राजस्थान विधानसभा चुनावः अशोक गहलोत और सचिन पायलट ने कैसे ख़त्म किया कांग्रेस का वनवास

  • 11 दिसंबर 2018
सचिन पायलट, अशोक गहलोत इमेज कॉपीरइट Vishal Bhatnagar/NurPhoto via Getty Images

कामयाबी उनकी दहलीज पर आती दिख रही है. एक के पास अनुभव और दृष्टि थी, एक पास जोशो जूनून और हसरत को हकीकत में बदलने की ऊर्जा.

राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट की जोड़ी ने कुशलता से काम किया और वनवास काट रही कांग्रेस को राज्याभिषेक की और ले जाते नजर आए.

राजस्थान में दोनों को ही मुख्य मंत्री पद का दावेदार समझा जाता है. मगर सत्ता हासिल करने की ये होड़ कभी ऐसी कटुता में नहीं बदली कि विरोध कांग्रेस के सियासी सफर में अवरोध बन जाए. घर में रखे बर्तन परस्पर खटके भी.

लेकिन इसकी ध्वनि पड़ोस के घरो और गलियों में सुनाई नहीं दी. कोई तीन माह पहले राज्य के करौली में कांग्रेस की संकल्प रैली में दोनों नेता एक मोटर साइकिल पर सवार होकर निकले.

पायलट बाइक चला रहे थे और उनके पीछे बैठ कर हमराह बने. इस पर परिवहन मंत्री यूनुस खान ने मीडिया से कहा, "वे बगैर हेलमेट के गाड़ी चला कर निकले हैं. इससे जनता में ग़लत संदेश जाएगा."

मगर सियासी पंडित कहते हैं, "यही वो तस्वीर थी जिसने पार्टी संगठन और आवाम को चुनावों के लिए तैयारी कर रही कांग्रेस में एकजुटता का संदेश दिया."

सत्तारूढ़ बीजेपी

अब मंत्री खान टोंक में पायलट के सामने बीजेपी के प्रत्याशी हैं. बीजेपी ने पूरे राज्य में मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय से सिर्फ खान को ही चुनाव जीतने लायक समझ कर मैदान में उतारा है.

कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी इसी तस्वीर से बहुत उत्साहित हुए और एक रैली में कहा, "जिस दिन गहलोत और पायलट एक मोटर साइकिल पर सवार होकर निकले, मैं समझ गया कि कांग्रेस चुनाव जीत गई है."

सत्तारूढ़ बीजेपी ने इन दोनों नेताओ के कथित मतभेदों को सतह पर रख कर ये भाव पैदा करने की कोशिश की कि गुटों में बंटी कांग्रेस जनता की सेवा नहीं कर पाएगी. लेकिन जनता ने इसे तवज्जो नहीं दी.

प्रेक्षक कहते हैं, "घटनाएं और हालात बार-बार सियासत की दीवार पर वो इबारत लिखते रहे जो सत्तारूढ़ बीजेपी को आगाह कर सकती थीं. पर पार्टी नेतृत्व ने उस पर ध्यान नहीं दिया."

बीजेपी साल 2013 में संपन्न विधान सभा चुनावों में प्रचंड बहुमत से जीत कर सत्ता में आई थी. वो मोदी लहर का दौर था और बीजेपी ने दो सौ में से 163 सीटें जीत कर कांग्रेस का सूपड़ा साफ़ कर दिया था.

मुख्यमंत्री पद की हसरत

लेकिन जैसी प्रचंड जीत, वैसी ही प्रबल अपेक्षाएं. फिर कुछ माह बाद ही राज्य में तीन विधान सभा सीटों के लिए उप चुनाव हुए. तब मोदी लहर का जोर मंद पड़ने लगा था और कांग्रेस ने इन तीनो सीटों पर जीत हासिल की.

प्रेक्षक कहते हैं कि ये संकेत था कि जनता का मोह भंग होने लगा है. लेकिन बीजेपी ने इन संकेतो की अनदेखी की.

राज्य कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद की हसरत रखने वाले ओर भी नेता थे. मगर ये आम धारणा थी कि अगर कांग्रेस को बहुमत मिला तो इन दो नेताओ में से ही किसी एक का राजतिलक होगा.

बीजेपी को ये ठीक लगा कि वो कांग्रेस में इस ऊंचे ओहदे को लेकर चल रही खींचतान और होड़ को मुद्दा बनाए. बीजेपी ने कांग्रेस से बार-बार पूछा कि वो ये बताए कि उसका मुख्यमंत्री के लिए चेहरा कौन होगा.

बीजेपी ने सभाओं में ये कहा भी कि जो पार्टी जनता से अपने भावी नेता का चेहरा छिपा रही है, उस पर कैसे भरोसा किया जा सकता है.

हालाँकि इसका कुछ हद तक मतदाता के मानस पर प्रभाव भी पड़ा. मगर यह कांग्रेस को जीत की ओर आगे बढ़ने को रोक नहीं सकी.

