क्या है किसानों के फ़सल की लागत और बढ़ते कर्ज़ का कारण?

  • 29 नवंबर 2018
किसान मुक्ति मार्च, किसान मार्च, रामलीला मैदान

राजधानी दिल्ली में एक बार फिर किसानों का जमावड़ा शुरू हो गया है. ये किसान देश के अलग अलग राज्यों से आकर दिल्ली के रामलीला मैदान में जुटे हैं और शुक्रवार को संसद की ओर मार्च करेंगे.

किसानों की मांग है कि संसद का विशेष सत्र बुलाया जाए और वहां किसानों के कर्ज़ और उपज की लागत को लेकर पेश किए गए दो प्राइवेट मेंबर्स बिल पारित करवाएं जाएं.

किसान नेताओं ने बताया कि ये किसान आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और अन्य राज्यों से यहां आए हैं.

पुलिस ने बताया कि शुक्रवार की रैली के लिए उन्होंने व्यापक बंदोबस्त किए हैं.

किसानों से उनकी मांगों को जानने और इस जुटान को देखने बीबीसी की टीम रामलीला मैदान पहुंची. वहां उन्होंने देश के विभिन्न राज्यों से पहुंचे कई किसानों से बात की.

किसान मुक्ति मार्च, किसान मार्च, रामलीला मैदान

तेलंगना के सिरपुर, वारंगल से यहां आई शोभा के पति राजू छोटे किसान थे. लेकिन उसमें आगे बढ़ने की लगन थी. उन्होंने धीरे-धीरे दूसरों के खेत किराये पर लेकर खेती करना शुरू किया.

उन्होंने उन खेतों में कपास लगाया जिसमें उन्हें एक बार नुक़सान हुआ. उन्हें उनके फ़सल की पूरी क़ीमत नहीं मिल पाई.

उन्होंने फिर महाजनों से क़र्ज़ लिया जो 7 रुपये से लेकर 10 रुपये सैंकड़ा ब्याज पर क़र्ज़ देते हैं.

राजू पर ये कर्ज़ इतना बढ़ गया कि उन्होंने 2015 में आत्महत्या कर ली.

किसान मार्च, रामलीला मैदान
Image caption अश्विनी, वारंगल (तेलंगाना)

पिता ने कर ली थी ख़ुदकुशी

वारंगल की ही अश्विनी के पिता ने 2015 में कर्ज़ के बोझ से ख़दकुशी कर ली थी. वो महज़ 40 साल के थे.

बाद में उसकी मां ने इस क़दर मेहनत की कि वो अपने खेतों में पैदावार को कई गुना बढ़ा पाई.

उन्हें राज्य सरकार की ओर से अमरीका भेजा गया जहां उन्होंने वहां के किसानों को पैदावार बढ़ाने के गुर सिखाए.

महताब सिंह (लखीमपुर खीरी)

"अब रास्ता नहीं सूझ रहा"

लखीमपुर खीरी से पहुंचे महताब सिंह कहते हैं कि अभी कुछ देर पहले जब वो रामलीला मैदान में जुटे थे तो उनके पास बैंक मैनेजर का फ़ोन आया कि वो जल्द क़र्ज़ चुकाएं नहीं तो उन पर कार्रवाई की जाएगी.

महताब सिंह ने घर के ज़ेवरात गिरवी रखकर बैंक से डेढ़ लाख रुपये का क़र्ज़ लिया था.

वो कहते हैं कि 2016 में जो गन्ना बोया, वो अगले साल काटा और मिल को दिया लेकिन उसकी आधी से कम की ही पेमेंट मिल पाई है.

वो कहते हैं कि ये तो बैंक का क़र्ज़ है इसके अलावा उनके पास घर की ज़रूरतों के लिए बनिये से लेकर दूसरे कई लोगों के क़र्ज़ हैं और अब कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है.

जागीर सिंह
Image caption जागीर सिंह

"बैंकों के कर्ज़"

उत्तर प्रदेश के पीलीभीत से पहुंचे जागीर सिंह कहते हैं कि सरकार के क़र्ज़ माफ़ी का फ़ायदा सिर्फ़ उन किसानों को होता है जो बैंकों का कर्ज़ चुकाने में नाकाम हो जाते हैं.

वो कहते हैं कि इसका लाभ उन किसानों को नहीं मिलता जो किसी न किसी तरह जुगाड़कर बैंक के कुछ न कुछ पैसे देते रहते हैं.

