मध्य प्रदेशः कांग्रेसी पिता की सीट पर बीजेपी की इकलौती मुस्लिम उम्मीदवार

  • 26 नवंबर 2018
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मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी ने सभी 230 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं मगर इनमें भोपाल की एक सीट पर सबकी नज़र रहेगी.

क्योंकि ये अकेली सीट है जहाँ से पार्टी ने किसी मुस्लिम उम्मीदवार को मैदान में उतारा है.

फ़ातिमा रसूल सिद्दिक़ी नॉर्थ-भोपाल सीट से बीजेपी की उम्मीदवार हैं.

और यहाँ का चुनाव ना केवल बीजेपी के लिए बल्कि वहाँ से उसके उम्मीदवार के लिए भी नाक की लड़ाई जैसा बन चुका है.

पार्टी के लिए इसलिए क्योंकि पिछले 15 सालों से सत्ता में होने के बावजूद बीजेपी यहाँ कभी नहीं जीत सकी.

और फ़ातिमा सिद्दिक़ी के लिए इसलिए क्योंकि ये वो सीट है जहाँ कभी उनके पिता का डंका बजता था और ये चुनाव उनके लिए अपने पिता की हार का बदला लेने की लड़ाई है.

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शेर-ए-भोपाल कहलानेवाले रसूल अहमद सिद्दिक़ी यहाँ से दो बार कांग्रेस के विधायक रहे थे और मंत्री भी बने.

पर 1993 में आरिफ़ अकील की वजह से उनकी हार हुई.

साल 1993 में फ़ातिमा के पिता कांग्रेस के उम्मीदवार थे. बीजेपी की ओर से रमेश शर्मा और जनता दल की ओर से अक़ील चुनाव मैदान में थे. इस चुनाव में अक़ील की वजह से कांग्रेस के वोट कट गए थे, जिसका फ़ायदा बीजेपी को मिला और रमेश शर्मा जीत गए.

उस चुनाव के 25 साल बाद बीजेपी ने आरिफ़ अकील को टक्कर देने के लिए बीजेपी ने रसूल अहमद सिद्दिक़ी की बेटी फ़ातिमा रसूल सिद्दिक़ी को मैदान में उतारा है.

लड़ाई आसान नहीं क्योंकि ये सीट कांग्रेस का गढ़ रही है और आरिफ़ पिछली पांच बार से यहाँ के विधायक हैं.

फ़ातिमा के पिता कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार माने जाने वाले सिंधिया के बेहद क़रीबी थे. ऐसे में सवाल ये उठता है कि उनकी बेटी ने कांग्रेस का हाथ झटककर बीजेपी का फूल क्यों थामा पर यही सवाल बीजेपी को लेकर भी है. पार्टी किसी भी अल्पसंख्यक को चुन सकती थी लेकिन फ़ातिमा को ही क्यों चुना?

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राजनीति की इस बिसात को समझने के लिए सबसे पहले नॉर्थ भोपाल की सीट को समझना ज़रूरी है. नॉर्थ-भोपाल या भोपाल-उत्तर की सीट मुस्लिम बहुल इलाक़े की सीट है. ऐसे में मुस्लिम उम्मीदवार तो समझ आता है लेकिन फ़ातिमा का चुना जाना फिर भी थोड़ा चौंकाने वाला फ़ैसला है. चौंकाने वाला इसलिए क्योंकि बीजेपी ज्वाइन करने के कुछ घंटों बाद ही उन्हें उम्मीदवार बना दिया गया.

हालांकि ख़ुद फ़ातिमा को इसमें कुछ भी अजीब नहीं लगता. वो कहती हैं, "ये सच है कि मैं इससे पहले किसी पार्टी में नहीं थी. ये मेरी पहली पार्टी है लेकिन मुझे इसमें कुछ भी अटपटा नहीं लग रहा. पार्टी को लगा होगा कि मैं युवा हूं, काम करना चाहती हूं इसलिए मुझे उम्मीदवार बना दिया."