नेता का फ़ैसला

कांग्रेस को अपने चुनाव अभियान में बीजेपी के इस सवाल जवाब देते देखा गया.

पायलट और गहलोत दोनों ही ये कहते रहे कि कांग्रेस में कभी चेहरा घोषित करने की परंपरा नहीं रही है.

पार्टी नेतृत्व विधायकों से राय, कार्यकर्ताओ की चाहत और दूसरे सभी पहलुओं पर विचार के बाद ही नेता का फैसला किया जाएगा.

लेकिन बीजेपी के इसे मुद्दा बनाने से कांग्रेस थोड़ी चिंतित दिखी.

जवाब में गहलोत ने कहा बीजेपी अपने आंतरिक मतभेदों के चलते 75 दिन तक राज्य इकाई का अध्यक्ष नहीं चुन सकी, उसे कांग्रेस पर टिप्पणी करने का क्या अधिकार है.

जानकर कहते है कांग्रेस में भीतर धड़ेबंदी थी. पार्टी के अंदर पायलट और गहलोत गुटों में फासला साफ़ देखा जा सकता था.

आंतरिक समीकरणों की छाया

मगर ये गुटबाजी उस तरह सड़कों पर नहीं आई जैसा कुछ राज्यों में होता रहा है.

जानकर कहते है अगर कांग्रेस ने उम्मीदवार चयन में गुटोबाजी को अलग रखा होता तो पार्टी बेहतर प्रदर्शन कर सकती थी.

कांग्रेस ने इन पांच सालों में लोक सभा की दो सीटों और विधान सभा की सीटों के लिए हुए उप चुनाव में बीजेपी को करारी मात दी.

पार्टी ने अपने नेतृत्व को लेकर चल रहे अपने आंतरिक समीकरणों की छाया इन उप चुनावो पर नहीं पड़ने दी.

अगर पायलट इन उप चुनावो में मोर्चा संभाले हुए थे तो गहलोत भी प्रचार के लिए हर सीट पर गए. कांग्रेस ने अनुभव और नूतन नेतृत्व में संतुलन बनाने का प्रयास किया है.

हालांकि कांग्रेस में ऐसी आवाजे उठती रही हैं कि पार्टी को साफ़-साफ़ कोई एक चेहरा घोषित कर देना चाहिए मगर पार्टी ये जोखिम उठाने से बच गई.

दिल्ली और जयपुर

कांग्रेस में नेताओ के बीच चल रही होड़ सड़कों पर भले ही न आई हो लेकिन इसका प्रभाव चुनाव प्रचार और टिकटों में साफ़ दिखाई दिया.

बीजेपी ने अपनी गिरती स्थिति को संभाला और चुनाव प्रक्रिया शुरू होते-होते खुद को अधिक व्यवस्थित और संगठित किया. इसका उसे लाभ भी मिला.

बीजेपी ने ये एहसास नहीं होने दिया कि दिल्ली और जयपुर के बीच कथित मतभेद और फासला है.

पार्टी ने मुख्य मंत्री वसुंधरा राजे और केंद्रीय नेतृत्व के मध्य कथित मनमुटाव की खबरों के बीच जब प्रचार शुरू किया तो इससे पार्टी संगठन में गति आई.

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कार्यकर्ताओ के साथ बैठक कर उन्हें उत्साहित किया. बीजेपी ने एंटी इंकमबसी को अपने प्रचार से कुछ हद तक पाटा भी.

उसने सोशल मीडिया को बेहतर ढंग से इस्तेमाल किया. बीजेपी के मुकाबले कांग्रेस का प्रचार अभियान उतना प्रभावी नहीं था.

दिग्गज नेताओ की फौज

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में प्रचार से मुक्त होने के बाद बीजेपी ने अपने दिग्गज नेताओ की फौज राजस्थान में उतार दी.

इनमें मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री शिवराज सिंह, छत्तीसगढ़ के मुख्य मंत्री रमन सिंह, यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ और कई केंद्रीय मंत्री भी थे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य में 12 सभाएं संबोधित की जबकि राहुल गाँधी नौ स्थानों पर आवाम से मुखातिब हुए. यूपी के मुख्य मंत्री ने कोई दो दर्जन स्थानों पर सभाएं कीं.

बीजेपी ने ऐसा करके व्यवस्था विरोधी रुझान को थामने की कोशिश की. कांग्रेस के लिए संभावनाओ से भरा मैदान था.

क्योंकि कर्मचारी, किसान, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग समय समय पर बीजेपी सरकार के प्रति नाराजगी व्यक्त करते रहे हैं.

जानकर कहते हैं कि टिकट वितरण के समय कांग्रेस की आंतरिक गुटबाजी जब बाहर आई तो इससे पार्टी की चुनावी संभावनाओं के लेकर बनी फिजा पर बुरा असर पड़ा.

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