सरकार से नाराज़ किसान- मोदी तेरे शासन में बर्तन बिक गए राशन में

  • 26 नवंबर 2018
अररिया में किसानों का मार्च इमेज कॉपीरइट Neeraj Priyadarshy/BBC

बिहार की राजधानी पटना से करीब 350 किमी. दूर अररिया ज़िले की जिस जगह से यह रिपोर्ट लिखी गई है, वहां पिछले साल बाढ़ में सीने की ऊंचाई तक पानी बह रहा था.

हालांकि, इस साल बिहार सूखा प्रभावित राज्य है. सूबे के करीब 24 ज़िले सूखा ग्रस्त घोषित किए जा चुके हैं.

अररिया ज़िला मुख्यालय से करीब 60 किमी. दूर सिकटी प्रखंड से 'संविधान सम्मान यात्रा' के तहत पैदल मार्च करके आए करीब 200 किसान, महिलाओं और नौजवानों का एक जत्था शनिवार को शहर में प्रवेश कर गया था.

हाथों में तख्तियां और बैनर लिए महिलाएं और पुरुष किसान धूल उड़ाते चल रहे थे. खेत की मेड़ और पगडंडियों को पार कर अब शहर की गलियों में दाख़िल हो गए थे, इसलिए नारों की गूंज बढ़ती जा रही थी.

टेम्पो पर माइक और साउंड सिस्टम लादकर मार्च को लीड करते हुए कुछ नौजवान नारा लगाते और बाक़ी उनके पीछे चल रही किसानों की टोली नारे को दोहराती आगे बढ़ती.

"मोदी तेरे शासन में, बर्तन बिक गए राशन में. निकलो घर मकानों से, जंग लड़ो बेइमानों से.अभी तो ये अंगड़ाई है, आगे और लड़ाई है. लड़ेंगे-जीतेंगे, लड़े हैं-जीते हैं, इन्कलाब ज़िंदाबाद."

इमेज कॉपीरइट Neeraj Priyadarshy/BBC

किसानों का मार्च जैसे-जैसे अररिया टाउन हॉल स्थित सभा स्थल के करीब पहुंच रहा था, देश और प्रदेश के दूसरी जगहों से आए संविधान सम्मान यात्रा के यात्रियों की टोलियां उनसे जुड़ती जातीं.

वैसे तो मार्च में शामिल हर एक शख़्स नारा लगाते हुए जोश से लबरेज दिखता, मगर पोखरिया से रात में चलीं बुजुर्ग शकुंतला देवी के पैर रुकने का नाम नहीं ले रहे थे. एक हाथ में संगठन का झंडा और दूसरे में तख्ती लिए बिना चप्पल के शकुंतला पथरीले राहों पर भी दौड़ने लग जातीं तो सब देखकर अवाक रह जाते. उनकी तख्ती पर लिखा था,

"तुमसे पहले जो एक शख़्स यहां तख्त-नशीं था, उसको भी अपने खुदा होने पर इतना ही यक़ीन था"

शकुंतला से पूछने पर कि ये बात किस शख़्स के लिए लिखी गई है, तपाक से कहती हैं, "नीतीश के लिए, मोदी के लिए, सरकार के लिए,"

आप इस मार्च में क्यों शामिल हुईं, फिर से जवाब मिलता है, "हक़ के लिए, न्याय के लिए"

इमेज कॉपीरइट Neeraj Priyadarshy/BBC
Image caption शकुंतला देवी

'चुनाव से पहले आख़िरी मौका'

जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय यानी नेशनल एलायंस फॉर पीपल्स मूवमेंट (एनएपीएम) की ओर से दो अक्टूबर को दांडी से शुरु होकर 26 राज्यों से 65 दिन में चलकर दस दिसंबर को दिल्ली पहुंचेगी. शनिवार को असम से होते हुए मार्च को अररिया पहुंचा था. जहां स्थानीय जन जागरण शक्ति संगठन की ओर से एक मजदूर किसान आम सभा का आयोजन किया गया था.

एनएपीएम की शोहिनी के मुताबिक, "यह यात्रा देश के हज़ारों-लाखों किसानों, मजदूरों, महिलाओं और नौजवानों को साथ लाने के लिए चल रही है. हमलोग तमिलनाडु, तेलंगाना, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, गुजरात और असम जैसे राज्यों में संविधान सम्मान यात्रा कर चुके हैं. हज़ारों साथी अब हमारे साथ है. आने वाले चुनावों के पहले ये हम सबके लिए एक मौका है कि सरकार से सवाल करें."

