राहुल गांधी का अपनी जाति और गोत्र बताना क्या RSS की जीत है: नज़रिया

  • 28 नवंबर 2018
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दत्तात्रेय गोत्र और कौल ब्राह्मण जाति में जन्मे राहुल गाँधी. यह इक्कीसवीं सदी के भारत के एक बड़े युवा नेता का बायोडेटा है. वह भी एक ऐसे युवा नेता का, जो सेकुलरवादियों के आख़िरी चिराग़ माने जा रहे हैं.

अब किसी ज्योतिषी से पूछने की क्या ज़रूरत? यह बायोडेटा ही सारी कुंडली है, सारा पोथी-पत्रा है. ये ख़ुद ही बता रहा है कि भारत का भविष्य क्या है.

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने 2013 में भारत के लिए एक डेडलाइन दी थी. वह यह कि अगले 30 बरसों में भारत 'परम वैभव' पा लेगा.

'परम वैभव' यानी हिन्दू राष्ट्र. लगता है कि भागवत की भविष्यवाणी पूरी तरह ग़लत हो जाएगी. भारत शायद उससे काफ़ी पहले ही हिन्दू राष्ट्र बन जाए. बन जाए? या बन चुका है?

क्या आपको नहीं लगता कि सेकुलर शब्द संविधान के अलावा अब पूरे राजनीतिक विमर्श में अछूत बन चुका है? सेकुलरवाद की राजनीति के तम्बू समेटे जा चुके हैं.

मुसलमानों की बात अब कोई नहीं करता. हाँ, मुसलमानों से बात कर लेते हैं, लेकिन चोरी-छिपे. और जब कमलनाथ के टेप आते हैं तो मुँह चुराना ही पड़ता है.

इसलिए योगी आदित्यनाथ ग़लत नहीं कहते कि राहुल का जनेऊ दिखा कर ख़ुद को सनातनी हिन्दू दिखाने का प्रयास हमारी (यानी कि संघ परिवार की) वैचारिक विजय है.

महज़ वैचारिक ही क्यों, यह आपकी बहुत बड़ी राजनीतिक विजय है योगी जी!

संघ की राजनीतिक जीत

वोटों की लड़ाई में चाहे कोई हारे-जीते, सच यह है कि कांग्रेस राजनीतिक ज़मीन हार चुकी है. उसने मान लिया है कि अपने एजेंडे पर चल कर वह खड़ी भी नहीं रह सकती, भलाई इसी में है कि वह संघ के एजेंडे पर चलना शुरू कर दे.

राहुल गांधी मंदिर-मंदिर घूम रहे हैं. वैसे कहने के लिए वह अजमेर शरीफ़ भी चले जाते हैं. न भी जाएँ तो कोई हर्ज नहीं. मुसलमान उन्हें कभी साम्प्रदायिक दुराग्रही नहीं मानेंगे. क्योंकि वह हैं नहीं.

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लेकिन इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है कि मुसलमान उन्हें क्या मानते हैं? फ़र्क़ इससे पड़ता है कि हिन्दू उन्हें क्या मानते हैं. फ़र्क़ इससे पड़ता है कि राहुल गांधी के परनाना जवाहरलाल नेहरू को किसी ग़यासुद्दीन का वंशज बताने वाली व्हाट्सऐप की तोपों का मुँह मोड़ा जा सकता है या नहीं.

पिछले पाँच सालों से यह तोपें दनादन गोले दाग़ती रही हैं. लगातार, बिना रुके, बिना थके.

काँग्रेस कभी इन हमलों का कोई जवाब नहीं दे पाई. इसलिए कि काँग्रेस तो वैचारिक धरातल बहुत पहले ही छोड़ चुकी है, इंदिरा गाँधी के ज़माने से ही. तब से कांग्रेस ने राजनीति को महज़ वोटों की, सत्ता की लड़ाई बना लिया.

विचारधारा की अहमियत

विचारधारा की बात उसके बाद कांग्रेस के भीतर कब हुई? इसीलिए गांधी कांग्रेस दफ़्तर में टँगे फ़ोटो तक ही सिमट गए. नेहरू तक को कांग्रेस ने जन्मदिन और पुण्यतिथि के अलावा कब याद किया?

कांग्रेस के पास कोई वैचारिक संगठन है क्या? कोई वैचारिक कार्यक्रम है क्या? पार्टी ने पिछले दस-बीस-तीस सालों में ऐसा कोई कार्यक्रम कभी किया, कोई मुहिम चलाई, जिससे देश के लोगों को किसी न किसी रूप में उससे जोड़ा जा सके?

कांग्रेस ने इतने बरसों में कभी कुछ ऐसा किया कि पिछले 30-40 सालों में देश में पैदा हुई पीढ़ियों को इतिहास का कुछ क..ख..ग.. जानने को मिले?

नहीं न. क्यों?

इसलिए कि कांग्रेसियों को कभी लगा ही नहीं, महसूस ही नहीं हुआ कि मनुष्य ही नहीं, सारे जीवित मस्तिष्कों को किसी न किसी विचार की ज़रूरत होती है. यह भी कि हर विचार की एक उम्र होती है. एक विचार आता है, दूसरा जाता है. विचार का कोई स्थायी भाव नहीं है. हो ही नहीं सकता.

राहुल गांधी को कैसे मिला ‘कौल’ गोत्र?

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विचार का संकट

कांग्रेस में विचार होना बंद हो गया, इसलिए उसे भविष्य दिखना भी बंद हो गया. क्योंकि विचार पहले आता है, भविष्य उसके बाद ही बनता है.

सोच कर देखिए कि आज से हज़ारों साल पहले मनुष्य के मन में तन ढकने का विचार नहीं आया होता तो क्या दुनिया आज ऐसी होती, जैसी है.

यानी कोई विचार नहीं होगा तो कोई भविष्य नहीं होगा. कांग्रेस का सबसे बड़ा संकट यही है जबकि उधर, कांग्रेस के विरुद्ध एक संगठन एक विचार लेकर चला है - हिन्दू राष्ट्र का विचार.

शुरू-शुरू में सभी ने इसे एक सनकी आइडिया माना. इस विचार के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सरदार पटेल तक से लताड़ मिली, जिनकी सबसे ऊँची मूर्ति लगा कर संघ परिजन आज अघाते थक नहीं रहे हैं.

लेकिन संघ फ़ैलता रहा और उसका विचार भी ऐसे ही फ़ैलता रहा. हालाँकि बहुत धीरे-धीरे.

फिर आई 1966 की गोपाष्टमी, जब गोरक्षा को लेकर जनसंघ (आज की बीजेपी) समेत कई हिन्दू संगठनों ने संसद भवन को घेरा. सैकड़ों या शायद हज़ारों लोग मारे गये. और संघ आगे बढ़ता रहा.

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संघ का फ़ैलाव कैसे हुआ?

गाँवों में और देश के तमाम हिस्सों में संघ की कोई पहुँच नहीं थी. 1983 में तब इस्लाम और ईसाइयत के ख़िलाफ़ हिन्दुओं को 'संगठित' करने के लिए हिन्दू तीर्थों को जोड़ते हुए एकात्मता (एकात्म होने की अवस्था) यात्रा शुरू हुई. और संघ दूर-दूर तक घरों में पहुँच गया.

इसके बाद रामजन्मभूमि आन्दोलन को गरमाया गया, गाँव-गाँव में राम शिलाएँ पूजी गईं, आडवाणी की रथयात्रा हुई और फिर उसके बाद जो कुछ हुआ और कैसे बीजेपी एक देशव्यापी राजनीतिक ताक़त बन कर उभरी और कैसे हिन्दुत्व और हिन्दुत्ववादी तत्वों को देश में कई सरकारों का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन मिलता गया, और कैसे घर-वापसी, लव जिहाद, मुसलमानों की आबादी, गोरक्षा से लेकर श्मशान और क़ब्रिस्तान के जुमले उछले, सरकारी ख़र्चों पर दीपोत्सव हुए, नामों को बदलने का अंतहीन सिलसिला शुरू हुआ और सेकुलरवाद कैसे एक कँटीले झाड़-झंखाड़ में तब्दील हो गया, यह सब जानते हैं.

यानी राई-सा शुरू हुआ हिन्दू राष्ट्र का विचार देखते-देखते एक विशाल पर्वत बनकर हमारे सामने आकर खड़ा हुआ.

और इन 40-45 बरसों में कांग्रेस क्या करती रही? सत्ता और गठबंधनों के शॉर्टकट जोड़-घटावों के अलावा कुछ भी नहीं.

कांग्रेस की शॉर्ट-कट पॉलिटिक्स

कांग्रेस में पनपी विचारशून्यता और शॉर्टकट संस्कृति का ही यह नतीजा था कि हिन्दू वोट पाने की हड़बड़ी में राजीव गांधी सरकार ने ख़ुद 1989 में मंदिर का शिलान्यास कराया. यानी एजेंडा संघ का, लेकिन काम किया कांग्रेस ने.

हालाँकि, इससे कांग्रेस को हिन्दू वोटों का कोई लाभ नहीं हुआ. लाभ अगर किसी को हुआ तो वह संघ के हिन्दुत्व के एजेंडे को ही हुआ. संघ को एक नई स्वीकृति मिली. सरकारी स्वीकृति.

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अब राहुल गांधी भी वही कर रहे हैं. एजेंडा संघ परिवार तय कर रहा है कि सोनिया, राहुल और कांग्रेस हिन्दू विरोधी हैं, मुस्लिम समर्थक हैं. और सोनिया गांधी तिलक लगा कर, राहुल गांधी भगवा पहन कर, जनेऊ दिखा कर, ख़ुद को शिव भक्त बोल कर,अपना गोत्र बता कर खुद को हिन्दू साबित करने में लगे हैं.

संघ ने अन्तत: कांग्रेस को धकेल-धकेल कर उस कोने तक हाँक दिया है, जहां उसके पास 'हिन्दुओं की शुभचिन्तक' पार्टी का लेबल चिपका लेने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा है.

तो संघ के एजेंडे का एक महत्त्वपूर्ण सूत्र पूरा हो गया है. कांग्रेस अपने को थोड़ा-थोड़ा हिन्दू दिखाने लगी है.

अगले कुछ सालों में वह ज़्यादा हिन्दू हो जाएगी क्योंकि सवर्णों से लेकर पिछड़ों और दलितों तक एक व्यापक हिन्दू पहचान को आकार देने में संघ अब पूरी तरह सफल हो चुका है.

कैसे गिरेगा संघ का किला?

संघ एक व्यापक हिन्दू ध्रुवीकरण की इंजीनियरिंग का तरीक़ा खोज चुका है और उसके लिए पूरा तंत्र भी खड़ा कर चुका है. कोई बहुत बड़ा बवंडर, बहुत बड़ा भूकंप ही संघ के इस तंत्र को नेस्तनाबूद कर सकता है.

फ़िलहाल तो इसकी संभावना नहीं दिखती. इसलिए चुनावों में कौन जीतता है, बीजेपी या कांग्रेस, संघ को इससे कोई लेना-देना नहीं.

कांग्रेस अगर संघ के एजेंडे पर मजबूरी में ही सही, मंथर गति से चलती रहे तो भी संघ अपनी सफलता से बहुत संतुष्ट और प्रसन्न रहेगा.

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यहाँ यह स्पष्ट कर दूँ कि किसी लोकसभा चुनाव में बीजेपी की क़रारी हार भी अगर हो गई, तो ऐसा भ्रम नहीं पालना चाहिए कि सेकुलर एजेंडा वापस लौट पाएगा.

ख़याली पुलाव मत पकाइए. नया नैरेटिव लिखा जा चुका है और देश फ़िलहाल उसी से हाँका जाएगा.

संघ को चुनावों से नहीं, बल्कि तभी पराजित किया जा सकता है, जब उसके विरुद्ध कोई नया विचार खड़ा हो. लेकिन वह विचार कहाँ है? किसके पास है?

क्षेत्रीय दलों के पास अपने सीमित क्षेत्रीय विचार हैं, वह चुनावी गणित में संघ को कुछ दिन भले रोक लें, उनके पास भी संघ से वैचारिक स्तर पर युद्ध कर पाने के कोई उपकरण नहीं हैं.

एक कांग्रेस थी, जिसकी जड़ें देश भर में थीं, लेकिन उसके पास न कोई विचार है, न संकल्प है, है तो बस शॉर्टकट है. दुर्भाग्य से यह शॉर्टकट फ़िलहाल नागपुर ही पहुँचता है.

(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)

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