क्या अमरीका और नीदरलैंड में चलती है ‘राम मुद्रा’

  • 3 दिसंबर 2018
राम नाम की मुद्रा इमेज कॉपीरइट https://www.maharishivediccity-iowa.gov

राजस्थान, तेलंगाना समेत उन सभी राज्यों में जहाँ इस वक़्त चुनावी माहौल बना हुआ है, वहाँ तमाम तरह की फ़र्ज़ी ख़बरें फैलाई जा रही हैं.

कई जगहों पर हमने पाया कि अधूरी सूचना को एक ख़ास नज़रिया देकर व्हाट्सऐप, फ़ेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स पर शेयर किया गया और उसे काफ़ी लोगों ने अपने पर्सनल पन्नों पर पोस्ट भी किया.

ऐसी ही एक पोस्ट हमें सोशल मीडिया पर कई जगह दिखाई दी जिसमें ये दावा किया गया है कि राम नाम वाले करेंसी नोट अमरीका और नीदरलैंड में आधिकारिक तौर पर इस्तेमाल किये जा रहे हैं. इस ट्वीट के साथ लोगों ने नोट की तस्वीर भी शेयर की है.

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कुछ सोशल मीडिया यूज़र्स ने इन नोटों के डिटेल भी लिखे हैं, जैसे कि नोट पर 18 भाषाओं में राम लिखा हुआ है, चमकदार रंगीन नोट पर प्रभु राम का चित्र है और इसकी क़ीमत यूरो और डॉलर से ज़्यादा है.

हिन्दी अख़बार राजस्थान पत्रिका और उसके बाद दैनिक जागरण ने भी राम मुद्रा पर ख़बरें छापी हैं.

उन्होंने अपनी ख़बर में लिखा कि 'इन देशों में चलती है राम नाम की मुद्रा, 10 यूरो में मिलता है एक राम'.

लेकिन अपनी पड़ताल में हमने पाया कि राम मुद्रा तो असली है, लेकिन उसके अमरीका और नीदरलैंड में आधिकारिक रूप से चलने के सभी दावे फ़र्ज़ी हैं.

दोनों ही देशों के सेंट्रल बैंकों ने कभी इस राम मुद्रा को लीगल टेंडर (आधिकारिक मुद्रा) नहीं माना.

राम मुद्रा होने का दावा

राम मुद्रा से जुड़ी इस तरह की जानकारी और तस्वीरें सोशल मीडिया और इंटरनेट पर पहले भी शेयर की जाती रही हैं.

हाल के दिनों में राम मंदिर को लेकर आये सियासी उबाल के बाद ऐसे पोस्टों को सोशल मीडिया पर व्यापक स्तर पर फैलाया जा रहा है.

ऐसा दावा करने वाले एक ट्विटर यूज़र को अमरीका के @SpokenTwilight नाम के यूज़र ने जवाब दिया.

उन्होंने लिखा, "मेरे मनी बॉक्स में राम नाम वाले कुछ नोट हैं. इन्हें अमरीका के कई शहरों और राज्यों में डॉलर की तरह स्वीकार किया जाता है."

@SpokenTwilight द्वारा ट्विटर पर दी गई जानकारी को मानें तो ये किसी 'अमरीकी हिंदू नवचेतना' से जुड़ा पेज है जिसे फ़रवरी 2018 में ही बनाया गया है.

क्या है 'राम मुद्रा'

अपनी पड़ताल में हमें पता चला कि अमरीका के मध्य-पश्चिमी भाग में स्थित आयोवा राज्य की 'महर्षि वेदिक सिटी' में 'द ग्लोबल कंट्री ऑफ़ वर्ल्ड पीस' नाम की एक संस्था ने साल 2002 में ये नोट बाँटे थे.

इसी साल इस संस्था ने नीदरलैंड में भी राम मुद्रा का वितरण किया.

वैदिक सिटी 'द ग्लोबल कंट्री ऑफ़ वर्ल्ड पीस' नाम की संस्था का हिस्सा है जिसकी स्थापना महर्षि महेश योगी (महेश प्रसाद वर्मा) ने की थी.

हालांकि, महर्षि महेश योगी का साल 2008 में निधन होने के बाद इस मुद्रा की मौजूदा स्थिति के बारे में कुछ ख़ास जानकारी उपलब्ध नहीं है.

लेकिन ये कथित मुद्रा वैदिक सिटी के मुख्य आकर्षणों की सूची में आज भी शामिल है.

इस संस्था ने अपनी वेबसाइट पर लिखा है, "24 फ़रवरी 2002 को वेदिक सिटी ने राम मुद्रा बाँटना शुरू किया था. सिटी के आर्थिक विकास के लिए और स्थानीय व्यापार को बढ़ावा देने के लिए सिटी काउंसिल ने राम मुद्रा का चलन स्वीकार किया था."

"कागज़ की 'एक राम मुद्रा' की क़ीमत 10 अमरीकी डॉलर तय की गई है. इस रेट से कोई भी शख़्स राम मुद्रा को ख़रीद सकता है. नोटों में तीन विकल्प मौजूद हैं. एक राम, पाँच राम और दस राम."

यानी कि इस मुद्रा का इस्तेमाल सिर्फ़ आश्रम के भीतर या फिर आश्रम से जुड़े सदस्यों के बीच ही किया जा सकता है.

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अमरीका की यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्सस में एसोसिएट प्रोफ़ेसर पंकज जैन ने पिछले साल एक ट्वीट में लिखा था कि अमरीका स्थित 'महर्षि वेदिक सिटी' ने वैदिक स्टाइल की कृषि, हेल्थकेयर और एजुकेशन के साथ राम मुद्रा की शुरुआत की थी.

राम मुद्रा बॉन्ड

एक समय था जब महर्षि महेश योगी के अनुयायियों की संख्या 60 लाख से ज़्यादा थी.

अमरीका का मशहूर इंग्लिश बैंड 'द बीटल्स' भी एक समय महेश योगी का अनुयायी रहा.

उस वक़्त राम मुद्रा को एक बॉन्ड की तरह बेचा गया था.

बीबीसी की एक पुरानी रिपोर्ट के अनुसार, साल 2003 में नीदरलैंड में क़रीब 100 दुकानों, 30 गाँवों और शहर के कुछ हिस्सों में राम मुद्रा चलती थी.

उस वक़्त डच सेंट्रल बैंक ने कहा था कि वो राम मुद्रा पर नज़र बनाए हुए हैं.

उन्हें विश्वास है कि महर्षि महेश योगी की संस्था क्लोज़ ग्रुप में ही इस करेंसी का इस्तेमाल करेगी और क़ानून से बाहर जाकर कुछ नहीं करेगी.

नीदरलैंड्स के सरकारी बैंक के अनुसार, वैदिक सिटी ने 2002 में क़रीब एक लाख की राम मुद्रा छापी थी. लेकिन राम मुद्रा को कभी भी लीगल टेंडर (आधिकारिक मुद्रा) घोषित नहीं किया गया था. वो सिर्फ़ एक कागज़ का टुकड़ा था जिसकी एक संस्था के अनुसार कुछ क़ीमत तय की गई थी और उसे लोग श्रम या उत्पाद के बदले एक दूसरे को देते-लेते थे.

'राम मुद्रा विदेशों में है तो भारत में क्यों नहीं?'

गुजरात की सनातन धर्म फ़ाउन्डेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर अपना परिचय देने वाले उमेद सिंह चावडा ने ट्विटर पर लिखा है कि "नीदरलैंड और अमरीका में इस्तेमाल हो रही राम करेंसी में एक राम का मूल्य 10 यूरो है."

लेकिन इसके साथ उन्होंने एक सवाल भी जोड़ा है.

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टैग करते हुए उन्होंने लिखा, "अगर विदेशों में राम करेंसी चल सकती है, तो भारत में क्यों नहीं."

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कुछ सोशल मीडिया पोस्ट पर ये भी लिखा गया कि "भारत में राम राज्य लाने के लिए वैश्विक मुद्रा राम को भारत में शुरू करना चाहिए."

कुछ तथाकथित हिंदू संगठन भी राम मंदिर बनने के साथ 'राम मुद्रा' की वक़ालत करते रहे हैं.

कुछ लोगों ने करेंसी की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल खड़े करते हुए लिखा है कि क्यों भारत गांधी पर ही अटका हुआ है?

भारत को भी विदेशों की तरह करेंसी पर कई लोगों के चेहरे लगाने चाहिए.

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ईस्ट इंडिया कंपनी के 'हिंदू सिक्के'

सोशल मीडिया पर चर्चा सिर्फ़ 'राम मुद्रा' की ही नहीं है.

लोगों ने ये भी दावा किया है कि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने 17वीं शताब्दी में हिंदुओं का सम्मान करने के लिए अपने सिक्कों पर भारतीय देवी-देवताओं के चित्रों का इस्तेमाल किया था. पर ये दावे भी फ़र्ज़ी हैं.

इस संबंध में हमने यूके के ऐशमोलियन संग्राहलय के सिक्का विशेषज्ञ शेलेंद्र भंडारे से बात की.

उन्होंने हमें बताया, "मॉडर्न तकनीक का इस्तेमाल करते हुए इन ऐतिहासिक दिखने वाले सिक्कों को तैयार किया गया है. ऐसे सिक्कों का इस्तेमाल आज भी धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है. फ़कीर और साधु भी अक्सर इन सिक्कों के प्रयोग को बढ़ावा देते हैं. ये लोग अक्सर ग़रीबों और निःसंतान लोगों को ऐसे सिक्के रखने की सलाह देते हैं."

"लेकिन इन सिक्कों को किसी भी तरह से ऐतिहासिक नहीं कहा जा सकता है."

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