कैसे बाहर निकलीं दलदल में फंसी ज़िंदगियां

  • 6 दिसंबर 2018
सुंदरबन
Image caption गांव की सड़क

पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गाँव त्रिदिपनगर में रहने वाली मीना गाएन रोज़ाना घर से निकलकर सुंदरबन के उस इलाक़े में जाकर गोलगप्पे का स्टॉल लगाती हैं जहाँ पर्यटक आते हैं.

शुरू-शुरू में जब मीना गाँव में शाम को गोलगप्पे का ठेला लगाने निकलती थी तो सबकी नज़रें ठहर जाती थीं.

सुंदरबन के इस गाँव में ऐसा शायद पहले कभी नहीं हुआ था. हालांकि मीना के लिए ये आसान नहीं था क्योंकि दो साल पहले तक इस गाँव में सड़क नहीं थी.

अपने विशाल मैनग्रोव फ़ॉरेस्ट के लिए मशहूर सुंदरबन का इलाक़ा दलदली है. अक्सर मीना का ठेला कीचड़ में फँस जाता.

Image caption मीना

उन दिनों को याद करते हुए मीना बताती हैं, "कीचड़ से निकलने के लिए मुझे अपनी साड़ी उठाकर निकलना पड़ता, अजीब लगता. मैं सोचती थी कि कब तक ऐसा करते रहेंगे. ठेले को कीचड़ से निकालने के लिए ख़ूब ज़ोर लगाना पड़ता... ठेले को मुख्य सड़क से दूर छोड़ मैं एक-एक कर ठेले का सामान सड़क पर ले जाती. कई बार सामान चोरी हो जाता. 60-70 रुपए रोज़ कमा पाती थी. इसलिए फ़ैसला किया कि ख़ुद ही सड़क बनाऊंगी. मेरी कमाई अब 300-400 रुपए हो जाती है. कुछ बचा नहीं पाती पर बच्चों की परवरिश कर सकती हूँ. जब मेरा बेटा पैदा होने वाला था तो ख़राब सड़क की वजह से मैं गिर गई थी..मुझे लगा कि मेरा बच्चा मर जाएगा. मैं उस दिन को याद नहीं करना चाहती."

Image caption मीना

ये सब बताते-बताते मीना की आँखे भर आती हैं. उनके कच्चे मकान में ख़ामोशी छा जाती है. मेरे सवाल भी जैसे कहीं गुम हो गए.

ज़िंदगियां हुईं बेहतर

ख़ुद को संभालते हुए मीना बताती हैं कि पिछले दो सालों में उनके जैसी कई औरतों की ज़िंदगी बेहतर हुई है. और ये तब मुमकिन हुआ जब गाँवों की औरतों ने फ़ैसला किया कि वो ख़ुद सड़क बनाएँगी. क़रीब 24 गाँवों की औरतों ने ये कमाल कर दिखाया.

इसमें मदद मिली वर्ल्ड विज़न नाम के एक एनजीओ से जिसने ईंटें देने का प्रस्ताव रखा.

उससे पहले इनकी ज़िंदगी नर्क से कम नहीं थी.

पास के गाँव जनपाड़ा में रहने वाली उत्तरा मंडल कपड़े सिलती हैं, पर उन्हें देख ऐसा लगता है कि वो कपड़े नहीं अपनी ज़िंदगी की फटी-पुरानी दर्दनाक यादों को भी सिल रही हों.

उत्तरा बताती हैं, "जब मैं गर्भवती थी तो कोई गाड़ी गाँव में नहीं आ सकती थी क्योंकि सड़क नहीं थी. गाँववालों ने बच्चे के पालने को खाट जैसा बनाया और मुझे कंधे पर उठाकर लेकर गए. वो मानसिक और शारीरिक तौर पर भयावह अनुभव था. लगता था कि अगर मैं गिर गई तो बच्चे का क्या होगा. इसलिए जब औरतों ने सड़क बनाने का फ़ैसला किया, तो मैंने भी इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया."

इन सड़कों ने नई पीढ़ी को भी उम्मीद दी है जिनके पढ़ने-लिखने के सपने, कई बार सड़क न होने की भेंट चढ़ जाया करते थे.

18 साल की रॉबी दास अब बिना तकलीफ़ के स्कूल जा पाती हैं और पढ़ाई पर ध्यान दे पाती है. अपनी हरी और सफ़ेद साड़ी में अब वो फ़र्राटे से साइकिल चलाती है. पर पहले ऐसा नहीं थी.

Image caption रॉबी

रॉबी बताती हैं, "पूरी स्कूल यूनिफॉर्म कीचड़ से सन जाती थी. हम साइकिल नहीं चला पाते थे.कीचड़ में कंकड़, शीशा होता तो हमारे पैर उससे कट जाते. स्कूल पहुँच भी जाते तो पहले तालाब में जाकर हाथ-पैर धोने पड़ते. कभी-कभी स्कूल नहीं जा पाते या परीक्षा के दिन देर से पहुँचते. कई बार साइकिल उठाकर कीचड़ से निकलते. इसलिए मैंने सड़क बनाने में मदद की. ईंटो को गिनकर हिसाब रखने का काम मैं करती थी. मैं आगे पढ़कर टीचर बनना चाहती हूँ."

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#100Women: सुंदरबन की महिलाओं ने बनाई ख़ुद के दम पर सड़क

रॉबी की आँखों में तैरते सपनों को आप महसूस कर सकते हैं.

वैसे कहने को तो गाँव में औरतों ने ईंटों की मामूली सड़कें बनाई हैं पर अब ये सड़कें ज़िंदगियाँ बचाने और बनाने का काम भी कर रही है.

55 साल की गीता मंडल की बहू रीता जब गर्भवती हुईं तो इस बार एम्बुलेंस गाँव उनके घर तक पहुँच पाई. 18 साल पहले जिस मानसिक और शारीरिक यातना से उत्तरा को गुज़रना पड़ा था, रीता उस ख़ौफ़ से आज़ाद थी.

वहीं मर्दों के लिए भी काम करना आसान हो गया है. मसलन गीता मंडल को तसल्ली है कि उनका बेटा मशीन वैन चलाकर गाँव के लोगों को सड़के के रास्ते बाहर तक लेकर जाता है और पैसे कमा पाता है.

हालांकि गाँव में कुछ हिस्से आज भी मिल जाएँगे जहाँ सड़क नहीं है. रास्ता कच्चा है और ज़मीन दलदली.

दिखने में ये गाँव किसी कलाकार की संदुर कृति से कम नहीं. छोटा सा घर, आँगन में तालाब, पास में नारियल का पेड़, हर ओर हरियाली... लेकिन सुविधाओं के नाम पर अभी बहुत कुछ आना बाक़ी है.

पर कई मुश्किलों को पार करते हुए बंगाल के इन गाँवों की औरतों ने अपनी राह ख़ुद चुनी है और अपने लिए सड़क तैयार की.

सड़क जो कई औरतों के लिए ज़िंदगी और मौत के बीच का फ़ासला बन चुकी है, सड़क जो इनके बच्चों को बेहतर परविरश दे रही है, सड़क जो अकेले होते हुए भी इन्होंने मिलकर बनाई है.

रबिंद्रनाथ टैगोर के बंगाल में 'ऐकला चलो रे' की ये एक सुंदर सी मिसाल है.

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