पुष्पेंद्र सिंह, बरेली
Image caption पुष्पेंद्र सिंह, बरेली

"बढ़ता ब्याज का बोझ"

उत्तर प्रदेश के ही बरेली से पहुंचे पुष्पेंद्र सिंह ने कहा, "जब किसानों को उसकी लागत का डेढ़ गुना देने की बात कही जाती है तो ये नहीं कहा जाता है कि उस लागत में क्या-क्या शामिल किया गया है. जैसे गन्ना बोने के लिए बीज चाहिए, जुताई के लिए डीज़ल (ट्रैक्टर), मज़दूरी, खाद और कीटनाशक, हर माह खुदाई, गुड़ाई और फिर पूरे परिवार की मेहनत."

वो कहते हैं, "ज़ाहिर है जब उसके फ़सल की क़ीमत नहीं मिलती तो वो कर्ज़ लेने को मजबूर होता है क्योंकि उसे अगली फ़सल उगानी है. और जब फ़सल की कीमत फंस गई, चाहे मिल के पास, या महाजन के पास तो फिर वो उस फंसे हुए पैसे पर भी ब्याज देता रहता है और उसका बोझ बढ़ता रहता है."

किसान मार्च, रामलीला मैदान
Image caption तेलंगना में वारंगल के सिरपुर से किसान मार्च में पहुंची शोभा

"शायद ही कर्ज़हीन किसान हो"

बरेली के ही अजीत सिंह ने कहा, "हर प्रोडक्ट की क़ीमत उसे बनाने वाले तय करते हैं लेकिन किसान ही है जिसके पैदावार की क़ीमत वो ख़ुद से तय नहीं करता. और ज़ाहिर है जब उसके प्रोडक्ट की क़ीमत उसे नहीं मिल पाती तो वो अपना आगे का काम चलाने के लिए क़र्ज़ लेता है और ये चक्र जारी रहता है."

वो कहते हैं, "हर कोई क़र्ज़ माफ़ी की बात करता है कोई क़र्ज़ से मुक्ति की बात नहीं कहता. आज ज़रूरत उसकी है कि किसान को क़र्ज़ से मुक्त किया जाए. देश में शायद ही कोई किसान होगा जिसपर क़र्ज़ नहीं होगा."

वहां बरेली से पहुंचे वीरपाल सिंह ने कहा, "अगर किसान को उसकी उपज का उचित दाम मिले और दाम वक्त पर मिले तो उसे कर्ज़ लेने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी."

वीरपाल सिंह
Image caption वीरपाल सिंह

किसान मार्च में शामिल होने का अनुरोध

किसानों के समर्थक ट्विटर पर आम लोगों से मार्च में शामिल होने का अनुरोध कर रहे हैं.

राजनीतिक कार्यकर्ता योंगेंद्र यादव ने ट्वीट किया, 'किसान मुक्ति मार्च शुरू करने जा रही महिला किसानों ने बिजवासन में हमारा अभिवादन किया. आप किसान नहीं हैं तो भी हमारे साथ आएं. उन हाथों को थामें जो हमारा पेट भरते हैं. जय किसान.'

अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने भी ट्वीट में लिखा कि किसानों के साथ खड़े होने की जरूरत है

मेधा पाटकर और दिग्गज पत्रकार पी. साईनाथ सहित सामाजिक कार्यकर्ताओं ने रैली को समर्थन दिया है और कहा कि देश में किसानों की हालत इस हद तक बदतर हो चुकी है, जैसी कि पहले कभी नहीं थी.

किसान इमेज कॉपीरइट TWITTER

क्या है किसानों की मांग?

कई महिला किसान और दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र भी रैली में हिस्सा ले रहे हैं ताकि किसानों को राहत मुहैया कराने के लिए केंद्र पर दबाव डाला जा सके.

शुक्रवार को ये अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) के बैनर तले वे 'भाजपा सरकार की किसान विरोधी नीतियों' के ख़िलाफ़ रामलीला मैदान से संसद मार्ग तक मार्च निकालेंगे और गिरफ़्तारी देंगे.

किसान मुक्ति मार्च, किसान मार्च, रामलीला मैदान

स्वाभिमानी शेतकारी संगठन के नेता और सांसद राजू शेट्टी ने 2017 में लोकसभा में दो निजी सदस्य विधेयक पेश किए थे ताकि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के आधार पर कृषि उत्पादों के लिए उचित दाम की गारंटी और कर्ज़ माफ़ हो सके. शेट्टी एआईकेएससीसी का भी हिस्सा हैं.

एआईकेएससीसी की मांग है कि विधेयक पर संसद में चर्चा हो और उसे पारित किया जाए.

संगठन ने कहा कि 21 राजनीतिक दलों ने विधेयक को अपना समर्थन दिया है और उनके प्रतिनिधि शुक्रवार को मार्च में शामिल होंगे.

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
तमिलनाडु के किसानों ने कहा सूखे के कारण उनके साथी कर रहे हैं आत्महत्या

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार