जल ही जीवन नहीं, जल ही ज़हर है जहां- ग्राउंड रिपोर्ट

  • 28 नवंबर 2018
पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जल संकट, पानी

प्रदूषण शब्द का इस्तेमाल करने से यह पता नहीं चल पाता कि हालात कितने डरावने हैं, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हिंडन नदी के किनारे बसे गांवों के लोग अनेक बीमारियों से जूझ रहे हैं.

पानी पिए बिना जी नहीं सकते और जैसा पानी वे पी रहे हैं उसके बाद भी उनका जीना मुश्किल है.

नदी के किनारे बसे गांव ख़ुशहाल होते हैं, गांव में नदी होना ख़ुशक़िस्मती मानी जाती है, लेकिन एक गांव है गांगनौली, इस गांव की बदक़िस्मती यही है कि वह नदी के किनारे बसा है.

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से निकलने वाली नदी हिंडन, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के छह ज़िलों बागपत, शामली, मुज़फ़्फ़रनगर, मेरठ और ग़ाज़ियाबाद से होती हुई यमुना में मिलती है.

इन ज़िलों के 154 गांव हिंडन और इसकी सहायक नदियों कृष्णा और काली के किनारे बसे हैं और यहां के लोग इन ज़िलों में लगे कल-कारख़ानों की क़ीमत चुका रहे हैं.

सरकारी फ़ाइलों के मुताबिक़, छह ज़िलों में लगभग 316 फ़ैक्ट्रियां हैं जिनमें से 221 फ़ैक्ट्रियां चल रही हैं, इनका कचरा नदियों में जाता है इसलिए नदियों का पानी ज़हरीला हो चुका है, लेकिन मामला इतना सीधा-सादा नहीं है.

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
यूपी के छह ज़िलों के सैकड़ों गांवों में हज़ारों लोग ज़हरीला पानी पीने को मजबूर हैं.

अगर ऐसा होता तो गांव के लोग नदी का पानी पीने के बदले कुएं, ट्यूबवेल या हैंडपंप का पानी पी सकते थे. लेकिन ज़हरीला पानी ज़मीन के नीचे तक पहुंच चुका है यानी अब उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा.

वे जानते हैं कि हर घूंट के साथ ज़हर उनके शरीर में जा रहा है. गहरा भूरा, लाल पानी पीकर बीमारियां झेलना और मरना मानो इनकी नियति बन गई है.

यहां पानी में निकल, पारा, कैडमियम, सल्फ़ाइड, क्लोराइड जैसे जानलेवा हैवी मेटल काफ़ी ज़्यादा मात्रा में है, जिसके कारण गावों के हैंडपंप का पानी ज़हरीला हो चुका है ऐसे ही 154 गांवों में से एक है गांगनौली.

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Image caption सहारनपुर के भनेड़ाखेमचंद गांव का शख्स जो लकवे का शिकार है.

ईंट और मिट्टी से बनी सड़क पर चलते हुए हमारी मुलाक़ात जितेंद्र से हुई. जब हम जितेंद्र के घर पहुंचे तो उन्होंने पड़ोसी के घर से पानी मंगाया और बताया, ''हमारे घर में लगे नल का पानी हम नहीं पिला सकते. बग़ल वालों ने फ़िल्टर लगवाए हैं तो आपके लिए पानी ले आए.''

अपनी 12 साल की बेटी नेहा को गोद में लिए जितेंद्र बताते हैं, "पैदा हुई तो एक साल तक हमें सब कुछ ठीक लगता रहा लेकिन जब ये एक साल तक चलने की कोशिश भी नहीं कर सकी तो हमने डॉक्टर को दिखाया. उन्होंने बताया कि यहां के पानी के कारण इसके दिमाग़ पर असर पड़ा है और अंगों का विकास नहीं हो पा रहा है. अब इसका कोई इलाज नहीं हो सकता है, हमने डॉक्टर के पास जाना छोड़ दिया है."

ये कहते हुए वे बेबस नज़रों से अपनी बेटी को बार-बार देखते हैं और उसका सिर सहलाते हैं. जिस उम्र में नेहा को स्कूल जाना चाहिए, अपने हमउम्र बच्चों के साथ खेलना चाहिए उस उम्र में नेहा चल-फिर तक नहीं सकती, अपने हाथों से खाना नहीं खा सकतीं. यहां तक कि वह ये भी नहीं बता सकती कि उसे कब शौचालय जाना है. नेहा अकेली नहीं है बल्कि कई ऐसे बच्चे-नौजवान इस गांव में हैं जो जन्मजात अपंगता से जूझ रहे हैं.

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Image caption 12 साल की नेहा जन्मजात अपंगता से जूझ रही हैं

साल 2016 में बागपत के चीफ़ मेडिकल ऑफ़िसर ने गांगनौली गांव में एक मेडिकल सर्वे कराया था. उनकी रिपोर्ट के मुताबिक़, इस गांव में 37 लोग कैंसर, चर्म रोग, हैपेटाइटस और अपंगता जैसी समस्या से पीड़ित थे. इनमें से कुछ की मौत भी हो चुकी है. वहीं एक दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक़, इस गांव में बीते दो साल में 71 लोगों की मौत कैंसर से हुई है.

साल बदला लेकिन हाल नहीं

साल 2015 में 'दोआब पर्यावरण समिति' नाम के एक संगठन की याचिका पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि जिन भी ज़िलों का पानी प्रदूषित है वहां स्वच्छ पीने लायक़ पानी मुहैया कराया जाए.

जब ये आदेश आया तो अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे और समाजवादी पार्टी की सरकार थी लेकिन अब पूर्ण बहुमत वाली भाजपा की योगी सरकार है. राज्य में सरकार तो बदल गई है लेकिन इन छह ज़िलों के प्रभावित गांवों में शायद ही कुछ बदला है.

यहां के पानी ने कृष्णा की दुनिया ही उजाड़ दी है. कृष्णा के पति शिव कुमार 35 साल के थे और कैंसर से पीड़ित थे. डेढ़ साल पहले ही उनकी मौत हो गई. अपने तीन बच्चों के लिए अब कृष्णा ही अकेला सहारा हैं जो खेतों में मज़दूरी करके इन्हें पाल रही हैं.

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Image caption गांगनौली गांव की रहने वाली कृष्णा

अपने पति का ज़िक्र करते हुए उनकी आंखें भर आती हैं. वे कहती हैं, ''उन्हें कुछ साल पहले चक्कर आया और फिर दौरे ज़्यादा पड़ने लगे. जब हम डॉक्टर के पास गए तो उन्होंने दिमाग़ का कैंसर बताया. डॉक्टर ने कहा कि ख़राब पानी पीना कैंसर की वजह हो सकती है. हमारे खाने में तो कोई कमी नहीं थी. इस पानी ने ही हमारी ज़िंदगी नर्क बना दी.''

जिस ज़हरीले पानी के कारण कृष्णा अपने पति को खोने की बात हमसे बता रही थीं वही पानी वो अब भी पीती हैं. सरकार ने गांगनौली में पानी की एक टंकी लगाई है लेकिन कृष्णा का कहना है कि उन्हें ज़रूरत भर साफ़ पानी नहीं मिल पाता है.

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वे कहती हैं, ''सरकार ने टंकी का पानी देना तो शुरू किया है लेकिन वो हर दिन नहीं मिलता और जब मिलता भी है तो पूरा नहीं पड़ता, ऐसे में हमें हैंडपंप का पानी ही पीना पड़ता है. पहले तो सरकारी नल था पर अब वो नहीं रहा तो घर के नल से पानी निकालते हैं. उसका पानी भी बहुत ख़राब है लेकिन हम क्या करें.''

'हम क्या करें' एक ऐसा सवाल है जो इन गांवों में हर कोई पूछ रहा है लेकिन इन सवालों के जवाब ना तो इन्हें प्रशासन की ओर से मिल रहा है और ना ही ये लोग इतने सक्षम हैं कि इस सवाल के जवाब ख़ुद ढूंढ सकें.

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Image caption बेगराजपुर गांव की एक नहर जो नदी में जाकर मिलती है

जिनका परिवार कैंसर से बिखरा

उदासी और बेससी की दास्तां बयां करता पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ज़िले मुज़फ़्फ़रनगर का एक गांव बेगराजपुर. जो शहर से महज़ 16 किलोमीटर की दूरी पर बसा है. इस गांव से होती हुई हिंडन की सहायक नदी काली गुज़रती है.

गांव के बाहर एक चौड़ी नहर है जिसमें ज़िले की फ़ैक्ट्रियों का पानी बहता है और काली में जाकर मिलता है. जब हम इस नहर के पास पहुंचे तो तेज़ बदबू थी और ये पानी इतना काला और गंदा था कि उसके सामने मामूली नालों का पानी साफ़ लगेगा.

इस गांव के जिन भी बच्चों से हम मिले उन्हें दाद और त्वचा की बीमारियां देखने को मिलीं. कुछ ऐसे लोग भी मिले जिन्हें, कैंसर, लकवा और आवाज चले जाने जैसी बीमारियां हैं. इसी गांव के रहने वाले हैं फ़ैज़ अली जिनकी पहली पत्नी, बेटी और छोटा भाई कैंसर के कारण गुज़र गए.

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Image caption बेगराजपुर गांव में ज़्यादातर लोगों को चर्म रोग है.

फ़ैज़ ने तीन साल पहले दूसरी शादी मुनाज़रा से की और अब मुनाज़रा को भी पेट में ट्यूमर है. फ़ैज़ बताते हैं, "हर रात दवाई खाकर सोती है और हर सुबह तेज़ दर्द की शिकायत रहती है. डॉक्टर बीमारी के लिए पानी को दोष देते हैं. पानी की शिकायत ही सभी कर रहे हैं. मुझे अब डर सताने लगा है कहीं इसे भी कैंसर न हो जाए. पता नहीं कैसे इलाज करा पाऊंगा.''

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फ़ैज़ कहते हैं कि कई बार लोग आए और पानी की जांच की गई लेकिन कोई नतीजा हाथ नहीं लगा. इस गांव के ही दूसरे शख़्स ने हमारे सामने पानी को उबाला. इस उबले हुए पानी में एक सफ़ेद केमिकल की परत जम गई थी.

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Image caption बेगराजपुर गांव के रहने वाले फ़ैज़ जिनके घर तीन लोग कैंसर से मरे और अब दूसरी पत्नी मुनाज़रा को ट्यूमर है

फ़ैज़ की उदासी में डूबी आंखों को अब प्रशासन और राज्य से कोई उम्मीद नहीं है. रूंधे गले से वह कहते हैं, "कुछ नहीं होगा. एक दिन हम भी यही पानी पी-पीकर मर जाएंगे. कुछ मांगना नहीं है किसी से लेकिन अगर ये लोग हमारे बच्चों को और इस गांव की आने वाली पीढ़ी को साफ़ पानी दे सके तो मेहरबानी मालिक की".

दोआब पर्यावरण समिति के अध्यक्ष और हरियाणा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रमुख रह चुके डॉ. सीवी सिंह बताते हैं, "जब मैंने हिंडन नदी के पानी की जांच कराई थी तो लैब के वैज्ञानिक ने हैरानी से कहा था कि ये पानी नहीं हो सकता. ये तो केमिकल का मिश्रण है. इस पानी में ऑक्सीजन है ही नहीं. जिसका मतलब है कि इसमें जलीय जीव हो ही नहीं सकते. ज़रा सोचिए जिस पानी की इतनी बुरी हालत है वो लोगों तक पहुंच रहा है".

इन गांवों में लोगों के चेहरे पर किसी भी पल अपनों को खो देने का डर साफ़ देखा जा सकता था. ये लोग अब किसी से अपना दुख साझा भी नहीं करना चाहते. ऐसे कई लोगों ने हमसे यह कह कर बात नहीं की कि 'बात करने से क्या होगा?'.

तेज़ाब जैसा पानी

इसके बाद बीबीसी की टीम पहुंची मेरठ के किनौनी गांव. इस गांव के ठीक बाहर एक गत्ता मिल और चीनी मिल है. जहां ये मिलें ख़त्म होती हैं ठीक वहीं से शुरु होता है ये गांव.

किनौनी के लोगों की समस्या बाक़ी गांवों से बिलकुल अलग दिखी. यहां के पानी में प्रदूषण का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि खेतों में पानी का काम करने वाले प्रवीण को पानी ने ही विकलांग बना दिया.

35 वर्षीय प्रवीण 15 साल की उम्र से खेतों में मज़दूरी का काम करते हैं. खेतों में इस्तेमाल होने वाले नदी के प्रदूषित पानी ने उनके पैरों का अंगूठा और उंगलियां छीन लीं.

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Image caption प्रवीण का कहना है की पानी ने उन्हें अपाहिज बना दिया

प्रवीण कहते हैं, ''हम हिंडन नदी का पानी खेतों में चलाते थे जिसके कारण हमें पानी में कई-कई दिनों तक रहना पड़ता था. मेरे पैर के अंगूठे और उंगली में एक घाव हुआ और डॉक्टर ने कहा कि कटवाने के अलावा कोई चारा नहीं है. ये घाव पानी के कारण ही हुआ.''

लंबे समय तक नज़रअंदाज़ किए जाने के बाद, इस गांव में साल भर पहले एक पानी की टंकी तो लगाई गई लेकिन अब तक लोगों को इसका पानी नहीं मिल सका है. जब हम इस पानी की टंकी को देखने पहुंचे तो पास में ही हमें एक आरओ प्लांट दिखा. यहां जाकर हमें पता चला कि गांव वालों के लिए फ़िल्टर का पानी बेचा जा रहा है. 20 से 30 रुपये में पानी की बीस लीटर की एक बोतल मिल जाती है. लेकिन यहां हमें बेगराजपुर के फ़ैज़ अली का ही एक सवाल याद आया कि "300 रुपये हर महीने पानी के लिए कहां से लाएं?".

  • पांच अगस्त 2015 को एनजीटी ने राज्य सरकार को ये आदेश दिया कि जिन भी जिलों का पानी प्रदूषित है वहां स्वच्छ पीने योग्य पानी मुहैया कराया जाए, साथ ही प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को कहा गया कि यह तय करना उनकी ज़िम्मेदारी है कि इन छह जिलों में 45 फैक्ट्रियां बिना ट्रीट किया हुए कचरा न बहाएं.
  • इसके अलावा, एनजीटी ने प्रदूषित हैंड पंपों को सील करने, जीपीएस लगे टैंकरों से पानी पहुंचाने, भूमिगत जल को इस्तेमाल लायक बनाने, राज्य सरकार के विभिन्न विभागों को मिलकर काम करने आदेश दिए थे.

आंकड़े क्या कहते हैं?

जनवरी 2018 में एनजीटी ने पानी की जांच और इंडस्ट्रियों से निकलने वाले कचरे की जांच के आदेश दिए. जिसके बाद केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड ने इन प्रभावित ज़िलों में 168 जगहों से 545 पानी के सैंपल लिए थे. इसकी जांच में पाया गया कि सल्फ़ेट, फ़्लोराइड, तेल और ग्रीस के साथ साथ इसमें हैवी मेटल जैसे कैडमियम, कॉपर, सीसा, आयरन, निकल, ज़िंक, पारे और मैगनीज़ भारी मात्रा में मौजूद हैं.

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जांच में सामने आया कि 168 जगहों में से 93 जगहों के ग्राउंड वॉटर बुरी तरह प्रदूषित है. इन जगहों पर ब्यूरो ऑफ़ इंडियन स्टैंडर्ड के मानकों के मुताबिक़ पानी में सल्फ़र, फ़्लोराइड और कैडमियम, मर्करी, कॉपर, लेड क्रोमियम जैसे हैवी मेटल भारी मात्रा में पाए गए.

पानी में घुला ज़हर

एम्स, दिल्ली में ऑन्कोलॉजी मेडिसिन के प्रोफ़ेसर अतुल शर्मा ने बीसीसी से बातचीत में ये समझाने की कोशिश की कि आख़िर इन हैवी मेटल का मानव शरीर पर क्या-क्या असर पड़ सकता है और कैंसर जैसी बीमारियां कितनी संभव हैं.

प्रोफ़ेसर ने बताया, "विश्व स्वास्थ्य संगठन और इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च इन कैंसर ने एक अध्ययन में पाया है कि हैवी मेटल जैसे मर्करी, लेड, आर्सेनिक, क्रोमियम, निकिल, सल्फ़ाइड को पहली कैटेगरी के मेटल में रखा गया है जिसका मतलब है कि इसके पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध है कि इनसे कैंसर होता है".

ये सारी चीज़ें फ़ैक्ट्री के कचरों में भारी मात्रा में होता है, खेतों में इस्तेमाल की जाने वाली खादों में भी होता है और इनके ज़रिए भूमिगत पानी और खाने-पीने की चीज़ों में पहुंचता है.

अतुल शर्मा कहते हैं, "इनसे कैंसर के अलावा भी कई बीमारियां जैसे हार्ट से जुड़ी बीमारी, कई तरह के चर्म रोग और किडनी फ़ेल होना शामिल है".

रितु महज़ 22 साल की हैं लेकिन उन्हें आंत की गंभीर बीमारी है. शामली के सिलावर गांव में रहने वाली रितु को खाना पचता नहीं है. लिहाज़ा वो जो भी खाती हैं उन्हें उल्टी हो जाती है.

शामली के इस गांव के नज़दीक ही पेपर और शुगर मिल के बीच एक सड़क का फ़ासला है. रितु कहती हैं, ''पिछले सात-आठ साल से मेरे पेट में इन्फेक्शन है. मेरी आंत ख़राब हो चुकी है और अब किडनी पर भी प्रभाव पड़ रहा है. डॉक्टर कहते हैं पानी बदलो. जो पानी पीती थी वो पानी ख़राब है. यहां पास में मारुति पेपर मिल है जिसने यहां का पानी ख़राब कर दिया है.''

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Image caption 22 साल की रितु को किडनी की गंभीर बीमारी है.

सिलावर के पास ही एक गांव है सिक्का. गांव वालों का कहना है कि यहां स्थित मारुति पेपर मिल ने ही दोनों गांवों के पानी को ज़हरीला बना दिया है. इस फ़ैक्ट्री का कचरा गांव के बाहर से गुज़रने वाली एक नहर में छोड़ा जा रहा है जो हिंडन नदी में मिलती है. ये पानी ही लोगों के नलों तक पहुंच कर इस 'ज़हर' को लोगों के आंगन तक पहुंचा रहा है.

गांवों वालों की शिकायतें सुनने के बाद हम सिक्का गांव की मारूति पेपर मिल पहुंचे जहां हमारी मुलाक़ात मिल के सीईओ संजय गर्ग से हुई. संजय गर्ग ने गांव वालों के सभी दावों को ख़ारिज कर दिया. यहां तक कि उन्होंने इस बात से भी इनकार कर दिया कि ये पेपर मिल पानी को नहरों में छोड़ती है.

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संजय ने बताया, ''हमारे यहां टोटल वेस्टेज से पेपर बनाए जाते हैं तो ऐसे में पानी ना के बराबर लगता है. दो से तीन टन पेपर बनाने में दो से तीन लीटर पानी लगता है और उस पानी को भी हम रिसाइकिल करते हैं. किसी भी तरह का पानी हम डिस्चार्ज नहीं करते.''

गांव के प्रधान नरेंद्र कश्यप का कहना है, ''अगर फ़ैक्ट्री पानी नहीं निकालती तो पानी कहां से आता है. ये पावरफ़ुल लोग हैं कोई इनके ख़िलाफ़ नहीं बोलता. ये जो चाहेंगे वही तो अख़बारों में छपेगा.''

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Image caption कारखानों से निकलता पानी जो नदियों को 'ज़हरीला' बना रहा है.

यही हाल ग़ाज़ियाबाद के सुराना गांव और सहारनपुर के भनेड़ा खेमचंद गांव में भी हमें देखने को मिला. सहारनपुर के गांव भनेड़ा खेमचंद में अब तक सरकार की ओर से कोई व्यवस्था नहीं की गई है.

इस गांव में रहने वाली ज्ञानवती के पति लकवे का शिकार हैं. ज्ञानवती सरकार से शिकायत करती हुई कहती हैं, ''वोट मांगने तो आ जाते हैं. कहते हैं सब ठीक कर देंगें. पहले जो सरकारी नल थे वो निकाल ले गए और अब नए नल भी नहीं लगवाए.'' आंगन में लगे नल की ओर इशारा करते हुए कहती हैं, ''यही नल है, इसी का पानी पीते हैं.''

इस बीच पति खाट पर बैठे हुए इशारों में पानी मांगते हैं. ज्ञानवती गिलास में उसी नल का पानी देकर रसोई की ओर बढ़ जाती हैं. ये अजीब विडंबना वाला पल था. जिस पानी ने उनके पति को खाट पर बिठा दिया, आवाज़ छीन ली, वही पानी ज्ञानवती और उनका परिवार पीने को मजबूर है.

बजट के इंतज़ार में प्रशासन

उत्तर प्रदेश जल निगम के सीनियर इंजीनियर (ग्रामीण क्षेत्र पेयजल) जीवी शुक्ला ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "भनेड़ा खेमचंद (सहारनपुर) और बेगराजपुर (मुजफ़्फरनगर) को छोड़कर अन्य गांवों में पानी की टंकी है. 150 लोगों के बीच एक सार्वजनिक नल होता है. लोग कुछ फ़ीस देकर ये कनेक्शन अपने घरों तक भी ले सकते हैं. लोगों को थोड़ी मेहनत तो करनी होगी. लोग भी अपने घरों से पानी के लिए नहीं निकलते हैं.''

शुक्ला कहते हैं, "हमारे यहां तत्काल राहत के लिए हैंडपंप लगाए जाते हैं और लंबे वक़्त के लिए पाइपों के ज़रिए पानी सप्लाई किया जाता है. बेगराजपुर में 20 हैंडपंप हैं. इसके अलावा पौने दो करोड़ की लागत का प्रोजेक्ट शुरु होने लिए रक़म का इंतज़ार किया जा रहा है".

जब हमने उन्हें आंखों देखा हाल बताया तो उन्होंने कहा, ''जो भी नल लगाए गए थे उनके सैंपल लिए गए थे लेकिन अगर ऐसा है तो हम फिर जांच कराएंगे. ये ग्राम पंचायत की ज़िम्मेदारी है कि नलों का रख-रखाव करें और अगर ऐसी शिकायत है तो बताएं.''

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फ़ैक्ट्रियों से निकलने वाले कचरे की जांच और इन फ़ैक्ट्रियों पर कार्रवाई का ज़िम्मा केंद्र और राज्य के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों का है लेकिन जीवी शुक्ला भी मानते हैं कि ये कारख़ाने मानकों के मुताबिक़ कचरा नदियों में नहीं बहा रहे हैं.

चूंकि इन ज़िलों के ज़िलाधिकारी ट्रिब्यूनल के नियमों को लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं लिहाज़ा हम गांव की समस्या लेकर सहारनपुर के ज़िलाधिकारी एके पांडे के पास पहुंचे. उन्होंने कहा, ''भनेड़ा खेमचंद गांव के लिए जल निगम की ओर से एक करोड़ 28 लाख का बजट दिया गया है जैसे ही मिल जाएगा काम शुरु हो जाएगा.''

सितंबर 2016 को उत्तर प्रदेश जल निगम ने पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय को चिट्ठी लिखकर फ़ंड की मांग की थी. जल निगम ने तमाम योजनाओं के लिए 2500 करोड़ की मांग की थी. इसमें ये भी जानकारी दी गई की 600 करोड़ की देनदारी जल निगम पर है और इसके अलावा फ़्लोराइड और आर्सेनिक से प्रभावित इन 154 गांवों में साफ़ पानी मुहैया कराने के लिए 400 करोड़ रूपये की ज़रूरत है.

एके पांडे के मुताबिक़ फैक्ट्रियों से निकलने वाला कचरा ही भूमिगत जल के प्रदूषण का कारण नहीं है, कई और भी कारण हैं जिससे पानी में ऐसे तत्व पाए जा रहे हैं. आख़िर वो अन्य कारण क्या हैं? इसका कोई साफ़ जवाब हमें नहीं मिल सका.

ऐसा ही एक और सवाल है जिसका जवाब गांव वालों को भी नहीं मिल पा रहा है कि कब इन गांवों के हज़ारों-हज़ार लोगों को साफ़ पानी नसीब होगा?

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