लेकिन सवाल ये भी है कि जिस कांग्रेस पार्टी में उनके वालिद सालों तक रहे. आला-कमान के ख़ास रहे उन्होंने उस पार्टी को क्यों नहीं चुना या फिर कांग्रेस ने उन पर भरोसा क्यों नहीं जताया?

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इस पर फ़ातिमा कहती हैं कि ये सच है राजनीति की उनकी समझ उनके पिता से मिली है, जो कांग्रेसी थे लेकिन अब कांग्रेस का वो रूप नहीं रहा.

फ़ातिमा कहती हैं "ना अब वो कांग्रेस रही ना कांग्रेस के वो लोग रहे. पुराना ज़माना अलग था. अब कांग्रेस बहुत बदल चुकी है. लेकिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान में वो ख़ूबी दिखी जो मुझे मेरे पिता ने दी थी."

अपने लगभग हर भाषण में फ़ातिमा गंगा-जमुनी तहज़ीब की बात कहती हैं. पर वो ये भी मानती हैं कि हिंदू-मुस्लिम के नाम पर राजनीतिक फ़ायदे उठाए जाते हैं.

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लेकिन फ़ातिमा की बातें थोड़ा भ्रमित भी करती हैं. फ़ातिमा कहती हैं कि वो कांग्रेस में जाना चाहती थीं लेकिन कांग्रेस की तरफ़ से उन्हें कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली.

"मेरे वालिद ने इस इलाक़े की भलाई के लिए जितने काम किए वो लोगों को अब भी याद है लेकिन कांग्रेस उनके काम, उनकी सेवा को भूल गई. जो वाक़ई ग़लत बात है."

उनकी इस बात से कहीं न कहीं ये इशारा तो ज़रूर मिलता है कि उनकी पहली पसंद कांग्रेस थी लेकिन उस ओर से मनचाही प्रतिक्रिया नहीं मिली और उम्मीदवार की तलाश कर रही बीजेपी की ओर से उन्हें न्योता मिल गया तो वो बीजेपी की 'फ़ातिमा' हो गईं.

फ़ातिमा का मानना है कि भोपाल में हर जगह तो अमन-चैन है लेकिन भोपाल-उत्तर एक ऐसा क्षेत्र है, जहां अशांति है और चुनाव जीतकर वो यहां शांति स्थापित करना चाहती हैं.

अपनी जीत वो तय मानती हैं क्योंकि वो विकास के मुद्दे के साथ खड़ी हैं. लेकिन बीजेपी की चुनावी रणनीति का पर्याय बन चुके राम मंदिर के मुद्दे पर कुछ भी सीधे तौर पर नहीं कहती हैं. वो कहती हैं "इस पर कुछ भी कहने के लिए हम लोग अभी बहुत छोटे हैं लेकिन इस बात का यक़ीन है कि जो भी फ़ैसला लिया जाएगा वो सबके हित में होगा."

तो पिता के नाम पर चुनावी सफ़र शुरू करने वाली फ़ातिमा वंसवाद की राजनीति को बढ़ावा नहीं दे रहीं? वो भी उस पार्टी का उम्मीदवार बनकर जो हमेशा से अपने विपक्षियों पर इसका आरोप लगाती रही है. इस पर फ़ातिमा कहती हैं कि उन्हें टिकट सिर्फ़ वालिद के नाम पर नहीं मिली है. उनका मानना है कि उन्हें ये टिकट युवा लड़की होने के नाते मिली है.

एक ओर जहां फ़ातिमा अपनी जीत को लेकर दावे कर रही हैं वहीं उनके कांग्रेस प्रतिद्वंद्वी आरिफ़ अक़ील यहां मज़बूत पकड़ रखते हैं. साल 2013 में हुए विधान सभा चुनाव में उन्होंने क़रीब आठ हज़ार वोटों से बीजेपी के आरिफ़ बेग़ को हराया था. बीजेपी ने मुस्लिम महिला को नॉर्थ-भोपाल से खड़ा करके अपना दांव तो खेल दिया है पर दांव सही बैठा या नहीं...नतीजे ही बता पाएंगे.

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