राहुल गांधी ने क्या वो कर दिखाया जिसकी कल्पना मोदी-शाह को नहीं थी?

  • 12 दिसंबर 2018
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2019 के आम चुनाव से ठीक पहले पाँच राज्यों के चुनावी परिणाम को फ़ाइनल से पहले का सेमीफ़ाइनल माना जा रहा था. इस सेमीफ़ाइनल मुक़ाबले में कांग्रेस ने ये दिखाया है कि वो बीजेपी को ना केवल उसके गढ़ में चुनौती दे सकती है, बल्कि उसे सत्ता से बाहर का रास्ता भी दिखा सकती है.

सबसे पहली बात तो यही है कि इन नतीजों ने राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी के मुक़ाबले में खड़ा कर दिया है. राहुल ये साबित करने में कामयाब रहे हैं कि वे नरेंद्र मोदी को चुनौती दे सकते हैं, उनसे मुक़ाबला कर सकते हैं और उन्हें हरा भी सकते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार और गांधी परिवार पर नज़दीकी नज़र रखने वाले रशीद किदवई बताते हैं, "ज़ाहिर है कि इन नतीजों से राहुल गांधी का कॉन्फिडेंस मज़बूत होगा और 2019 में वे कहीं ज़्यादा तैयारी से चुनाव मैदान में जाएंगे."

राहुल की इस जीत में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 15 सालों से चली आ रही बीजेपी सरकार के इन्कंबेंसी फैक्टर का भी योगदान रहा है, यही बात राजस्थान में वसुंधरा राजे सरकार के प्रति लोगों की नाराजगी के तौर पर कही जा सकती है.

लेकिन इन चुनावों में राहुल गांधी ने ख़ुद के नेता के तौर पर भी विकसित किया है.

बीबीसी हिंदी के साथ फ़ेसबुक लाइव में वरिष्ठ पत्रकार संजीव श्रीवास्तव ने कहा, "मध्य प्रदेश में उन्होंने ये सुनिश्चित किया कि कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया एक साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे थे, हालांकि अंदरूनी होड़ ज़रूर थी लेकिन राहुल गांधी पार्टी को एकजुट रखने में कामयाब रहे."

इतना ही नहीं राहुल गांधी ने राजस्थान में भी ये सुनिश्चित किया कि बाहर से जाकर सचिन पायलट संगठन का काम कर सकें और बाद में अशोक गहलोत जैसा अनुभवी नेता राज्य में पहुंचकर में चुनावी अभियान को मज़बूत करे, हालांकि इन दोनों के बीच भी टिकट बंटवारे को लेकर आपसी गुटबाजी की ख़बरें आती रहीं लेकिन दोनों एक साथ मिलकर चुनावी रणनीति बनाते रहे.

राहुल गांधी ने कितनी की मेहनत

छत्तीसगढ़ में इस तरह से अपने नेताओं की आपसी खींचतान का सामना राहुल गांधी को नहीं करना पड़ा, लेकिन वहां पार्टी के पास कोई दमदार चेहरा भी नहीं था. ऐसे में ये माना जा सकता है कि छत्तीसगढ़ की जनता ने राहुल गांधी के चेहरे को ध्यान में रखकर वोट डाला है.

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छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने 90 में 60 से ज़्यादा सीटें हासिल करने में कामयाब हुई है, इस राज्य में राहुल गांधी ने पांच दौरे करके करीब 18 चुनावी सभाओं को संबोधित किया.

राज्य के वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर मुक्तिबोध बताते हैं, "राहुल गांधी की सभाओं में यहां भीड़ उमड़ रही थी, ख़ासकर उन्होंने कहा कि हमारी सरकार बनती है तो 10 दिन के अंदर किसानों का कर्जा माफ़ कर देंगे और घोषणा पत्र के तमाम वादे समय-सीमा के भीतर पूरे किए जाएंगे."

कांग्रेस को छत्तीसगढ़ में बीजेपी की तुलना में करीब 10 फ़ीसदी ज़्यादा वोट मिले हैं. तीन राज्यों में सबसे ज़ोरदार जीत कांग्रेस को छत्तीसगढ़ में ही मिली है.

मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस को भारतीय जनता पार्टी से कड़ी टक्कर भले मिली हो लेकिन राहुल गांधी के लिए भरोसा बढ़ाने वाली बात ये है कि ये दोनों राज्य भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ताकत के लिहाज से बेहद मज़बूत राज्य रहे हैं, ऐसे में कांग्रेस का यहां जीत हासिल करने से कांग्रेस के लिए मोराल बूस्टर साबित होने वाला है.

साल भर में करिश्मा

ये भी दिलचस्प संयोग है कि ये नतीजा राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के ठीक एक साल बाद आया है. लोकसभा चुनाव से महज़ चार महीने पहले उन राज्यों में जहां से बीजेपी को अधिकतम सीटें हासिल हुई थीं, उन राज्यों में सरकार हासिल करके राहुल गांधी ने 2019 के मुक़ाबले का टोन सेट कर दिया है.

पहले पंजाब, फिर गुजरात और कर्नाटक, इसके बाद मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की चुनाव कमान संभालने के साथ राहुल गांधी समय के साथ राजनीतिक तौर पर मैच्योर होते भी नज़र आ रहे हैं. मध्य प्रदेश में राहुल गांधी ने 26 और राजस्थान में 15 चुनावी रैली को संबोधित किया है. इन दोनों राज्यों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 10-10 चुनावी रैलियों को संबोधित किया था.

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राजस्थान में एक चुनाव रैली के दौरान राहुल गांधी ने कहा था, "अगर राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनती है तो यकीन मानिए कि ये आपकी सरकार पहले होगी, कांग्रेस की सरकार बाद में."

रशीद किदवई बताते हैं, "चुनाव जीतने के बाद राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में किस तरह से मुख्यमंत्री का चयन करने में भी राहुल गांधी अपनी राजनीतिक परिपक्वता का प्रदर्शन कर सकते हैं."

इन तीन राज्यों के नतीजों के बाद राहुल गांधी को एक बड़ा फ़ायदा ये होगा कि आने वाले दिनों में उनके नेतृत्व को अब क्षेत्रीय दलों के नेता से कोई चुनौती नहीं मिलेगी. चाहे वो तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी हों या फिर बहुजन समाज पार्टी की मायावती हों, इन सबके लिए राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल करना इतना आसान नहीं होगा.

इसका संकेत मिलता है समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव के मध्य प्रदेश के चुनावी नतीजों के बीच ट्वीट करने और कांग्रेस को समर्थन करने की घोषणा से. अखिलेश ने ट्वीट किया है - "जब एक-एक मिलकर ग्यारह होते हैं तो बड़े-बड़े नौ दो ग्यारह हो जाते हैं."

अभी भी ताक़तवर हैं मोदी-शाह

ज़ाहिर है कि राहुल गांधी की की स्वीकार्यता आम मतदाताओं के साथ साथ दूसरे राजनीतिक दलों में भी बढ़ेगी.

इसके अलावा एक और फैक्टर है जिसमें राहुल गांधी का पलड़ा भारी लगने लगा है. राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में अपनी चुनावी रैलियों में राहुल गांधी ने लगातार आम लोगों, गरीब, दलितों और किसानों के मुद्दे उठाते नजर आए हैं. इसके अलावा रफ़ाल मुद्दे और बैंकों के डूबते पैसे जैसे अहम मसलों पर वे सवाल कर रहे हैं.

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दूसरी तरफ़ उनके सामने नरेंद्र मोदी हैं जो लगातार इन सवालों के जवाब देने से बचते आए हैं क्योंकि सीधे तौर पर उनके पास इन सवालों के ठोस जवाब नहीं हैं. पांच साल सरकार चलाने के बाद जवाब देने की बारी नरेंद्र मोदी की होगी और बतौर प्रधानमंत्री वे हर बात के लिए अब बीते 70 साल को ज़िम्मेदार नहीं ठहरा पाएंगे.

इन सबके बीच राहुल गांधी हिंदू मतदाताओं को रिझाने के लिए मंदिरों के चक्कर लगाना भी सीख चुके हैं. यानी हिंदुत्व के नाम पर वोट जुटाने की जुगत उन्होंने थोड़ी बहुत ही सही मगर बीजेपी से सीख ली है.

हालांकि एक सच ये भी है कि राहुल गांधी को अति आत्मविश्वास से बचना होगा क्योंकि देश भर में लोकप्रियता के हिसाब से अभी भी नरेंद्र मोदी सबसे आगे दिखाई देते हैं और मध्य प्रदेश-राजस्थान जैसे राज्यों में बीजेपी का वोट प्रतिशत बहुत कम नहीं हुआ है.

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