिर भी आम तौर पर यह उम्मीद की जा रही थी कि विहिप का कार्यक्रम ठाकरे के कार्यक्रम को फीका कर देगा.

उद्धव ठाकरे को लक्ष्मण किला नामक हिंदू संस्थान के भीतर छोटी बैठकें करनी थी, जहां उन्होंने कुछ संतों से मुलाकात की और शिवसेना के कार्यकर्ताओं को संबोधित किया. उन्होंने सरयू नदी के तट पर आरती की और राम जन्मभूमि मंदिर के दर्शन किए.

लेकिन, शाम होते-होते शिवसेना प्रमुख का राजनीतिक एजेंडे कामयाब होता गया और वे विहिप-भाजपा के ऊपर भारी पड़ गए. जहां तक मंदिर का सवाल है, तो दोनों का हाथ खाली रहा और स्पष्ट तौर पर वे पूर्व स्थिति में वापस लौट गए.

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(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)

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