धर्म सभा के दौरान अयोध्या के मुसलमानों का कैसा बीता दिन

  • 26 नवंबर 2018
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25 नवंबर को रविवार होने के बावजूद धर्म सभा में जाने के लिए अयोध्या शहर के बाहर की तमाम सड़कों पर सुबह से ही चहल-पहल शुरू हो गई थी.

लेकिन अयोध्या शहर के भीतर का इलाक़ा किसी संवेदनशील छावनी के रूप में तब्दील हो गया था. सुबह से ही न तो किसी वाहन को अंदर जाने दिया जा रहा था और न ही अंदर से बाहर.

शिवसेना के कार्यक्रम और वीएचपी यानी विश्व हिंदू परिषद की धर्मसभा को देखते हुए मुसलमानों ने अपनी सुरक्षा को ख़तरा बताया था. उनके इस ख़ौफ़ का प्रशासन पर इतना असर हुआ कि मुख्य सड़क से लगे कुछ मुस्लिम बहुल इलाक़े पुलिस, पीएसी और आरएएफ़ की ख़ास निगरानी में रहे.

इन इलाक़ों की सुरक्षा व्यवस्था यूं तो इंस्पेक्टर रैंक के अधिकारी के हाथों में होती है लेकिन यहां मोर्चा ख़ुद पुलिस और पैरा मिलिट्री के आला अधिकारी सँभाले हुए थे.

अयोध्या में पुलिस बल की भारी तैनाती के बावजूद रविवार को होने वाली धर्मसभा को लेकर वहां के मुस्लिम बहुल इलाक़ों में एक भय का माहौल था.

राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद मामले के पक्षकार इक़बाल अंसारी ने ख़ुद अपने लिए डर की बात कही थी और पर्याप्त सुरक्षा नहीं मुहैया कराने की सूरत में अयोध्या छोड़ देने तक की धमकी दी थी.

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मुस्लिम इलाक़ों में सुरक्षा

इन धमकियों को देखते हुए इक़बाल अंसारी के घर पर अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था कर दी गई.

दो गनर के अलावा दो अन्य पुलिकर्मियों की तैनाती कर दी गई. न सिर्फ़ इक़बाल अंसारी बल्कि रविवार को अयोध्या के सभी मुस्लिम बहुल इलाक़ों में अभूतपूर्व सुरक्षा व्यवस्था देखी गई.

टेढ़ी बाज़ार, मुग़लपुरा, अशर्फ़ी भवन, गोला घाट इत्यादि मोहल्लों के हर प्रवेश मार्ग पर सघन घेराबंदी यानी बैरिकेडिंग की गई थी और सभी जगह पुलिस, पीएसी और आरएएफ़ के जवान तैनात थे.

इन प्रवेश मार्गों से रविवार को पूरे दिन किसी भी बाहरी व्यक्ति को न तो भीतर जाने की और न ही भीतर से बाहर आने की अनुमति दी गई. स्थानीय लोगों को भी परिचय पत्र दिखाने पर ही प्रवेश दिया गया.

फ़ैज़ाबाद के डीआईजी ओंकार सिंह का कहना था, "हमने सभी को आश्वस्त किया था कि किसी को भी डरने या किसी बहकावे में आने की ज़रूरत नहीं है. सुरक्षा देना हमारी ज़िम्मेदारी है और हम उसे निभाएंगे. लोगों ने हम पर भरोसा किया और हम भरोसे पर खरे उतरे."

टेढ़ी बाज़ार के रहने वाले जमालुद्दीन अंसारी का कहना था, "शुरू में डर तो था ही लेकिन प्रशासन ने काफ़ी मुस्तैदी दिखाई और इतनी कड़ी व्यवस्था थी कि कोई भी यहां आ नहीं सकता था. हालांकि हम लोगों को भी परेशानियों का सामना करना पड़ा लेकिन जान है तो जहान है."

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'बाहर नहीं निकले इक़बाल अंसारी'

बाबरी मस्जिद के पक्षकार इक़बाल अंसारी कहते हैं कि रविवार को तो वे अपने घर में ही रहे, बाहर निकले ही नहीं.

उनके मुताबिक़, "रविवार को तो सुरक्षा इतनी बढ़ा दी गई कि हम लोग अपने घरों में जैसे क़ैद होकर रह गए. हालांकि लोगों को पता था कि ऐसा होना है इसीलिए ज़रूरी सामान वग़ैरह लोगों ने पहले से ही रख लिया था. अब लोग सतर्क हैं."

अयोध्या को जाने वाली कई सड़कें पड़ोस के गोंडा, बाराबंकी, बस्ती, सुल्तानपुर, आंबेडकर नगर की ओर जाती हैं और इन सड़कों के किनारे बसे मोहल्लों में बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोग रहते हैं. प्रशासन की नज़र में ये इलाक़े संवेदनशील थे और यहां सुरक्षा व्यवस्था ज़्यादा चाक-चौबंद थी.

मुसलमानों ने आशंका ज़ाहिर की थी कि इतनी बड़ी संख्या में शिवसैनिक और वीएचपी के लोग आएंगे तो उन्हें उनसे ख़तरा है क्योंकि अयोध्या के मुसलमानों को न तो स्थानीय हिन्दुओं से कोई ख़तरा रहता है और न ही हिन्दुओं को मुसलमानों से.

उत्तर प्रदेश के अपर पुलिस महानिदेशक यानी एडीजी (क़ानून एवं व्यवस्था) आनंद कुमार ने बताया कि इन कार्यक्रमों को देखते हुए सभी ज़िलों के एसपी को यह निर्देश दिया गया था कि संवेदनशील समझे जाने वाले इलाक़ों में अतिरिक्त बलों की तैनाती की जाए.

'लोग डर से बाहर नहीं निकले'

वहीं मुग़लपुरा के रहने वाले इरशाद आलम कहते हैं, "प्रशासन ने सुरक्षा भी कड़ी कर रखी थी और लोग डर के मारे ख़ुद भी घरों में क़ैद थे. धर्म सभा ख़त्म होने के बाद भी देर शाम अयोध्या की सड़कों पर चहल-पहल शुरू हुई."

मुस्लिम बहुल इलाक़ों के अलावा हनुमानगढ़ी और रामलला की ओर जाने वाले रास्ते की भी भारी बैरिकेडिंग की गई थी और सुरक्षा बलों को तैनात किया गया था.

शाम के चार बजे के क़रीब आमतौर पर भीड़-भाड़ और ट्रैफ़िक जाम में फँसने वाली अयोध्या की मुख्य सड़क पर सन्नाटा पसरा हुआ था और हर तरफ़ पुलिस और सुरक्षा बलों के जवान, उनकी गाड़ियां और उनकी बसें ही दिख रही थीं.

लगभग सारी दुकानें बंद थीं. केवल इक्का-दुक्का चाय और मिठाई की दुकानें खुली थीं. कुछ मेडिकल स्टोर भी खुले हुए थे. जगह-जगह ड्रोन कैमरों के ज़रिए भी निगरानी रखी जा रही थी.

इन सबके बावजूद, इस बात पर सवाल उठाने वालों की कमी नहीं थी कि धारा 144 लगी होने के बावजूद इतनी बड़ी संख्या में लोग कैसे जमा हो गए और नारेबाज़ी करते रहे.

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