सभा में देश के अलग-अलग राज्यों से आए संविधान सम्मान यात्रा के यात्री भी शामिल थे. तेलंगाना से मीरा संघमित्रा, पश्चिम बंगाल से अमिताभ मिश्रा, दिल्ली से राजेंद्र रवि, ओडिशा से मधुसूदन और महाराष्ट्र से आए अभिषेक अररिया में किसानों को संबोधित कर रहे थे.

अररिया, सहरसा, सुपौल, पुर्णिया और कटिहार के सैकड़ों लोग संविधान सम्मान यात्रा में पैदल ही चलकर सभा करने पहुंचे थे. यात्रा का अगला पड़ाव बेतिया और उसके बाद राजधानी पटना था. वहां से उत्तर प्रदेश होते हुए 10 दिसंबर को यात्रा दिल्ली पहुंचेगी, जहां भारत के 26 राज्यों के संविधान सम्मान यात्रियों का जुटान होना है.

इमेज कॉपीरइट Neeraj Priyadarshy/BBC
Image caption मार्च को संबोधित करते हुए दीपनारायण पासवान

सभा में शामिल कई किसान ऐसे भी थे जो यात्रा के साथ दिल्ली जाने का तय कर आए थे. इसलिए अपना बोरिया-बिस्तर भी साथ लाए थे. उन्हीं में से एक सिकटी के दीपनारायण पासवान पत्नी और बेटी के साथ सभा में आए थे.

पत्नी रंभा की रीढ़ की हड्डी में सुराख हो गया है, इसलिए वो सभा करके घर लौट गईं, लेकिन दीपनारायण अपनी बेटी सोनी कुमारी के साथ यात्रा में शामिल होकर दिल्ली जाने का ठान लिए हैं.

बीबीसी से बातचीत में दीपनारायण कहते हैं, "हमारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है. बीमारी के कारण 19 साल की जवान बेटी को खो चुके हैं. उसका भी एक बच्चा है, जिसे पालना है. एक यही बेटी बची है. पेट काटकर इसको भी आठवीं तक पढ़ाए हैं. मगर अब वो समझती है, इसलिए इस लड़ाई में हमारे साथ है. हमको लगता है कि ये हमारे लिए आख़िरी मौका है."

किससे है किसानों की लड़ाई?

लड़ाई किससे है? इस बात पर दीपनारायण कहते हैं, "सरकार से है. इस भ्रष्ट तंत्र से है. आपको मालूम नहीं होगा! दो सालों से सरकार का एक पैसा हमको नहीं मिला है. मनरेगा के तहत पहले कम से कम 100 दिन का काम मिल जाता था. लेकिन अब तो 10 दिन काम मिलना भी मुश्किल है. उसमें भी जब पैसा निकालने जाते हैं तो ग्राहक सेवा केंद्र से यह कहकर लौटा दिया जाता है कि मशीन में आपका अंगूठा सही नहीं लगा है.

वे इसी में जोड़ते हैं, "सरकार ने शौचालय बनाने के लिए कहा तो हमने अपना पैसा लगाकर शौचालय भी बनवा लिया. मगर अभी तक उसका पैसा नहीं मिला. हमने किसी शिकायत नहीं की. मुखिया से कहते हैं तो बीडीओ को आगे कर देते हैं. बीडीओ से कहते हैं तो वो जियो-टैगिंग नहीं होने की बात कहकर घुमा देते हैं. अब आप ही बताइए कि जियो टैगिंग हमारा काम है या उनका!"

इमेज कॉपीरइट Neeraj Priyadarshy/BBC

अपने परिवार की बात करते हुए दीपनारायण भावुक होने लगे. तो पीछे खड़ी 18 साल की बेटी सोनी ने संभाल लिया. माइक खुद थाम कर कहने लगी, "मेरे पिता ने जितना हो सके मुझे पढ़ाया. बड़ी बहन के इलाज में हमलोग टूट गए. उसका एक बच्चा भी है जिसको पालना अब हमारी ज़िम्मेदारी है. माता-पिता की तबियत भी ठीक नहीं रहती. कर्ज ले-लेकर किसी तरह परिवार चलता है. मगर फिर भी मेरे पिता ने हार नहीं मानी है. हम इस लड़ाई में उनका साथ दे रहे हैं."

सिकटी और कुरसाकाटा से आए किसान, मजदूर और महिलाओं को अपने साथ जोड़ कर दीपनारायण ही लाए थे. ये वो लोग थे जो मनरेगा में काम नहीं मिलने को लेकर अररिया डीएम के ख़िलाफ़ हाई कोर्ट में रिट याचिका भी दायर कर चुके हैं. अररिया के डीएम हिमांशु शर्मा ने अदालत में ज़िला प्रशासन का पक्ष रख दिया है.

