विश्व बैंक की टीम को क्यों जाना पड़ा झारखंड

  • 27 नवंबर 2018
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Image caption सुमित्रा किस्कू ने बताया कि साल 2016 में जब पहली बार वाटर ट्रीटमेंट प्लांट के निर्माण की कोशिश की गई तो लोगों ने काफी विरोध किया था

पानी पर हक़ और 'हिस्सेदारी' के सवाल पर गिद्धीझोपड़ी गांव में बवाल मचा है. पूर्वी सिंहभूम ज़िले के गोलमुरी प्रखंड का ये गांव झारखंड के औद्योगिक शहर जमशेदपुर से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर बसा है.

क़रीब 2500 लोगों की आबादी वाले इस गांव में अधिकतर घर संथाली आदिवासियों के हैं. वे अपने गांव में बन रहे वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट का विरोध कर रहे हैं.

इस कारण विश्व बैंक की टीम ने यहां आकर आदिवासियों से बातचीत की है. इस ट्रीटमेंट प्लांट के लिए विश्व बैंक ने पैसे दिए थे.

गिद्धीझोपड़ी के 'मांझी' (प्रमुख) सुखराम किस्कू ने बताया कि पिछले हफ़्ते गांव आए विश्व बैंक के अधिकारियों ने इसकी फंडिंग रोकने का आश्वासन दिया है. हमलोगों ने विश्व बैंक की जांच टीम के कार्यकारी सचिव डिलेक बार्लास को पत्र लिखकर इसकी जांच कराने का अनुरोध किया था.

सुखराम किस्कू ने बीबीसी को बताया, "झारखंड की भाजपा सरकार आदिवासियों के खिलाफ काम कर रही है. वह इस वॉटर ट्रीटमेंट प्रोजेक्ट के बहाने जमशेदपुर शहर के म्यूनिसिपल इलाके का विस्तार करना चाहती है. ये दरअसल आदिवासियों की ग्रामसभा शासन व्यवस्था के ख़िलाफ़ साज़िश है."

"सरकार चाहती है कि ग्रामसभा के अधिकार खत्म कर दिए जाएं, ताकि वह हमारी ज़मीन पूंजीपतियों को आसानी से दे सके. इस कारण हमारी ग्रामसभा ने यहां वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट बनाने की अनुमति नहीं दी थी."

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Image caption गिद्धीझोपड़ी गांव के लोग

क्यों ज़रूरी है ग्रामसभा की अनुमति

दरअसल, ये इलाका पाँचवीं अनुसूची के तहत आता है. यहाँ आदिवासियों की स्वशासन व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता मिली हुई है.

यहां किसी भी तरह के निर्माण के लिए ग्राम सभा की अनुमति अनिवार्य है. ग्रामसभा के प्रमुख गांव के 'मांझी' होते हैं और कई मांझियों के प्रमुख को 'परगना' कहा जाता है.

दशमथ हांसदा ऐसे ही 60 मांझियों के परगना हैं. गिद्धीझोपड़ी गांव के मांझी भी उनके अधीन हैं.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "साल 2015 में मुख्यमंत्री रघुवर दास ने इस परियोजना का शिलान्यास थाना नंबर-1168 में किया था. रानीडीह की ग्रामसभा ने वहां इस प्लांट के निर्माण की इजाज़त भी दे दी थी. लेकिन सरकारी अधिकारियों ने थाना नंबर 1169 के अधीन आने वाले गिद्धीझोपड़ी गांव में इसका निर्माण शुरू करा दिया."

"हमारा विरोध इसको लेकर है. क्योंकि यह देश संविधान से चलता है और यह प्लांट संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन कर बनाया जा रहा है."

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Image caption वाटर ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण स्थल

विरोध करने पर लाठीचार्ज

इसी गांव की सुमित्रा किस्कू ने बताया कि साल 2016 में जब पहली बार इसके निर्माण की कोशिश की गई तो हमलोगों ने काफी विरोध किया. तब गांव के अधिकतर मर्द बाहर कमाने चले गए थे. गांव की महिलाएं निर्माण स्थल पर गईं तो हमपर लाठीचार्ज करा दिया गया.

"इसमे कई बच्चे और महिलाएं घायल हो गई थीं. इसके बावजूद बागबेड़ा थाना ने हमारी शिकायत नहीं ली, उल्टे हमी पर झूठा केस कर दिया गया. हालांकि पुलिस इस आरोप से इनकार करती है."

दरअसल, विवाद का बड़ा कारण वह जमीन है, जहाँ भी वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण चल रहा है.

इसी गांव की सुमी सोरेन ने बताया कि जिस जगह पर सरकार प्लांट का निर्माण करा रही है, वह आदिवासियों का पूजा स्थल डुंगरी है. उसके बगल में ही हमारा श्मशान है. ज़मीन के इस हिस्से पर औषधीय पौधे हैं. गांव वाले इसका उपयोग अपने और जानवरों के बीमार होने पर करते हैं.

बकौल सुमी सोरेन, वहां वाटर ट्रीटमेंट प्लांट बनने से दूषित पानी गिरेगा और सारे पौधे नष्ट हो जाएंगे. वहीं रामराय हांसदा का कहना है कि जल, जंगल और जमीन पर सदियों से आदिवासियों का अधिकार है. अब सरकार हमारा ही पानी हमको बेचना चाहती है, यह स्वीकार नहीं किया जा सकता.

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क्या कहता है प्रशासन

हालाँकि प्रशासनिक अधिकारी इन आरोपों से इनकार करते हैं. पूर्वी सिंहभूम के तत्कालीन एसडीओ (वर्तमान में खूँटी के उपायुक्त) सूरज कुमार ने बताया कि लाठीचार्ज के दौरान मेरे द्वारा बदसलूकी के आरोप निराधार हैं.

सूरज कुमार ने बीबीसी से कहा, "ये परियोजना 113 गाँवों के लिए है. इनमें से 112 गाँवों के लोगों को कोई आपत्ति नहीं है. सिर्फ़ गिद्धीझोपड़ी के लोग बाहरी लोगों के बहकाने पर इसका विरोध कर रहे हैं. लिहाज़ा प्रशासन की निगरानी में वहाँ काम शुरू कराया गया. तब इसके अलावा दूसरी कोई बात नहीं हुई.

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परियोजना कब शुरू हुई थीस्थानीय सोशल एक्टिविस्ट सोमाई मार्डी ने बताया कि साल 2015 में इसका शिलान्यास मुख्यमंत्री ने स्वयं किया था. इसके एक साल बाद जुलाई 2016 में पुलिस-प्रशासन और ग्रामीणों के बीच तब विवाद हुआ, जब प्रशासन ने यहाँ जबरन काम शुरू कराने की कोशिश की.

इसका काम 237 करोड़ रूपए में पूरा होना है, जिसके लिए विश्व बैंक ने फ़ंडिंग की थी. लिहाज़ा ग्रामीणों ने अक्टूबर में विश्व बैंक से इसकी जाँच कराने और काम रुकवाने की माँग की. इसके बाद बीते 17 नवंबर को विश्व बैंक की टीम ने निर्माण स्थल का दौरा कर आदिवासियों के बयान रिकॉर्ड किया.

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