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
बिहार में पनपती हिंदुत्व की प्रयोगशाला

अररिया के किसानों द्वारा लगाए गए आरोपों के जवाब में डीएम हिमांशु शर्मा ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "पॉश मशीन वाली शिकायत अपवाद हो सकती है. हमनें अपने बैंकिंग कॉरेस्पॉन्डेंट की ये जवाबदेही तय की है. ऐसा नहीं है कि पूरे अररिया के किसानों और मजदूरों को ऐसी दिक्कतें हो रही हैं. जहां से शिकायत मिलती है, हम तत्काल कार्रवाई करते हैं. केवल कुछ शिकायतों के आधार पर ये तय नहीं किया जा सकता कि पूरे सिस्टम में गड़बड़ी है."

मनरेगा में काम नहीं मिलने के सवाल पर डीएम कहते हैं, "पूरे अररिया में ऐसा कोई नहीं मिलेगा जिसने जॉब के लिए लिखित आवेदन दिया हो और उसे काम नहीं मिला हो. मनरेगा में सबकुछ लिखित प्रक्रिया के तहत होता है. अगर कोई मौखिक रूप से ये कह दे कि हमनें काम मांगा और काम नहीं मिला, तब जाकर उसके साथ अन्याय होगा. हमारे यहां के मनरेगा के आंकड़े आप देख सकते हैं, हमनें अदालत में उन्हें पेश किया है."

इमेज कॉपीरइट Rajneesh Kumar
Image caption पटना के सेंट ज़ेवियर स्कूल पहुंचा मार्च

स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालय बनाने के लिए मिलने वाले पैसे की बात पर भी डीएम शर्मा ने प्रक्रिया का हवाला देते हुए कहा, "जियो- टैगिंग एक अनिवार्य शर्त है. इसके पहले ऐसी भी शिकायतें आयी हैं कि एक आदमी ने दो बार फोटो दिखाकर शौचालय का पैसा उठा लिया. लाभार्थी कों पैसा उचित हाथ तक मिले इसलिए हमलोग कड़ाई से नियमों का पालन कर रहे हैं. अररिया में कुल साढ़े चार लाख शौचालय बनवाने का लक्ष्य था. हमने साढ़े तीन लाख पूरा कर लिया है."

मनरेगा के तहत काम नहीं मिलना, काम मिलने के बाद पैसा उठाने के लिए बैंकिंग प्रक्रिया से गुजरना, स्वच्छ भारत मिशन के तहत बने शौचालयों के पैसे फंस जाना, प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत अभी तक घर नहीं बन पाना, क्या ऐसी दिक्कतें केवल अररिया, पूर्णिया, सुपौल, कटिहार के ही भूमिहीन किसानों और मजदूरों की हैं?

इमेज कॉपीरइट Neeraj Priyadarshy/BBC

इसके जवाब में जन जागरण शक्ति संगठन के आशीष रंजन कहते हैं, "नहीं. हमने संविधान सम्मान यात्रा में महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना, ओडिशा समेत सभी राज्यों के किसानों और मजदूरों से बात की है. सबके सामने वही समस्या है. तेलंगाना में स्पेशल इकनॉमिक ज़ोन (सेज़) का हवाला देकर किसानों की हज़ारों एकड़ ज़मीन छीनी जा रही है. महाराष्ट्र में किसानों का प्रदर्शन आप देख ही चुके हैं. बिहार जैसे प्रदेशों में सबसे अधिक समस्या भूमिहीन किसान और मजदूरों के लिए है."

एक तरफ महाराष्ट्र में किसानों का आंदोलन फिर से एक बार बड़ा रूप ले रहा है. वहीं, दूसरी तरफ जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय की ओर से चलाए जा रहे संविधान सम्मान यात्रा की मंजिल (10 दिसंबर) भी अब करीब है.

क्या आने वाले चुनावों में मजदूरों और किसानों के इस आंदोलन का असर देखने को मिलेगा?

जवाब में जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्यव (NAPM) के नेशनल कमिटी की मेंबर कामायनी कहती हैं, "चुनाव नज़दीक है और हमें अपनी सरकारों से हिसाब मांगना है. पिछले चार सालों में सरकार ने ना तो हमें पूरा काम दिया और ना ही फसलों का उचित दाम. नोटबंदी और जीएसटी ने उलटे हमारी मजदूरी छीन ली है. अखबार और टीवी को केंद्र सरकार गुलाम बना कर सोच रही है कि वह हमारे दिमाग पर कब्जा जमाए रखेगी. पर देश के मजदूर, किसान, महिला, छात्र, नौजवानों ने इनकी चाल को समझ लिया है और वह अपनी मन की बात करना चाहते है."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आपयहां क्लिककर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार